سورة الإسراء

الترجمة الهندية

ترجمة معاني سورة الإسراء باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الناشر

مجمع الملك فهد

पवित्र है वह जिसने रात्रि के कुछ क्षण में अपने भक्त[1] को मस्जिदे ह़राम (मक्का) से मस्जिदे अक़्सा तक यात्रा कराई। जिसके चतुर्दिग हमने सम्पन्नता रखी है, ताकि उसे अपनी कुछ निशानियों का दर्शन कराएँ। वास्तव में, वह सब कुछ सुनने-जानने वाला है।
1. अर्थात मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को। इस आयत में उस सुप्रसिध्द सत्य की चर्चा की गई है जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से संबन्धित है। जिसे परिभाषिक रूप से "इस्राअ" कहा जाता है। जिस का अर्थ हैः रात की यात्रा। इस का सविस्तार विवरण ह़दीसों में किया गया है। भाष्यकारों के अनुसार हिजरत के कुछ पहले अल्लाह ने आप को रात्रि के कुछ भाग में मक्का से मस्जिदे अक्सा तक जो फ़िलस्तीन में है यात्रा कराई। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है कि जब मक्का के मिश्रणवादियों ने मुझे झुठलाया, तो मैं ह़िज्र में (जो काबा का एक भाग है) खड़ा हो गया। और अल्लाह ने बैतुल मक़्दिस को मेरे लिये खोल दिया। और मैं उन्हें उस की निशानियाँ देख कर बताने लगा। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीसः4710)
और हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की और उसे बनी इस्राईल के लिए मार्गदर्शन का साधन बनाया कि मेरे सिवा किसी को कार्यसाधक[1] न बनाओ।
1. जिस पर निर्भर रहा जाये।
हे उनकी संतति जिन्हें हमने नूह़ के साथ (नौका) में सवार किया। वास्तव में, वह अति कृतज्ञ[1] भक्त था।
1. अतः हे सर्व मानव तुम भी अल्लाह के उपकार के अभारी बनो।
और हमने बनी इस्राईल को, उनकी पुस्तक में सूचित कर दिया था कि तुम इस[1] धरती में दो बार उपद्रव करोगे और बड़ा अत्याचार करोगे।
1. अर्थात बैतुल मक़्दिस में।
तो जब प्रथम उपद्रव का समय आया, तो हमने तुमपर अपने प्रबल योध्दा भक्तों को भेज दिया, जो नगरों में घुस गये और इस वचन को पूरा होना ही[1] था।
1. इस से अभिप्रेत बाबिल के राजा बुख़्तनस्सर का आक्रमण है जो लग भग छः सौ वर्ष पूर्व मसीह़ हुआ। इस्राईलियों को बंदी बना कर इराक़ ले गया और बैतुल मुक़द्दस को तहस नहस कर दिया।
फिर हमने उनपर तुम्हें पुनः प्रभुत्व दिया तथा धनों और पुत्रों द्वारा तुम्हारी सहायता की और तुम्हारी संख्या बहुत अधिक कर दी।
यदि तुम भला करोगे, तो अपने लिए और यदि बुरा करोगे, तो अपने लिए। फिर जब दूसरे उपद्रव का समय आया ताकि (शत्रु) तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें और मस्जिद (अक़्सा) में वैसे ही प्रवेश कर जायेँ, जैसे प्रथम बार प्रवेश कर गये और ताकि जो भी उनके हाथ आये, उसे पूर्णता नाश[1] कर दे।
1. जब बनी इस्राईल पुनः पापाचारी बन गये, तो रोम के राजा क़ैसर ने लग भग सन् 70 ई◦ में बैतुल् मक़्दिस पर आक्रमण कर के उन की दुर्गत बना दी। और उन की पुस्तक तौरात का नाश कर दिया और एक बड़ी संख्या को बंदी बना लिया। यह सब उन के कुकर्म के कारण हुआ।
संभव है कि तुम्हारा पालनहार तुमपर दया करे और यदि तुम प्रथम स्थिति पर आ गये, तो हमभी फिर[1] आयेंगे और हमने नरक को काफ़िरों के लिए कारावास बना दिया है।
1. अर्थात संसारिक दण्ड देने के लिये।
वास्तव में, ये क़ुर्आन वह डगर दिखाता है, जो सबसे सीधी है और उन ईमान वालों को शुभ सूचना देता है, जो सदाचार करते हैं कि उन्हीं के लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है।
और जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं लाते, हमने उनके लिए दुःखदायी यातना तैयार कर रखी है।
