वही है, जिसने बनाये हैं तुम्हारे लिए कान तथा आँखें और दिल[1], (फिर भी) तुम बहुत कम कृतज्ञ होते हो।
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1. सत्य को सुनने, देखने और उस पर विचार कर के उसे स्वीकार करने के लिये।


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