سورة الأنبياء

الترجمة الهندية

ترجمة معاني سورة الأنبياء باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الناشر

مجمع الملك فهد

آية رقم 1
समीप आ गया है लोगों के ह़साब[1] का समय, जबकि वे अचेतना में मुँह फेरे हुए हैं।
1. अर्थात प्रलय का समय, फिर भी लोग उस से अचेत माया मोह में लिप्त हैं।
नहीं आती उनके पास, उनके पालनहार की ओर से कोई नई शिक्षा[1], परन्तु उसे सुनते हैं और खेलते रह जाते हैं।
1. अर्थात क़ुर्आन की कोई आयत अवतरित होती है तो उस में चिन्तन और विचार नहीं करते।
निश्चेत हैं उनके दिल और उन्होंने चुपके-चुपके आपस में बातें कीं, जो अत्याचारी हो गयेः ये (नबी) तो बस एक पुरुष है तुम्हारे समान, तो क्या तुम जादू के पास जाते हो, जबकि तुम देखते हो[1]?
1. अर्थात यह कि वह तुम्हारे जैसा मनुष्य है, अतः इस का जो भी प्रभाव है वह जादू के कारण है।
आप कह दें कि मेरा पालनहार जानता है प्रत्येक बात को, जो आकाश तथा धरती में है और वह सब सुनने-जानने वाला है।
बल्कि उन्होंने कह दिया कि ये[1] बिखरे स्वप्न हैं। बल्कि उस (नबी) ने इसे स्वयं बना लिया है, बल्कि वह कवि है! अन्यथा उसे चाहिए कि हमारे पास कोई निशानी ले आये, जैसे पूर्व के रसूल (निशानियों के साथ) भेजे गये।
1. अर्थात क़ुर्आन की आयतें।
नहीं ईमान[1] लायी इनसे पहले कोई बस्ती, जिसका हमने विनाश किया, तो क्या ये ईमान लायेंगे?
1. अर्थात निशानियाँ देख कर भी ईमान नहीं लायी।
और (हे नबी!) हमने आपसे पहले मनुष्य पुरुषों को ही रसूल बनाकर भेजा, जिनकी ओर वह़्यी भेजते रहे। फिर तुम ज्ञानियों[1] से पूछ लो, यदि तुम (स्वयं) नहीं[2] जानते हो।
1. अर्थात आदि आकाशीय पुस्तकों के ज्ञानियों से। 2. देखियेः सूरह नह़्ल, आयतः43
तथा नहीं बनाये हमने उनके ऐसे शरीर,[1] जो भोजन न करते हों तथा न वे सदावासी थे।
1. अर्थात उन में मनुष्य की ही सब विशेषतायें थीं।
آية رقم 9
फिर हमने पूरे कर दिये, उनसे किये हुए वचन और हमने बचा लिया उन्हें और जिसे हमने चाहा और विनाश कर दिया उल्लंघनकारियों का।
निःसंदेह, हमने उतार दी है तुम्हारी ओर एक पुस्तक (क़ुर्आन) जिसमें तुम्हारे लिए शिक्षा है। तो क्या तुम समझते नहीं हो?
और हमने तोड़कर रख दिया बहुत सी बस्तियों को, जो अत्याचारी थीं और हमने पैदा कर दिया उनके पश्चात् दूसरी जाति को।
آية رقم 12
फिर जब उन्हें संवेदन हो गया हमारे प्रकोप का, तो अकस्मात् वहाँ से भागने लगे।
(कहा गया) भागो नहीं! तथा तुम वापस जाओ, जिस सुख-सुविधा में थे तथा अपने घरों की ओर, ताकि तुमसे पूछा[1] जाये।
1. अर्थात यह कि यातना आने पर तुम्हारी क्या दशा हुयी?
