और अल्लाह ने तुममें से कुछ को, कुछ पर जीविका में प्रधानता दी है, तो जिन्हें प्रधानता दी गयी है, वे अपनी जीविका अपने दासों की ओर फेरने वाले नहीं कि वे उसमें बराबर हो जायें, तो क्या वे अल्लाह के उपकारों को नहीं मानते हैं[1]?
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1. आयत का भावार्थ यह है कि जब वह स्वयं अपने दासों को अपने बराबर करने के लिये तैयार नहीं हैं तो फिर अल्लाह की उत्पत्ति और उस के दासों को कैसे पूजा-अर्चना में उस के बराबर करते हैं? क्या यह अल्लाह के उपकारों का इन्कार नहीं है?