और मनुष्य (क्षुब्ध होकर) अभिशाप करने लगता[1] है, जैसे भलाई के लिए प्रार्थना करता है और मनुष्य बड़ा ही उतावला है।
1. अर्थात स्वयं को और अपने घराने को शापने लगता है।
और हमने रात्री तथा दिवस को दो प्रतीक बनाया, फिर रात्री के प्रतीक को हमने अन्धकार बनाया तथा दिवस के प्रतीक को प्रकाशयुक्त, ताकि तुम अपने पालनहार के अनुग्रह की (जीविका) की खोज करो और वर्षों तथा ह़िसाब की गिनती जानो तथा हमने प्रत्येक चीज़ का सविस्तार वर्णन कर दिया।
और प्रत्येक मनुष्य के कर्मपत्र को हमने उसके गले का हार बना दिया है और हम उसके लिए प्रलय के दिन एक कर्मलेख निकालेंगे, जिसे वह खुला हुआ पायेगा।
آية رقم 14
अपना कर्मलेख पढ़ लो, आज तू स्वयं अपना ह़िसाब लेने के लिए पर्याप्त है।
जिसने सीधी राह अपनायी, उसने अपने ही लिए सीधी राह अपनायी और जो सीधी राह से विचलित हो गया, उसका (दुष्परिणाम) उसीपर है और कोई दूसरे का बोझ (अपने ऊपर) नहीं लादेगा[1] और हम यातना देने वाले नहीं हैं, जब तक कि कोई रसूल न भेजें[2]।
1. आयत का भावार्थ यह है कि जो सदाचार करता है, वह किसी पर उपकार नहीं करता। बल्कि उस का लाभ उसी को मिलना है। और जो दुराचार करता है, उस का दण्ड भी उसी को भोगना है। 2. ताकि वे यह बहाना न कर सकें कि हम ने सीधी राह को जाना ही नहीं था।
और जब हम किसी बस्ती का विनाश करना चाहते हैं, तो उसके सम्पन्न लोगों को आदेश[1] देते हैं, फिर वे उसमें उपद्व करने लगते[2] हैं, तो उसपर यातना की बात सिध्द हो जाती है और हम उसका पूर्णता उनसूलन कर देते हैं।
1. अर्थात आज्ञा पालन का। 2. अर्थात हमारी आज्ञा का। आयत का भावार्थ यह है कि समाज के सम्पन्न लोगों का दुष्कर्म, अत्याचार और अवैज्ञा पूरी बस्ती के विनाश का कारण बन जाती है।
और हमने बहुत-सी जातियों का नूह़ के पश्चात् विनाश किया है और आपका पालनहार अपने दासों के पापों से सूचित होने-देखने को बहुत है।
जो संसार ही चाहता हो, हम उसे यहीं दे देते हैं, जो हम चाहते हैं, जिसके लिए चाहते हैं। फिर हम उसका परिणाम (परलोक में) नरक बना देते हैं, जिसमें वह निंदित-तिरस्कृत होकर प्रवेश करेगा।
तथा जो परलोक चाहता हो और उसके लिए प्रयास करता हो और वह एकेश्वरवादी हो, तो वही हैं, जिनके प्रयास का आदर सम्मान किया जायेगा।
हम प्रत्येक की सहायता करते हैं, इनकी भी और उनकी भी और आपके पालनहार का प्रदान (किसी से) निषेधित (रोका हुआ) नहीं[1] है।
1. अर्थात अल्लाह संसार में सभी को जीविका प्रदान करता है।
आप विचार करें कि कैसे हमने (संसार में) उनमें से कुछ को कुछ पर प्रधानता दी है और निश्चय परलोक के पद और प्रधानता और भी अधिक होगी।
(हे मानव!) अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना, अन्यथा बुरा और असहाय होकर रह जायेगा।
और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो तथा माता-पिता के साथ उपकार करो, यदि तेरे पास दोनों में से एक वृध्दावस्था को पहुँच जाये अथवा दोनों, तो उन्हें उफ़ तक न कहो और न झिड़को और उनसे सादर बात बोलो।
और उनके लिए विनम्रता का बाज़ू दया से झुका[1] दो और प्रार्थना करोः हे मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन दोनों ने बाल्यावस्था में, मेरा लालन-पालन किया है।
1. अर्थात उन के साथ विनम्रता और दया का व्यवहार करो।
तुम्हारा पालनहार अधिक जानता है, जो कुछ तुम्हारी अन्तरात्माओं (मन) में है। यदि तुम सदाचारी रहे, तो वह अपनी ओर ध्यानमग्न रहने वालों के लिए अति क्षमावान् है।
और समीपवर्तियों को उनका स्वत्व (हिस्सा) दो तथा दरिद्र और यात्री को और अपव्यय[1] न करो।