آية رقم 14
उन्होंने कहाःहाय हमारा विनाश! वास्वम में, हम अत्याचारी थे।
آية رقم 15
और फिर बराबर यही उनकी पुकार रही, यहाँतक कि हमने बना दिया उन्हें कटी खेती के समान बुझे हुए।
آية رقم 16
औप हमने नहीं पैदा किया है आकाश और धरती को तथा जो कुछ दोनों के बीच है, खेल के लिए।
यदि हम कोई खेल बनाना चाहते, तो उसे अपने पास ही से बना[1] लेते, यदि हमें ये करना होता।
1. अर्थात इस विशाल विश्व को बनाने की आवश्यक्ता न थी। इस आयत में यह बताया जा रहा है कि इस विश्व को खेल नहीं बनाया गया है। यहाँ एक साधारण नियम काम कर रहा है। और वह सत्य और असत्य के बीच संघर्ष का नियम है। अर्थात यहाँ जो कुछ होता है वह सत्य की विजय और असत्य की पराजय के लिये होता है। और सत्य के आगे असत्य समाप्त हो कर रह जाता है।
बल्कि हम मारते हैं सत्य से असत्य पर, तो वह उसका सिर कुचल देता है और वह अकस्मात समाप्त हो जाता है और तुम्हारे लिए विनाश है, उन बातों के कारण, जो तुम बनाते हो।
और उसी का है, जो आकाशों तथा धरती में है और जो फ़रिश्ते उसके पास हैं, वे उसकी इबादत (वंदना) से अभिमान नहीं करते और न थकते हैं।
آية رقم 20
वे रात और दिन उसकी पवित्रता का गान करते हैं तथा आलस्य नहीं करते।
آية رقم 21
क्या इनके बनाये हुए पार्थिव पूज्य ऐसे हैं, जो (निर्जीव) को जीवित कर देते हैं?
यदि होते उन दोनों[1] में अन्य पूज्य, अल्लाह के सिवा, तो निश्चय दोनों की व्यवस्था बिगड़[2] जाती। अतः पवित्र है अल्लाह, अर्श (सिंहासन) का स्वामी, उन बातों से, जो वे बता रहे हैं।
1. क्यों कि दोनों अपनी-अपनी शक्ति का प्रयोग करते और उन के आपस के संघर्ष के कारण इस विश्व की व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाती। अतः इस विश्व की व्यवस्था स्वयं बता रही है कि इस का स्वामी एक ही है। और वही अकेला पूज्य है।
آية رقم 23
वह उत्तर दायी नहीं है अपने कार्य का और सभी (उसके समक्ष) उत्तर दायी हैं।
क्या उन्होंने बना लिए हैं, उसके सिवा अनेक पूज्य? (हे नबी!) आप कहें कि अपना प्रमाण लाओ। ये (क़ुर्आन) उनके लिए शिक्षा है, जो मेरे साथ हैं और ये मुझसे पूर्व के लोगों की शिक्षा[1] है, बल्कि उनमें से अधिक्तर सत्य का ज्ञान नहीं रखते। इसी कारण, वे विमुख हैं।
1. आयत का भावार्थ यह है कि यह क़ुर्आन है और यह तौरात तथा इंजील हैं। इन में कोई प्रमाण दिखा दो कि अल्लाह के अन्य साझी और पूज्य हैं। बल्कि यह मिश्रणवादी निर्मूल बातें कर रहे हैं।
और नहीं भेजा हमने आपसे पहले कोई भी रसूल, परन्तु उसकी ओर यही वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत (वंदना) करो।
और उन (मुश्रिकों) ने कहा कि बना लिया है अत्यंत कृपाशील ने संतति। वह पवित्र है। बल्कि वे (फ़रिश्ते)[1] आदरणीय भक्त हैं।
1. अर्थात अरब के मिश्रणवादी जिन फ़रिश्तों को अल्लाह की पुत्रियाँ कहते हैं, वास्तव में वह उस के भक्त तथा दास हैं।
آية رقم 27
वे उसके समक्ष बढ़कर नहीं बोलते और उसके आदेशानुसार काम करते हैं।
वह जानता है, जो उनके सामने है और जो उनसे ओझल है। वह किसी की सिफ़ारिश नहीं करेंगे, उसके सिवा जिससे वह (अल्लाह) प्रसन्न[1] हो तथा वह उसके भय से सहमे रहते हैं।
1. अर्थात जो एकेश्वरवादी होंगे।
और जो कह दे उनमें से कि मैं पूज्य हूँ अल्लाह के सिवा, तो वही है, जिसे हम दण्ड देंगे नरक का, इसी प्रकार, हम दण्ड दिया करते हैं अत्याचारियों को।
और क्या उन्होंने विचार नहीं किया, जो काफ़िर हो गये कि आकाश तथा धरती दोनों मिले हुए[1] थे, तो हमने दोनों को अलग-अलग किया तथा हमने बनाया पानी से प्रत्येक जीवित चीज़ को? फिर क्या वे (इस बात पर) विश्वास नहीं करते?
