हे नबी! आप कह दें कि (अल्लाह) कहकर पुकारो अथवा (रह़मान) कहकर पुकारो, जिस नाम से भी पुकारो, उसके सभी नाम शुभ[1] हैं और (हे नबी!) नमाज़ में स्वर न तो ऊँचा करो और न उसे नीचा करो और इन दोनों के बीच की राह[2] अपनाओ।
1. अरब में "अल्लाह" शब्द प्रचलित था, मगर "रह़मान" प्रचलित न था। इस लिये, वह इस नाम पर आपत्ति करते थे। यह आयत इसी का उत्तर है। 2. ह़दीस में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (आरंभिक युग में) मक्का में छुप कर रहते थे। और जब अपने साथियों को ऊँचे स्वर में नमाज़ पढ़ाते थे तो मुश्रिक उसे सुन कर क़ुर्आन को तथा जिस ने क़ुर्आन उतारा है, और जो उसे लाया है, सब को गालियाँ देते थे। अतः अल्लाह ने अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह आदेश दिया। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4722)
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