1. अर्थात अपरिमित और दुष्कर्म में ख़र्च न करो।
वास्तव में, अपव्ययी शैतान के भाई हैं और शैतान अपने पालनहार का अति कृतघ्न है।
और यदि आप उनसे विमुख हों, अपने पालनहार की दया की खोज के लिए जिसकी आशा रखते हों, तो उनसे सरल[1] बात बोलें।
1. अर्थात उन्हें सरलता से समझा दें कि अभी कुछ नहीं है। जैसे ही कुछ आया तुम्हें अवश्य दूँगा।
और अपना हाथ अपनी गर्दन से न बाँध[1] लो और न उसे पूरा खोल दो कि निन्दित, विवश होकर रह जाओ।
1. हाथ बाँधने और खोलने का अर्थ है, कृपण तथा अपव्यय करना। इस में व्यय और दान में संतुलन रखने की शिक्षा दी गयी है।
वास्तव में, आपका पालनहार ही विस्तृत कर देता है जीविका को जिसके लिए चाहता है, तथा संकीर्ण कर देता है। वास्तव में, वही अपने दासों (बंदों) से अति सूचित[1] देखने वाला[2] है।
1. अर्थात वह सब की दशा और कौन किस के योग्य है देखता और जानता है। 2. ह़दीस में है शिर्क के बाद सब से बड़ा पाप अपनी संतान को खिलाने के भय से मार डालना है। (बुख़ारीः4477, मुस्लिमः 86)
और अपनी संतान को निर्धन हो जाने के भय से वध न करो, हम उन्हें तथा तुम्हें जीविका प्रदान करेंगे, वास्तव में, उन्हें वध करना महा पाप है।
और व्यभिचार के समीप भी न जाओ, वास्तव में, वह निर्लज्जा तथा बुरी रीति है।
और किसी प्राण को जिसे अल्लाह ने ह़राम (अवैध) किया है, वध न करो, परन्तु धर्म विधान[1] के अनुसार और जो अत्याचार से वध (निहत) किया गया, हमने उसके उत्तराधिकारी को अधिकार[2] प्रदान किया है। अतः वह वध करने में अतिक्रमण[3] न करे, वास्तव में, उसे सहायता दी गयी है।
1. अर्थात प्रतिहत्या में अथवा विवाहित होते हुये व्यभिचार के कारण, अथवा इस्लाम से फिर जाने के कारण। 2. अधिकार का अर्थ यह है कि वह इस के आधार पर हत्दण्ड की माँग कर सकता है, अथवा वध या अर्थदण्ड लेने या क्षमा कर देने का अधिकारी है। 3. अर्थात एक के बदले दो को या दूसरे की हत्या न करे।
और अनाथ के धन के समीप भी न जाओ, परन्तु ऐसी रीति से, जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुँच जाये और वचन पूरा करो, वास्तव में, वचन के विषय में प्रश्न किया जायेगा।
और पूरा नापकर दो, जब नापो और सह़ीह़ तराजू से तोलो। ये अधिक अच्छा और इसका परिणाम उत्तम है।
और ऐसी बात के पीछे न पड़ो, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान न हो, निश्चय कान तथा आँख और दिल, इन सबके बारे में (प्रलय के दिन) प्रश्न किया जायेगा[1]।
1. अल्लाह, प्रलय के दिन इन को बोलने की शक्ति देगा। और वह उस के विरुध्द साक्ष्य देंगे। ( देखियेः सूरह ह़ा-मीम-सज्दा, आयतः20-21)
और धरती में अकड़कर न चलो, वास्तव में, न तुम धरती को फाड़ सकोगे और न लम्बाई में पर्वतों तक पहुँच सकोगे।
آية رقم 38
ये सब बातें हैं। इनमें बुरी बात आपके पालनहार को अप्रिय हैं।
ये तत्वदर्शिता की वो बातें हैं, जिनकी वह़्यी (प्रकाशना) आपकी ओर आपके पालनहार ने की है और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना लेना, अन्यथा नरक में निन्दित तिरस्कृत करके फेंक दिये जाओगे।
क्या तुम्हारे पालनहार ने तुम्हें पुत्र प्रदान करने के लिए विशेष कर लिया है और स्वयं फ़रिश्तों को पुत्रियाँ बना लिया है? वास्तव में, तुम बहुत बड़ी बात कह रहे हो[1]।
1. इस आयत में उन अरबों का खण्डन किया गया है जो फ़रिश्तों को अल्लाह की पुत्री कहते थे। जब कि स्वयं पुत्रियों के जन्म से उदास हो जाते थे। और कभी ऐसा भी हुआ कि उन्हें जीवित गाड़ दिया जाता था। तो बताओ यह कहाँ का न्याय है कि अपने लिये पुत्रियों को अप्रिय समझते हो और अल्लाह के लिये पुत्रियाँ बना रखे हो?