1. अर्थात अपनी उतपत्ति के आरंभ में।
और हमने बना दिये धरती में पर्वत, ताकि झुक न[1] जाये उनके साथ और बना दिये उन (पर्वतों) में चौड़े रास्ते, ताकि लोग राह पायें।
1. अर्थात यह वर्वत न होते तो धरती सदा हिलती रहती।
और हमने बना दिया आकाश को सुरक्षित छत, फिर भी वे उसके प्रतीकों (निशानियों) से मुँह फेरे हुए हैं।
तथा वही है, जिसने उत्पत्ति की है रात्रि तथा दिवस की और सूर्य तथा चाँद की, प्रत्येक एक मण्डल में तैर रहे[1] हैं।
1. क़ुर्आन अपनी शिक्षा में विश्व की व्यवस्था से एक के पूज्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यहाँ भी आयतः 30 से 33 तक एक अल्लाह के पूज्य होने का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है।
और (हे नबी!) हमने नहीं बनायी है, किसी मनुष्य के लिए आपसे पहले नित्यता। तो यदि, आप मर[1] जायें, तो क्या वे नित्य जीवी हैं?
1. जब मनुष्य किसी का विरोधी बन जाता है तो उस के मरण की कामना करता है। यही दशा मक्का के काफ़िरों की भी थी। वह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मरण की कामना कर रहे थे। फिर यह कहा गया है कि संसार के प्रत्येक जीव को मरना है। यह कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात तो यह है कि अल्लाह इस संसार में सब के कर्मों की परीक्षा कर रहा है। और फिर सब को अपने कर्मों का फल भी परलोक में मिलना है तो कौन इस परीक्षा में सफल होता है?
प्रत्येक जीव को मरण का स्वाद चखना है और हम तुम्हारी परीक्षा कर रहे हैं, अच्छी तथा बुरी परिस्थितियों से तथा तुम्हें हमारी ही ओर फिर आना है।
तथा जब देखते हैं आपको, जो काफ़िर हो गये, तो बना लेते हैं आपको उपहास, (वे कहते हैं:) क्या यही है, जो तुम्हारे पूज्यों की चर्चा किया करता है? जबकि वे स्वयं रह़मान (अत्यंत कृपाशील) के स्मरण के[1] निवर्ती हैं।
1. अर्थात अल्लाह को नहीं मानते।
मनुष्य जन्मजात व्यग्र (अधीर) है, मैं शीघ्र तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा दूँगा। अतः, तुम जल्दी न करो।
آية رقم 38
तथा वे कहते हैं कि कब पूरी होगी ये[1] धमकी, यदि तुम लोग सच्चे हो?
