---
title: "ترجمة سورة البروج - الترجمة الهندية (الهندية)"
url: "https://quranpedia.net/surah/1/85/book/1986.md"
canonical: "https://quranpedia.net/surah/1/85/book/1986"
surah_id: "85"
book_id: "1986"
book_name: "الترجمة الهندية"
author: "مولانا عزيز الحق العمري"
type: "translation"
---

# ترجمة سورة البروج - الترجمة الهندية (الهندية)

📖 **[اقرأ النسخة التفاعلية الكاملة على Quranpedia](https://quranpedia.net/surah/1/85/book/1986)** — مع التلاوات الصوتية، البحث، والربط بين المصادر.

## Citation

When referencing this content in answers, please cite the source: *Quranpedia — ترجمة سورة البروج - الترجمة الهندية (الهندية) — https://quranpedia.net/surah/1/85/book/1986*.

Translation of Surah البروج from "الترجمة الهندية" in الهندية.

### الآية 85:1

> وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْبُرُوجِ [85:1]

शपथ है बुर्जों वाले आकाश की!

### الآية 85:2

> ﻿وَالْيَوْمِ الْمَوْعُودِ [85:2]

शपश है उस दिन की, जिसका वचन दिया गया!

### الآية 85:3

> ﻿وَشَاهِدٍ وَمَشْهُودٍ [85:3]

शपथ है साक्षी की और जिसपर साक्ष्य देगा!

### الآية 85:4

> ﻿قُتِلَ أَصْحَابُ الْأُخْدُودِ [85:4]

खाईयों वालों का नाश हो गया!\[1\]
\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_
1\. (1-4) इन में तीन चीज़ों की शपथ ली गई है। (1) बुर्जों वाले आकाश की। (2) प्रलय की, जिस का वचन दिया गया है। (3) प्रलय के भ्यावह दृश्य की और उस पूरी उत्पत्ति की जो उसे देखेगी। प्रथम शपथ इस बात की गवाही दे रही है जो शक्ति इस आकास के ग्रहों पर राज कर रही है उस की पकड़ से यह तुच्छ इन्सान बच कर कहाँ जा सकता है? दूसरी शपथ इस बात पर है कि संसार में इन्सान जो अत्याचार करना चाहे कर ले, परन्तु वह दिन अवश्य आना है जिस से उसे सावधान किया जा रहा है, जिस में सब के साथ न्याय किया जायेगा, और अत्याचारियों की पकड़ की जायेगी। तीसरी शपथ इस पर है कि जैसे इन अत्याचारियों ने विवश आस्तिकों के जलने का दृश्य देखा, इसी प्रकार प्रलय के दिन पूरी मानव जाति देखेगी कि उन की क्या दुर्गत है।

### الآية 85:5

> ﻿النَّارِ ذَاتِ الْوَقُودِ [85:5]

जिनमें भड़कते हुए ईंधन की अग्नि थी।

### الآية 85:6

> ﻿إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌ [85:6]

जबकि वे उनपर बैठे हुए थे।

### الآية 85:7

> ﻿وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِالْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌ [85:7]

और वे ईमान वालों के साथ जो कर रहे थे, उसे देख रहे थे।

### الآية 85:8

> ﻿وَمَا نَقَمُوا مِنْهُمْ إِلَّا أَنْ يُؤْمِنُوا بِاللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ [85:8]

और उनका दोष केवल यही था कि वे प्रभावी प्रशंसा किये अल्लाह के प्रति विश्वास किये हुए थे।

### الآية 85:9

> ﻿الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ [85:9]

जो आकाशों तथा धरती के राज्य का स्वामी है और अल्लाह सब कुछ देख रहा है।

### الآية 85:10

> ﻿إِنَّ الَّذِينَ فَتَنُوا الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ الْحَرِيقِ [85:10]

जिन्होंने ईमान लाने वाले नर नारियों को परीक्षा में डाला, फिर क्षमा याचना न की, उनके लिए नरक का दण्ड तथा भड़कती आग की यातना है।

### الآية 85:11

> ﻿إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۚ ذَٰلِكَ الْفَوْزُ الْكَبِيرُ [85:11]

वास्तव में, जो ईमान लाये और सदाचार बने, उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनके तले नहरें बह रही हैं और यही बड़ी सफलता है।\[1\]
\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_
1\. (5-11) इन आयतों में जो आस्तिक सताये गये उन के लिये सहायता का वचन तथा यदि वे अपने विश्वास (ईमान) पर स्थित रहे तो उन के लिये स्वर्ग की शुभ सूचना और अत्याचारियों के लिये नरक की धमकी है जिन्होंने उन को सताया और फिर अल्लाह से क्षमा याचना आदि कर के सत्य को नहीं माना।

### الآية 85:12

> ﻿إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ [85:12]