और हमने विविध प्रकार से इस क़ुर्आन में (तथ्यों का) वर्णन कर दिया है, ताकि लोग शिक्षा ग्रहण करें, परन्तु उसने उनकी घृणा को और अधिक कर दिया।
आप कह दें कि यदि अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य होते, जैसा कि वे (मिश्रणवादी) कहते हैं, तो वे अर्श (सिंहासन) के स्वामी (अल्लाह) की ओर अवश्य कोई राह[1] खोजते।
1. ताकि उस से संघर्ष कर के अपना प्रभुत्व स्थापित कर लें।
آية رقم 43
वह पवित्र और बहुत उच्च है, उन बातों से जिन्हें वे बनाते हैं।
उसकी पवित्रता का वर्णन कर रहे हैं सातों आकाश तथा धरती और जो कुछ उनमें है और नहीं है कोई चीज़ परन्तु वह उसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन कर रही है, किन्तु तुम उनके पवित्रता गान को समझते नहीं हो। वास्तव में, वह अति सहिष्णु, क्षमाशील है।
और जब आप क़ुर्आन पढ़ते हैं, तो हम आपके बीच और उनके बीच, जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं लाते, एक छुपा हुआ आवरण (पर्दा) बना देते[1] हैं।
1. अर्थात प्रलोक पर ईमान न लाने का यही स्वभाविक परिणाम है कि क़ुर्आन को समझने की योग्यता खो जाती है।
तथा उनके दिलों पर ऐसे खोल चढ़ा देते हैं कि उस (क़ुर्आन) को न समझें और उनके कानों में बोझ और जब आप अपने अकेले पालनहार की चर्चा क़ुर्आन में करते हैं, तो वह घृणा से मुँह फेर लेते हैं।
और हम उनके विचारों से भली-भाँति अवगत हैं, जब वे कान लगाकर आपकी बात सुनते हैं और जब वे आपस में कानाफूसी करते हैं, जब वे अत्याचारी कहते हैं कि तुम लोग तो बस एक जादू किये हुए व्यक्ति का अनुसरण[1] करते हो।
1. मक्का के काफ़िर छुप-छुप कर क़ुर्आन सुनते। फिर आपस में प्रामर्श करते कि इस का तोड़ किया हो? और जब किसी पर संदेह हो जाता कि वह क़ुर्आन से प्रभावित हो गया है तो उसे समझाते कि इस के चक्कर में क्या पड़े हो, इस पर किसी ने जादू कर दिया है। इस लिये बहकी-बहकी बातें कर रहा है।
सोचिए कि वे आपके लिए कैसे उदाहरण दे रहे हैं? अतः वे कुपथ हो गये, वे सीधी राह नहीं पा सकेंगे।
और उन्होंने कहाः क्या हम, जब अस्थियाँ और चूर्ण-विचूर्ण हो जायेंगे तो क्या हम वास्तव में, नई उत्पत्ति में पुनः जीवित कर दिये[1] जायेंगे?
1. ऐसी बात वह परिहास अथवा इन्कार के कारण कहते थे।
آية رقم 50
आप कह दें कि पत्थर बन जाओ या लोहा।
अथवा कोई उत्पत्ति, जो तुम्हारे मन में इससे बड़ी हो। फिर वे पूछते हैं कि कौन हमें पुनः जीवित करेगा? आप कह दें: वही, जिसने प्रथम चरण में तुम्हारी उत्पत्ति की है। फिर वे आपके आगे सिर हिलायेंगे[1] और कहेंगेः ऐसा कब होगा? आप कह दें कि संभवता वह समीप ही है।
1. अर्थात परिहास करते हुये आश्चर्य से सिर हिलायेंगे।
जिस दिन वह तुम्हें पुकारेगा, तो तुम उसकी प्रशंसा करते हुए स्वीकार कर लोगे[1] और ये सोचोगे कि तुम (संसार में) थोड़े ही समय रहे हो।
1. अर्थात अपनी क़ब्रों से पर्लय के दिन जीवित हो कर उपस्थित हो जाओगे।
और आप मेरे भक्तों से कह दें कि वह बात बोलें, जो उत्तम हो, वास्तव में, शैतान उनके बीच बिगाड़ उत्पन्न करना चाहता[1] है। निश्चय शैतान मनुष्य का खुला शत्रु है।
1. अर्थात कटु शब्दों द्वारा।
तुम्हारा पालनहार, तुमसे भली-भाँति अवगत है, यदि चाहे, तो तुमपर दया करे अथवा यदि चाहे, तो तुम्हें यातना दे और हमने आपको उनपर निरीक्षक बनाकर नहीं भेजा[1] है।
1. अर्थात आप का दायित्व केवल उपदेश पहूँचा देना है, वह तो स्वयं अल्लाह के समीप होने की आशा लगाये हुये हैं, कि कैसे उस तक पहूँचा जाये तो भला वे पूज्य कैसे हो सकते हैं?