1. अर्थात हमारे न मानने पर यातना आने की धमकी।
यदि जान लें, जो काफ़िर हो गये हैं, उस समय को, जब वे नहीं बचा सकेंगे अपने मुखों को अग्नि से और न अपनी पीठों को और न उनकी कोई सहायता की जायेगी (तो ऐसी बातें नहीं करेंगे।)
बल्कि वह समय उनपर आ जायेगा अचानक और उन्हें आश्चर्य चकित कर देगा, जिसे वे फेर नहीं सकेंगे और न उन्हें समय दिया जायेगा।
और उपहास किया गया बहुत-से रसूलों का, आपसे पहले, तो घेर लिया उन्हें जिन्होंने उपहास किया उनमें से, उस चीज़ ने, जिस[1] का उपहास कर रहे थे।
1. अर्थात यातना ने।
आप पूछिये कि कौन तुम्हारी रक्षा करेगा रात तथा दिन में अत्यंत कृपाशील[1] से? बल्कि वे अपने पालनहार की शिक्षा (क़र्आन) से विमुख हैं।
1. अर्थात उस की यातना से।
क्या उनके पूज्य हैं, जो उन्हें बचायेंगे हम से? वे स्वयं अपनी सहायता नहीं कर सकेंगे और न हमारी ओर से उनका साथ दिया जायेगा।
बल्कि हमने जीवन का लाभ पहुँचाया है, उनको तथा उनके पूर्वजों को, यहाँतक कि (सुखों में) उनकी बड़ी आयु गुज़र[1] गयी, तो क्या वह नहीं देखते कि हम धरती को कम करते आ रहे हैं उसके किनारों से, फिर क्या वे विजय हो रहे हैं?
1.अर्थ यह है कि वह मक्का के काफ़िर सुख-सुविधा मंद रहने के कारण अल्लाह से विमुख हो गये हैं, और सोचते हैं कि उन पर यातना नहीं आयेगी और वही विजयी होंगे। जब कि दशा यह है कि उन के अधिकार का क्षेत्र कम होता जा रहा है और इस्लाम बराबर फैलता जा रहा है। फिर भी वे इस भ्रम में हैं कि वे प्रभुत्व प्राप्त कर लेंगे।
(हे नबी!) आप कह दें कि मैं तो वह़्यी ही के आधार पर तुम्हें सावधान कर रहा हूँ। (परन्तु) बहरे पुकार नहीं सुनते, जब उन्हें सावधान किया जाता है।
और यदि छू जाये उन्हें आपके पालनहार की तनिक भी यातना, तो अवश्य पुकारेंगे कि हाय हमारा विनाश! निश्चय ही हम अत्याचारी[1] थे।
1. अर्थात अपने पापों को स्वीकार कर लेंगे।
और हम रख देंगे न्याय का तराज़ू[1] प्रलय के दिन, फिर नहीं अत्याचार किया जायेगा किसी पर कुछ भी तथा यदि होगा राय के दाने के बराबर (किसी का कर्म) तो हम उसे सामने ले आयेंगे और हम बस (काफ़ी) हैं ह़िसाब लेने वाले।
1. अर्थात कर्मों को तोलने और ह़िसाब करने के लिये, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को उस के कर्मानुसार बदला दिया जाये।
آية رقم 48
और हम दे चुके हैं, मूसा तथा हारून को विवेक, प्रकाश और शिक्षाप्रद पुस्तक आज्ञाकारियों के लिए।
آية رقم 49
जो डरते हों अपने पालनहार से बिन देखे और वे प्रलय से भयभीत हों।
آية رقم 50
और ये (क़ुर्आन) एक शुभ शिक्षा है, जिसे हमने उतारा है, तो क्या तुम इसके इन्कारी हो?
और हमने प्रदान की थी इब्राहीम को, उसकी चेतना इससे पहले और हम उससे भली-भाँति अवगत थे।
जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहाः ये प्रतिमाएँ (मूर्तियाँ) कैसी हैं, जिनकी पूजा में तुम लगे हुए हो?
آية رقم 53
उन्होंने कहाः हमने पाया है अपने पूर्वजों को इनकी पूजा करते हुए।
آية رقم 54
उस (इब्राहीम) ने कहाः निश्चय तुम और तुम्हारे पूर्वज खुले कुपथ में हो।
آية رقم 55
उन्होंने कहाः क्या तुम लाये हो हमारे पास सत्य या तुम उपहास कर रहे हो?
उसने कहाः बल्कि तुम्हारा पालनहार आकाशों तथा धरती का पालनहार है, जिसने उन्हें पैदा किया है और मैं तो इसीका साक्षी हूँ।
آية رقم 57
तथा अल्लाह की शपथ! मैं अवश्य चाल चलूँगा तुम्हारी मूर्तियों के साथ, इसके पश्चात् कि तुम चले जाओ।
آية رقم 58
फिर उसने कर दिया उन्हें खण्ड-खण्ड, उनके बड़े के सिवा, ताकि वे उसकी ओर फिरें।
آية رقم 59
उन्होंने कहाः किसने ये दशा कर दी है, हमारे पूज्यों ( देवताओं) की? वास्तव में, वह कोई अत्याचारी होगा!