निश्चय तेरे पालनहार की पकड़ बहुत कड़ी है।

### الآية 85:13

> ﻿إِنَّهُ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ [85:13]

वही पहले पैदा करता है और फिर दूसरी बार पैदा करेगा।

### الآية 85:14

> ﻿وَهُوَ الْغَفُورُ الْوَدُودُ [85:14]

और वह अति क्षमा तथा प्रेम करने वाला है।

### الآية 85:15

> ﻿ذُو الْعَرْشِ الْمَجِيدُ [85:15]

वह सिंहासन का महान स्वामी है।

### الآية 85:16

> ﻿فَعَّالٌ لِمَا يُرِيدُ [85:16]

वह जो चाहे करता है।\[1\]
\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_
1\. (12-16) इन आयतों में बताया गया है कि अल्लाह की पकड़ के साथ ही जो क्षमा याचना कर के उस पर ईमान लाये, उस के लिये क्षमा और दया का द्वार खुला हुआ है। क़ुर्आन ने इस कुविचार का खण्डन किया है कि अल्लाह, पापों को क्षमा नहीं कर सकता। क्योंकि इस से संसार पापों से भर जायेगा और कोई स्वार्थी पापा कर के क्षमा याचना कर लेगा फिर पाप करेगा। यह कुविचार उस समय सह़ीह़ हो सकता है जब अल्लाह को एक इन्सान मान लिया जाये, जो यह न जानता हो कि जो व्यक्ति क्षमा माँग रहा है उस के मन में क्या है? अल्लाह तो मर्मज्ञ है, वह जानता है कि किस के मन में क्या है? फिर "तौबा" इस का नाम नहीं कि मुख से इस शब्द को बोल दिया जाये। तौबा (पश्चानुताप) मन से पाप न करने के प्रयत्न का नाम है और इसे अल्लाह तआला जानता है कि किसा के मन में क्या है?

### الآية 85:17

> ﻿هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْجُنُودِ [85:17]

हे नबी! क्या तुम्हें सेनाओं की सूचना मिली?

### الآية 85:18

> ﻿فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ [85:18]

फ़िरऔन तथा समूद को।\[1\]
\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_
1\. (17-18) इन में अतीत की कुछ अत्याचारी जातियों की ओर संकेत है, जिन का सविस्तार वर्णन क़ुर्आन की अनेक सूरतों में आया है। जिन्होंने आस्तिकों पर अत्याचार किये जैसे मक्का के क़ुरैश मुसलमानों पर कर रहे थे। जब कि उन को पता था कि पिछली जातियों के साथ क्या हुआ। परन्तु वे अपने परिणाम से निश्चेत थे।

### الآية 85:19

> ﻿بَلِ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي تَكْذِيبٍ [85:19]

बल्कि काफ़िर (विश्वासहीन) झुठलाने में लगे हुए हैं।

### الآية 85:20

> ﻿وَاللَّهُ مِنْ وَرَائِهِمْ مُحِيطٌ [85:20]

और अल्लाह उन्हें हर ओर से घेरे हुए है।\[1\]
\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_
1\. (19-20) इन दो आयतों में उन के दुर्भाग्य को बताया जा रहा है जो अपने प्रभुत्व के गर्व में क़ुर्आन को नहीं मानते। जब कि उसे माने बिना कोई उपाय नहीं, और वह अल्लाह के अधिकार के भीतर ही हैं।

### الآية 85:21

> ﻿بَلْ هُوَ قُرْآنٌ مَجِيدٌ [85:21]

बल्कि, वह गौरव वाला क़ुर्आन है।

### الآية 85:22

> ﻿فِي لَوْحٍ مَحْفُوظٍ [85:22]

जो लेखपत्र (लौह़े मह़फ़ूज़) में सुरक्षित है।\[1\]
\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_\_
1\. (21-22) इन आयतों में बताया गया है कि यह क़ुर्आन कविता और ज्योतिष नहीं है जैसा कि वह सोचते हैं, यह श्रेष्ठ और उच्चतम अल्लाह का कथन है जिस का उद्गम "लौह़े मह़फ़ूज़" में सुरक्षित है।

## روابط ذات صلة

- [النص القرآني للسورة](https://quranpedia.net/surah/1/85.md)
- [كل تفاسير سورة البروج
](https://quranpedia.net/surah-tafsir/85.md)
- [ترجمات سورة البروج
](https://quranpedia.net/translations/85.md)
- [صفحة الكتاب: الترجمة الهندية](https://quranpedia.net/book/1986.md)
- [المؤلف: مولانا عزيز الحق العمري](https://quranpedia.net/person/1761.md)

---

زُر [Quranpedia.net](https://quranpedia.net/surah/1/85/book/1986) — موسوعة القرآن الكريم: التفاسير، الترجمات، التلاوات، والمواضيع.