(हे नबी!) आपका पालनहार भली-भाँति अवगत है उससे, जो आकाशों तथा धरती में है और हमने प्रधानता दी है कुछ नबियों को कुछ पर और हमने दावूद को ज़बूर (पुस्तक) प्रदान की।
आप कह दें कि उन्हें पुकारो, जिन्हें उस (अल्लाह) के सिवा (पूज्य) समझते हो। न वे तुमसे दुःख दूर कर सकते और न (तुम्हारी दशा) बदल सकते हैं।
वास्तव में, जिन्हें ये लोग[1] पुकारते हैं, वे स्वयं अपने पालनहार का सामीप्य प्राप्त करने का साधन[2] खोजते हैं कि कौन अधिक समीप है? और उसकी दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। वास्तव में, आपके पालनहार की यातना डरने योग्य है।
1. अर्थात मुश्रिक जिन नबियों, महापुरुषों और फ़रिश्तों को पुकारते हैं। 2. साधन से अभिप्रेत सत्कर्म और सदाचार है।
और कोई (अत्याचारी) बस्ती नहीं है, परन्तु हम उसे प्रलय के दिन से पहले ध्वस्त करने वाले या कड़ी यातना देने वाले हैं। ये (अल्लाह के) लेख में अंकित है।
और हमें नहीं रोका इससे कि हम निशानियाँ भेजें, किन्तु इस बात ने कि विगत लोगों ने उन्हें झुठला[1] दिया और हमने समूद को ऊँटनी का खुला चमत्कार दिया, तो उन्होंने उसपर अत्याचार किया और हम चमत्कार डराने के लिए ही भेजते हैं।
1. अर्थात चमत्कार की माँग करने पर चमत्कार इस नहीं भेजा जाता कि उस के पश्चात् न मानने पर यातना का आना अनिवार्य हो जाता है, जैसा कि भाष्यकारों ने लिखा है।
और (हे नबी!) याद करो, जब हमने आपसे कह दिया था कि आपके पालनहार ने लोगों को अपने नियंत्रण में ले रखा है और ये जो कुछ हमने आपको दिखाया,[1] उसको और उस वृक्ष को जिसपर क़ुर्आन में धिक्कार की गयी है, हमने लोगों के लिए एक परीक्षा बना दिया[2] है और हम उन्हें चेतावनी पर चेतावनी दे रहे हैं, फिर भी ये उनकी अवज्ञा को ही अधिक करती जा रही है।
1. इस से संकेत "मेअराज" की ओर है। और यहाँ "रु-या" शब्द का अर्थ स्वप्न नहीं बल्कि आँखों से देखना है। और धिक्कारे हुये वृक्ष से अभिप्राय ज़क़्क़ूम (थोहड़) का वृक्ष है। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीसः4716) 2. अर्थात काफ़िरों के लिये जिन्हों ने कहा कि यह कैसे हो सकता है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक ही रात में बैतुल मक़्दिस पहुँच जायें फिर वहाँ से आकाश की सैर कर के वापिस मक्का भी आ जायें।
और (याद करो), जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया। उसने कहाः क्या मैं उसे सज्दा करूँ, जिसे तूने गारे से उत्पन्न किया है?
(तथा) उसने कहाः तू बता, क्या यही है, जिसे तूने मुझपर प्रधानता दी है? यदि तूने मुझे प्रलय के दिन तक अवसर दिया, तो मैं उसकी संतति को अपने नियंत्रण में कर लूँगा[1] कुछ के सिवा।
1. अर्थात कुपथ कर दूँगा।
अल्लाह ने कहाः "चले जाओ", जो उनमें से तेरा अनुसरण करेगा, तो निश्चय नरक तुमसबका प्रतिकार (बदला) है, भरपूर बदला।
तू उनमें से जिसे हो सके, अपनी ध्वनि[1] से बहका ले और उनपर अपनी सवार और पैदल (सेना) चढ़ा[2] ले और उनका (उनके) धनों और संतानों में साझी बन[3] जा तथा उन्हें (मिथ्या) वचन दे और शैतान उन्हें धोखे के सिवा (कोई) वचन नहीं देता।
1. अर्थात गाने और बजाने द्वारा। 2. अर्थात अपने जिन्न और मनुष्य सहायकों द्वारा उन्हें बहकाने का उपाय कर ले। 3. अर्थात अवैध धन अर्जित करने और व्यभिचार की प्रेरणा दे।
वास्तव में, जो मेरे भक्त हैं, उनपर तेरा कोई वश नहीं चल सकता और आपके पालनहार का सहायक होना ये बहुत है।