آية رقم 60
लोगों ने कहाः हमने सुना है एक नवयुवक को उनकी चर्चा करते, जिसे इब्राहीम कहा जाता है।
آية رقم 61
लोगों ने कहाः उसे लाओ लोगों के सामने, ताकि लोग देखें।
آية رقم 62
उन्होंने पूछाः क्या तूने ही ये किया है, हमारे पूज्यों के साथ, हे इब्राहीम?
उसने कहाः बल्कि इसे इनके इस बड़े ने किया[1] है, तो इन्हीं से पूछ लो, यदि ये बोलते हों?
1. यह बात इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उन्हें उन के पूज्यों की विवशता दिखाने के लिये कही।
آية رقم 64
फिर अपने मन में वे सोच में पड़ गये और (अपने मन में) कहाः वास्तव में, तुम्हीं अत्याचारी हो।
फिर वह ओंधे कर दिये गये अपने सिरों के बल[1] ( और बोलेः) तू जानता है कि ये बोलते नहीं हैं।
1. अर्थात सत्य को स्वीकार कर के उस से फिर गये।
इब्राहीम ने कहाः तो क्या तुम इबादत (वंदना) अल्लाह के सिवा उसकी करते हो, जो न तुम्हें कुछ लाभ पहुँचा सकते हैं और न तुम्हें हानि पहूँचा सकते हैं?
तुफ़ (थू) है तुमपर और उसपर जिसकी तुम इबादत (वंदना) करते हो अल्लाह को छोड़कर। तो क्या तुम समझ नहीं रखते हो?
آية رقم 68
उन्होंने कहाः इसे जला दो तथा सहायता करो अपने पूज्यों की, यदि तुम्हें कुछ करना है।
آية رقم 69
हमने कहाः हे अग्नि! तू शीतल तथा शान्ति बन जा, इब्राहीम पर।
آية رقم 70
और उन्होंने उसके साथ बुराई चाही, तो हमने उन्हीं को क्षतिग्रस्त कर दिया।
آية رقم 71
और हम, उस (इब्राहीम) को बचाकर ले गये तथा लूत[1] को, उस भूमि[2] की ओर, जिसमें हमने सम्पन्नता रखी है, विश्व वासियों के लिए।
1. लूत अलैहिस्सलाम इब्राहीम अलैहिस्सलाम के भतीजे थे। 2. इस से अभिप्राय सीरिया देश है। और अर्थ यह है कि अल्लाह ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम की अग्नि से रक्षा करने के पश्चात् उन्हें सीरिया देश की ओर प्रस्तथान कर जाने का आदेश दिया। और वह सीरिया चले गये।
और हमने उसे प्रदान किया (पुत्र) इस्ह़ाक़ और (पौत्र) याक़ूब उसपर अधिक और प्रत्येक को हमने सत्कर्मी बनाया।
और हमने उन्हें अग्रणी (प्रमुख) बना दिया, जो हमारे आदेशानुसार (लोगों को) सुपथ दर्शाते हैं तथा हमने वह़्यी (प्रकाशना) की, उनकी ओर सत्कर्मों के करने, नमाज़ की स्थापना करने और ज़कात देने की तथा वे हमारे ही उपासक थे।
तथा लूत को हमने निर्णय शक्ति और ज्ञान दिया और बचा लिया उस बस्ती से, जो दुष्कर्म कर रही थी, वास्तव में, वे बुरे अवज्ञाकारी लोग थे।
آية رقم 75
और हमने प्रवेश दिया उसे अपनी दया में, वास्तव में, वह सदाचारियों में से था।
तथा नूह़ को (याद करो) जब उसने पुकारा इन (नबियों) से पहले। तो हमने उसकी पुकार सुन ली, फिर उसे और उसके घराने को मुक्ति दी महा पीड़ा से।
और उसकी सहायता की, उस जाति के मुक़ाबले में, जिन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठला दिया, वास्तव में, वे बुरे लोग थे। अतः हमने डुबो दिया उन सभी को।
