سورة الفاتحة

الترجمة الهندية

ترجمة معاني سورة الفاتحة باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الناشر

مجمع الملك فهد

آية رقم 1
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।
آية رقم 2
सब प्रशंसायें अल्लाह[1] के लिए हैं, जो सारे संसारों का पालनहार[2] है।
1. 'अल्लाह' का अर्थः 'ह़क़ीक़ी पूज्य' है। जो विश्व के रचयिता विधाता के लिये विशेष है। 2. 'पालनहार' होने का अर्थ यह है कि जिस ने इस विश्व की रचना कर के इस के प्रतिपालन की ऐसी विचित्र व्यवस्था की है कि सभी को अपनी आवश्यक्ता तथा स्थिति के अनुसार सब कुछ मिल रहा है। यह विश्व का पूरा कार्य, सूर्य, वायु, जल, धरती सब जीवन की रक्षा एवं जीवन की प्रत्येक योग्यता की रखवाली में लगे हुये हैं, इस से सत्य पूज्य का परिचय एवं ज्ञान होता है।
آية رقم 3
जो अत्यंत कृपाशील और दयावान्[1] है।
1. अर्थात वह विश्व की व्यवस्था एवं रक्षा अपनी अपार दया से कर रहा है, अतः प्रशंसा एवं पूजा के योग्य भी मात्र वही है।
آية رقم 4
जो प्रतिकार[1] (बदले) के दिन का मालिक है।
1. प्रतिकार (बदले) के दिन से अभिप्राय प्रलय का दिन है। आयत का भावार्थ यह है कि सत्य धर्म प्रतिकार के नियम पर आधारित है। अर्थात जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। जैसे कोई जौ बो कर गेहूँ की, तथा आग में कूद कर शीतल होने की आशा नहीं कर सकता, ऐसे ही भले-बुरे कर्मों का भी अपना स्वभाविक गुण और प्रभाव होता है। फिर संसार में भी कुकर्मों का दुष्परिणाम कभी कभी देखा जाता है। परन्तु यह भी देखा जाता है कि दुराचारी और अत्याचारी सुखी जीवन निर्वाह कर लेता है, और उस की पकड़ इस संसार में नहीं होती, इसी लिये न्याय के लिये एक दिन अवश्य होना चाहिये। और उसी का नाम 'क़्यामत' (प्रलय का दिन) है। "प्रतिकार के दिन का मालिक" होने का अर्थ यह है कि संसार में भी उस ने इंसानों को अधिकार और राज्य दिये हैं। परन्तु प्रलय के दिन सब अधिकार उसी का रहेगा। और वही न्याय पूर्वक सब को उन के कर्मों का प्रतिफल देगा।
آية رقم 5
(हे अल्लाह!) हम केवल तुझी को पूजते हैं और केवल तुझी से सहायता मांगते[1] हैं।
1. इन आयतों में प्रार्थना के रूप में मात्र अल्लाह ही की पूजा और उसी को सहायतार्थ गुहारने की शिक्षा दी गई है। इस्लाम की परिभाषा में इसी का नाम 'तौह़ीद' (एकेश्वरवाद) है, जो सत्य धर्म का आधार है। और अल्लाह के सिवा या उस के साथ किसी देवी-देवता आदि को पुकारना, उस की पूजा करना, किसी प्रत्यक्ष साधन के बिना किसी को सहायता के लिये गुहारना, क्षचवम अथवा किसी व्यक्ति और वस्तु में अल्लाह का कोई विशेष गुण मानना आदि एकेश्वरवाद (तौह़ीद) के विरुध्द हैं जो अक्षम्य पाप हैं। जिस के साथ कोई पुण्य का कार्य मान्य नहीं।
آية رقم 6
हमें सुपथ (सीधा मार्ग) दिखा।
उनका मार्ग, जिनपर तूने पुरस्कार किया।[1] उनका नहीं, जिनपर तेरा प्रकोप[2] हुआ और न ही उनका, जो कुपथ (गुमराह) हो गये।
1. इस आयत में सुपथ (सीधी राह) का चिन्ह यह बताया गया है कि यह उन की राह है, जिन पर अल्लाह का पुरस्कार हुआ। उन की नहीं, जो प्रकोपित हुये और न उन की, जो सत्य मार्ग से बहक गये। 2. 'प्रकोपित' से अभिप्राय वे हैं, जो सत्य धर्म से, जानते हुये, मात्र अभिमान अथवा अपने पुर्वजों की परम्परागत प्रथा के मोह में अथवा अपनी बड़ाई के जाने के भय से, नहीं मानते। 'कुपथ' (गुमराह) से अभिप्रेत वह हैं, जो सत्य धर्म के होते हुए, उस से दूर हो गये और देवी-देवताओं आदि में अल्लाह के विशेष गुण मान कर उन को रोग निवारण, दुःख दूर करने और सुख-संतान आदि देने के लिये गुहारने लगे।
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