तुम्हारा पालनहार तो वह है, जो तुम्हारे लिए सागर में नौका चलाता है, ताकि तुम उसकी जीविका की खोज करो, वास्तव में, वह तुम्हारे लिए अति दयावान् है।
और जब सागर में तुमपर कोई आपदा आ पड़ती है, तो अल्लाह के सिवा जिन्हें तुम पुकारते हो, खो देते (भूल जाते) हो[1] और जब तुम्हें बचाकर थल तक पहुँचा देता है, तो मुख फेर लेते हो और मनुष्य है ही अति कृतघ्न।
1. अर्थात ऐसी दशा में केवल अल्लाह याद आता है और उसी से सहायता माँगते हो, किन्तु जब सागर से निकल जाते हो तो फिर उन्हीं देवी देवताऔं की वंदना करने लगते हो।
क्या तुम निर्भय हो गये हो कि अल्लाह तुम्हें थल (धरती) ही में धंसा दे अथवा तुमपर फथरीली आँधी भेज दे? फिर तुम अपना कोई रक्षक न पाओ।
या तुम निर्भय हो गये हो कि फिर उस (सागर) में तुम्हें दूसरी बार ले जाये, फिर तुमपर वायु का प्रचण्ड झोंका भेज दे, फिर तुम्हें डुबा दे, उस कुफ़्र के बदले, जो तुमने किया है। फिर तुम अपने लिए उसे नहीं पाओगे, जो हमपर इसका दोष[1] धरे।
1. और हम से बदले की माँग कर सके।
और हमने बनी आदम (मानव) को प्रधानता दी और उन्हें थल और जल में सवार[1] किया और उन्हें स्वच्छ चीज़ों से जीविका प्रदान की और हमने उन्हें बहुत-सी उन चीज़ों पर प्रधानता दी, जिनकी हमने उत्पत्ति की है।
1. अर्थात सवारी के साधन दिये।
जिस दिन हम, सब लोगों को उनके अग्रणी के साथ बुलायेंगे, तो जिनका कर्मलेख उनके सीधे हाथ में दिया जायेगा, तो वही अपना कर्मलेख पढ़ेंगे और उनपर धागे बराबर भी अत्याचार नहीं किया जायेगा।
और जो इस (संसार) में अंधा[1] रह गया, तो वह आख़िरत (परलोक) में भी अन्धा और अधिक कुपथ होगा।
1. अर्थात सत्य से अन्धा।
और (हे नबी!) वह (काफ़िर) समीप था कि आपको उस वह़्यी से फेर दें, जो हमने आपकी ओर भेजी है, ताकि आप हमारे ऊपर अपनी ओर से कोई दूसरी बात घड़ लें और उस समय वे आपको अवश्य अपना मित्र बना लेते।
और यदि हम आपको सुदृढ़ न रखते, तो आप उनकी ओर कुछ न कुछ झुक जाते।
तब हम आपको जीवन की दुगुनी तथा मरण की दोहरी यातना चखाते। फिर आप अपने लिए हमारे ऊपर कोई सहायक न पाते।
और समीप है कि वे आपको इस धरती (मक्का) से विचला दें, ताकि आपको उससे निकाल दें, तब व आपके पश्चात् कुछ ही दिन रह सकेंगे।
ये[1] उसके लिए नियम रहा है, जिसे हमने आपसे पहले अपने रसूलों में से भेजा है और आप हमारे नियम में कोई परिवर्तन नहीं पायेंगे।
1. अर्थात रसूल को निकालने पर यातना देने का हमारा नियम रहा है।
आप नमाज़ की स्थापना करें, सूर्यास्त से रात के अन्धेरे[1] तक तथा प्रातः (फ़ज्र के समय) क़ुर्आन पढ़िये। वास्तव में, प्रातः क़ुर्आन पढ़ना उपस्थिति का समय[2] है।
1. अर्थात ज़ुहर, अस्र और मग्रिब तथा इशा की नमाज़। 2. अर्थात फ़ज्र की नमाज़ के समय रात और दिन के फ़रिश्ते एकत्र तथा उपस्थित रहते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः359, सह़ीह़ मुस्लिमः 632)
तथा आप रात के कुछ समय जागिए, फिर "तह़जुद[1]" पढ़िये। ये आपके लिए अधिक (नफ़्ल) है। संभव है आपका पालनहार आपको "मक़ामे मह़मूद[2]" प्रदान कर दे।
1. तहज्जुद का अर्थ है रात के अन्तिम भाग में नमाज़ पढ़ना। 2. "मक़ामे मह़मूद" का अर्थ है प्रशंसा योग्य स्थान। और इस से अभिप्राय वह स्थान है जहाँ से आप प्रलय के दिन शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करेंगे।
और प्रार्थना करें कि मेरे पालनहार! मुझे प्रवेश[1] दे सत्य के साथ, निकाल सत्य के साथ तथा मेरे लिए अपनी ओर से सहायक प्रभुत्व बना दे।