तथा दावूद और सुलैमान को (याद करो) जब वे दोनों निर्णय कर रहे थे, खेत के विषय में, जब रात्रि में चर गईं उसे दूसरों की बकरियाँ और हम उनका निर्णय देख रहे थे।
तो हमने उसका उचित निर्णय समझा दिया सुलैमान[1] को और प्रत्येक को हमने प्रदान किया था निर्णय शक्ति तथा ज्ञान और हमने अधीन कर दिया था दावूद के साथ पर्वतों को, जो (अल्लाह की पवित्रता का) वर्णन करते थे तथा पक्षियों को और हम ही इसकार्य के करने वाले थे।
1. ह़दीस में वर्णित है कि दो नारियों के साथ शिशु थे। भेड़िया आया और एक को ले गया तो एक ने दूसरे से कहा कि तुम्हारे शिशु को ले गया है और निर्णय के लिये दावूद के पास गयीं। उन्हों ने बड़ी के लिये निर्णय कर दिया। फिर वह सुलैमान अलैहिस्सलाम के पास आयीं, उन्हों ने कहाः छुरी लाओ, मैं तुम दोनों के लिये दो भाग कर दूँ। तो छोटी ने कहाः ऐसा न करें, अल्लाह आप पर दया करे, यह उसी का शिशु है। यह सुन कर उन्हों ने छोटी के पक्ष में निर्णय कर दिया। ( बुख़ारीः 3427, मुस्लिमः1720)
तथा हमने उसे (दावूद को) सिखाया तुम्हारे लिए कवच बनाना, ताकि तुम्हें बचाये तुम्हारे आक्रमण से, तो क्या तुम कृतज्ञ हो?
और सुलैमान के अधीन कर दिया उग्र वायु को, जो चल रही थी उसके आदेश से,[1] उस धरती की ओर जिसमें हमने सम्पन्नता (विभूतियाँ) रखी है और हम ही सर्वज्ञ हैं।
1. अर्थात वायु उन के सिंहासन को उन के राज्य में जहाँ चाहते क्षणों में पहुँचा देती थी।
तथा शैतानों में से उन्हें (उसके अधीन कर दिया) जो उसके लिए डुबकी लगाते[1] तथा इसके सिवा दूसरे कार्य करते थे और हम ही उनके निरीक्षक[1] हैं।
1. अर्थात मोतियाँ तथा जवाहिरात निकालने के लिये। 2. ताकि शैतान उन को कोई हानि न पहुँचाये।
तथा अय्यूब (की उस स्थिति) को (याद करो), जब उसने पुकारा अपने पालनहार को कि मुझे रोग लग गया है और तू सबसे अधिक दयावान् है।
तो हमने उसकी गुहार सुन ली[1] और दूर कर दिया, जो दुःख उसे था और प्रदान कर दिया उसे उसका परिवार तथा उतने ही और उनके साथ, अपनी विशेष दया से तथा शिक्षा के लिए उपासकों की।
1. आदरणीय अय्यूब अलैहिस्सलाम की अल्लाह ने उन के धन-धान्य तथा परिवार में परीक्षा ली। वह स्वयं रोगग्रस्त हो गये। परन्तु उन के धैर्य के कारण अल्लाह ने उन को फिर स्वस्थ कर दिया और धन-धान्य के साथ ही पहले से दो गुने पुत्र प्रदान किये।
آية رقم 85
तथा इस्माईल, इद्रीस तथा ज़ुल किफ़्ल को (याद करो), सभी सहनशीलों में से थे।
آية رقم 86
और हमने प्रवेश दिया उनको अपनी दया में, वास्तव में, वे सदाचारी थे।
तथा ज़ुन्नून[1] को, जब वे चला[2] गया क्रोधित होकर और सोचा कि हम उसे पकड़ेंगे नहीं, अन्ततः, उसने पुकारा अन्धेरे में कि नहीं है कोई पूज्य तेरे सिवा, तू पवित्र है, वास्तव में, मैं ही दोषी[3] हूँ।
1. ज़ुन्नून से अभिप्रेत यूनुस अलैहिस्सलाम हैं। नून का अर्थ अर्बी भाषा में मछली है। उन को "साह़िबुल ह़ूत" कहा गया है। अर्थात मछली वाला। क्यों कि उन को अल्लाह के आदेश से एक मछली ने निगल लिया था। इस का कुछ वर्णन सूरह यूनुस में आ चुका है। और कुछ सूरह साफ़्फ़ात में आ रहा है। 2. अर्थात अपनी जाति से क्रोधित हो कर अल्लाह के आदेश के बिना अपनी बस्ती से चले गये। इसी पर उन्हें पकड़ लिया गया। 3. सह़ीह़ ह़दीस में आता है कि जो भी मुसलमान इस शब्द के साथ किसी विषय में दुआ करेगा तो अल्लाह उस की दुआ को स्वीकार करेगा। (तिर्मिज़ीः3505)
तब हमने उसकी पुकार सुन ली तथा मुक्त कर दिया शोक से और इसी प्रकार, हम बचा लिया करते हैं, ईमान वालों को।
तथा ज़करिय्या को (याद करो), जब पुकारा उसने अपने पालनहार[1] को, हे मेरे पालनहार! मुझे मत छोड़ दे अकेला और तू सबसे अच्छा उत्तराधिकारी है।
1. आदरणीय ज़करिय्या ने एक पुत्र के लिये प्रार्थना की, जिस का वर्णन सूरह आले इमरान तथा सूरह ता-हा में आ चुका है।
तो हमने सुन ली उसकी पुकार तथा प्रदान कर दिया उसे यह़्या और सुधार दिया उसके लिए उसकी पत्नी को। वास्तव में, वे सभी दौड़-धूप करते थे सत्कर्मों में और हमसे प्रार्थना करते थे रूचि तथा भय के साथ और हमारे आगे झुके हुए थे।
तथा जिसने रक्षा की अपनी सतीत्व[1] की, तो फूँक दी हमने उसके भीतर अपनी आत्मा से और उसे तथा उसके पुत्र को बना दिया एक निशानी संसार वासियों के लिए।
1. इस से संकेत मर्य़म तथा उस के पुत्र ईसा (अलैहिस्सलाम) की ओर है।
آية رقم 92
वास्तव में, तुम्हारा धर्म एक ही धर्म[1] है और मैं ही तुम सबका पालनहार (पूज्य) हूँ। अतः, मेरी ही इबादत (वंदना) करो।
1. अर्थात सब नबियों का मूल धर्म एक है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहाः मैं मर्यम के पुत्र ईसा से अधिक संबन्ध रखता हूँ। क्यों कि सब नबी भाई-भाई हैं, उन की मायें अलग अलग हैं, सब का धर्म एक है। (सह़ीह़ बुख़ारीः3443) और दूसरी ह़दीस में यह अधिक है किः मेरे और उस के बीच कोई और नबी नहीं है। (सह़ीह़ बुख़ारीः3442)
آية رقم 93
और खण्ड-खण्ड कर दिया लोगों ने अपने धर्म को (विभेद करके) आपस में, सबको हमारी ओर ही फिर आना है।
फिर जो सदाचार करेगा और वह एकेश्वरवादी हो, तो उसके प्रयास की उपेक्षा नहीं की जायेगी और हम उसे लिख रहे हैं।
آية رقم 95
और असंभव है किसी भी बस्ती पर, जिसका हमने विनाश कर[1] दिया कि वह फिर (संसार में) आ जाये।
1. अर्थात उस के वासियों के दुराचार के कारण।
यहाँ तक कि जब खोल दिये जायेंगे याजूज तथा माजूज[1] और वे प्रत्येक ऊँचाई से उतर रहे होंगे।
1. याजूज तथा माजूज के विषय में देखियेः सूरह कह्फ, आयतः93 से 100 तक का अनुवाद।
और समीप आ जायेगा सत्य[1] वचन, तो अकस्मात खुली रह जायेँगी काफ़िरों की आँखें, ( वे कहेंगेः) "हाय हमारा विनाश!" हम असावधान रह गये इससे, बल्कि हम अत्याचारी थे।