1. अर्थात मदीना में, मक्का से निकाल कर।
तथा कहिए कि सत्य आ गया और असत्य ध्वस्त-निरस्त हो गया, वास्तव में, असत्य को धवस्त-निरस्त होना ही है[1]।
1. अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का (की विजय के दिन) उस में प्रवेश किया तो काबा के आस पास तीन सौ साठ मुर्तियाँ थीं। और आप के हाथ में एक छड़ी थी, जिस से उन को मार रहे थे। और आप यही आयत पढ़ते जो रहे थे। (सह़ीह़ बुख़ारीः4720, मुस्लिमः1781)
और हम क़ुर्आन में से वह चीज़ उतार रहे हैं, जो आरोग्य तथा दया है, ईमान वालों के लिए और वह अत्याचारियों की क्षति को ही अधिक करता है।
और जब हम मानव पर उपकार करते हैं, तो मुख फेर लेता है और दूर हो जाता[1] है तथा जब उसे दुःख पहुँचता है, तो निराश हो जाता है।
1. अर्थात अल्लाह की आज्ञा का पालन करने से।
आप कह दें कि प्रत्येक अपनी आस्था के अनुसार कर्म कर रहा है, तो आपका पालनहार ही भली-भाँति जान रहा है कि कौन अधिक सीधी डगर पर है।
(हे नबी!) लोग आपसे रूह़[1] के विषय में पूछते हैं, आप कह दें: रूह़ मेरे पालनहार के आदेश से है और तुम्हें जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत थोड़ा है।
1. "रूह़" का अर्थ आत्मा है, जो हर प्राणी के जीवन का मूल है। किन्तु उस की वास्तविक्ता क्या है? यह कोई नहीं जानता। क्यों कि मनुष्य के पास जो ज्ञान है वह बहुत कम है।
और यदि हम चाहें, तो वह सब कुछ ले जायें, जो आपकी ओर हमने वह़्यी किया है, फिर आप हमपर अपना कोई सहायक नहीं पायेंगे।
किन्तु आपके पालनहार की दया के कारण (ये आपको प्राप्त है)। वास्तव में, उसका प्रदान आपपर बहुत बड़ा है।
आप कह दें: यदि सब मनुष्य तथा जिन्न इसपर एकत्र हो जायें कि इस क़ुर्आन के समान ले आयेंगे, तो इसके समान नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के समर्थक ही क्यों न हो जायें!
और हमने लोगों के लिए इस क़ुर्आन में प्रत्येक उदाहरण विविध शैली में वर्णित किया है, फिर भी अधिक्तर लोगों ने कुफ़्र के सिवा अस्वीकार ही किया है।
और उन्होंने कहाः हम आपपर कदापि ईमान नहीं लायेंगे, यहाँ तक कि आप हमारे लिए धरती से एक चश्मा प्रवाहित कर दें।
अथवा आपके लिए खजूर अथवा अंगूर का कोई बाग़ हो, फिर उसके बीच आप नहरें प्रवाहित कर दें।
अथवा हमपर आकाश को जैसा आपका विचार है, खण्ड-खण्ड करके गिरा दें या अल्लाह और फ़रिश्तों को साक्षात हमारे सामने ले आयें।
अथवा आपके लिए सोने का एक घर हो जाये अथवा आकाश में चढ़ जायें और हम आपके चढ़ने का भी कदापि विश्वास नहीं करेंगे, यहाँ तक की हमपर एक पुस्तक उतार लायें, जिसे हम पढ़ें। आप कह दें कि मेरा पालनहार पवित्र है, मैंतो बस एक रसूल (संदेशवाहक) मनुष्य[1] हूँ।
1. अर्थात मैं अपने पालनहार की वह़्यी का अनुसरण करता हूँ। और यह सब चीज़ें अल्लाह के बस में हैं। यदि वह चाहे तो एक क्षण में सब कुछ कर सकता है किन्तु मैं तो तुम्हारे जैसा एक मनुष्य हूँ। मुझे केवल रसूल बना कर भेजा गया है, ताकि तुम्हें अल्लाह का संदेश सुनाऊँ। रहा चमत्कार तो वह अल्लाह के हाथ में है। जिसे चाहे दिखा सकता है। फिर क्या तुम चमत्कार देख कर ईमान लाओगे? यदि ऐसा होता तो तुम कभी के ईमान ला चुके होते, क्योंकि क़ुर्आन से बड़ा क्या चमत्कार हो सकता है?
और नहीं रोका लोगों को कि वे ईमान लायें, जब उनके पास मार्गदर्शन[1] आ गया, परन्तु इसने कि उन्होंने कहाः क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है?