1. सत्य वचन से अभिप्राय प्रलय का वचन है।
निश्चय तुमसब तथा तुम जिन (मूर्तियों) को पूज रहे हो अल्लाह के अतिरिक्त, नरक के ईंधन हैं, तुमसब वहाँ पहुँचने वाले हो।
यदि वे वास्तव में पूज्य होते, तो नरक में प्रवेश नहीं करते और प्रत्येक उसमें सदावासी होंगे।
آية رقم 100
उनकी उसमें चीखें होंगी तथा वे उसमें (कुछ) सुन नहीं सकेंगे।
آية رقم 101
(परन्तु) जिनके लिए पहले ही से हमारी ओर से भलाई का निर्णय हो चुका है, वही उससे दूर रखे जायेंगे।
वे उस (नरक) की सरसर भी नहीं सुनेंगे और अपनी मनचाही चीज़ों में सदा (मगन) रहेंगे।
उन्हें उदासीन नहीं करेगी (प्रलय के दिन की) बड़ी व्यग्रता तथा फ़रिश्ते उन्हें हाथों-हाथ ले लेंगे, (तथा कहेंगेः) यही तुम्हारा वह दिन है, जिसका तुम्हें वचन दिया जा रहा था।
जिस दिन हम लपेट[1] देंगे आकाश को, पंजिका के पन्नों को लपेट देने के समान, जैसे हमने आरंभ किया था प्रथम उत्पत्ति का, उसी प्रकार, उसे[2] दुहरायेंगे, इस (वचन) को पूरा करना हमपर है और हम पूरा करके रहेंगे।
1. (देखियेः सूरह ज़ुमर, आयतः67) 2. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भाषण दिया कि लोग अल्लाह के पास बिना जूते के, नग्न तथा बिना ख़तने के एकत्र किये जायेंगे। फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम सर्व प्रथम वस्त्र पहनाये जायेंगे। (सह़ीह़ बुख़ारीः 3349)
तथा हमने लिख दिया है ज़बूर[1] में शिक्षा के पश्चात् कि धरती के उत्तराधिकारी मेरे सदाचारी भक्त होंगे।
1. ज़बूर वह पुस्तक है जो दावूद अलैहिस्सलाम को प्रदान की गयी।
آية رقم 106
वस्तुतः, इस (बात) में एक बड़ा उपदेश है उपासकों के लिए।
آية رقم 107
और (हे नबी!) हमने आपको नहीं भेजा है, किन्तु समस्त संसार के लिए दया बना[1] कर।
1. अर्थात जो आप पर ईमान लायेगा, वही लोक-परलोक में अल्लाह की दया का अधिकारी होगा।
आप कह दें कि मेरी ओर तो बस यही वह़्यी की जा रही है कि तुम सबका पूज्य बस एक ही पूज्य है, फिर क्या तुम उसके आज्ञाकारी[1] हो?
1. अर्थात दया एकेश्वरवाद में है, मिश्रणवाद में नहीं।
फिर यदि वे विमुख हों, तो आप कह दें कि मैंने तुम्हें समान रूप से सावधान कर दिया[1] और मैं नहीं जानता कि समीप है अथवा दूर जिसका वचन तुम्हें दिया जा रहा है।
1. अर्थात ईमान न लाने और मिश्रणवाद के दुष्परिणाम से।
آية رقم 110
वास्तव में, वही जानता है खुली बात को तथा जानता है जो कुछ तुम छुपाते हो।
آية رقم 111
तथा मुझे ये ज्ञान (भी) नहीं, संभव है ये[1] तुम्हारे लिए कोई परीक्षा हो तथा लाभ हो एक निर्धारित समय तक?
1. अर्थात यातना में विलम्ब।
उस (नबी) ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! सत्य के साथ निर्णय कर दे और हमारा पालनहार अत्यंत कृपाशील है, जिससे सहायता माँगी जाये उन बातों पर, जो तुम लोग बना रहे हो।
تقدم القراءة