1. अर्थात रसूल तथा पुस्तकें संमार्ग दर्शाने के लिये।
(हे नबी!) आप कह दें कि यदि धरती में फ़रिश्ते निश्चिन्त होकर चलते-फिरते होते, तो हम अवश्य उनपर आकाश से कोई फ़रिश्ता रसूल बनाकर उतारते।
आप कह दें कि मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह का साक्ष्य[1] बहुत है। वास्तव में, वह अपने दासों (बन्दों) से सूचित, सबको देखने वाला है।
1. अर्थात मेरे रसूल होने का साक्षी अल्लाह है।
जिसे अल्लाह सुपथ दिखा दे, वही सुपथगामी है और जिसे कुपथ कर दे, तो आप कदापि नहीं पायेंगे, उनके लिए उसके सिवा कोई सहायक और हम उन्हें एकत्र करेंगे प्रलय के दिन उनके मुखों के बल, अंधे, गूँगे और बहरे बनाकर और उनका स्थान नरक है, जबभी वह बुझने लगेगी, तो हम उसे और भड़का देंगे।
यही उनका प्रतिकार (बदला) है, इसलिए कि उन्होंने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र किया और कहाः क्या जब हम अस्थियाँ और चूर-चूर हो जायेंगे, तो नई उत्पत्ति में पुणः जीवित किये जायेंगे[1]?
1. अर्थात ऐसा होना संभव नहीं है कि जब हमारी हड्डियाँ सड़ गल जायें तो हम फिर उठाये जायेंगे।
क्या वे विचार नहीं करते कि जिस अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति की है, वह समर्थ है इस बात पर कि उनके जैसी उत्पत्ति कर दे[1]? तथा उसने उनके लिए एक निर्धारित अवधि बनायी है, जिसमें कोई संदेह नहीं। फिर भी अत्याचारियों ने कुफ़्र के सिवा अस्वीकार ही किया।
1. अर्थात जिस ने आकाश तथा धरती की उत्पत्ति की उस के लिये मनुष्य को दोबारा उठाना अधिक सरल है, किन्तु वह समझते नहीं हैं।
आप कह दें कि यदि तुमही स्वामी होते, अपने पालनहार की दया के कोषों के, तबतो तुम खर्च हो जाने के भय से (अपने ही पास) रोक रखते और मनुष्य बड़ा ही कंजूस है।
और हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दीं[1], अतः बनी इस्राईल से आप पूछ लें, जब वह (मूसा) उनके पास आया, तो फ़िर्औन ने उससे कहाः हे मूसा! मैं समझता हूँ कि तुझपर जादू कर दिया गया है।
1.वह नौ निशानियाँ निम्नलिखित थीं: हाथ की चमक, लाठी, अकाल, तूफ़ान, टिड्डी, जूयें, मेंढक, खून और सागर का दो भाग हो जाना।
उस (मूसा) ने उत्तर दियाः तुझे विश्वास है कि इन्हें आकाशों तथा धरती के पालनहार ही ने सोच-विचार करने के लिए उतारा है और हे फ़िर्औन! मैं तुम्हें निश्चय ध्वस्त समझता हूँ।
آية رقم 103
अन्तताः उसने निश्चय किया कि उन[1] को धरती से[2] उखाड़ फेंके, तो हमने उसे और उसके सब साथियों को डुबो दिया।
1. अर्थात बनी इस्राईल को। 2. अर्थात मिस्र से।
और हमने उसके पश्चात् बनी इस्राईल से कहाः तुम इस धरती में बस जाओ और जब आख़िरत के वचन का समय आयेगा, तो हम तुम्हें एकत्र कर लायेंगे।
और हमने सत्य के साथ ही इस (क़ुर्आन) को उतारा है तथा ये सत्य के साथ ही उतरा है और हमने आपको बस शुभ सूचना देने तथा सावधान करने वाला बनाकर भेजा है।
آية رقم 106
और इस क़ुर्आन को हमने थोड़ा-थोड़ा करके उतारा है, ताकि आप लोगों को इसे रुक-रुक कर सुनायें और हमने इसे क्रमशः[1] उतारा है।
1. अर्थात तेईस वर्ष की अवधि में।
आप कह दें कि तुम इसपर ईमान लाओ अथवा न लाओ, वास्तव में, जिन्हें इससे पहले ज्ञान दिया[1] गया है, जब उन्हें ये सुनाया जाता है, तो वह मुँह के बल सज्दे में गिर जाते हैं।
1. अर्थात वह विद्वान जिन को कुर्आन से पहले की पुस्तकों का ज्ञान है।
آية رقم 108
और कहते हैं: पवित्र है हमारा पालनहार! निश्चय हमारे पालनहार का वचन पूरा होकर रहा।
آية رقم 109
और वह मुँह के बल रोते हुए गिर जाते हैं और वह उनकी विनय को अधिक कर देता है।
हे नबी! आप कह दें कि (अल्लाह) कहकर पुकारो अथवा (रह़मान) कहकर पुकारो, जिस नाम से भी पुकारो, उसके सभी नाम शुभ[1] हैं और (हे नबी!) नमाज़ में स्वर न तो ऊँचा करो और न उसे नीचा करो और इन दोनों के बीच की राह[2] अपनाओ।
1. अरब में "अल्लाह" शब्द प्रचलित था, मगर "रह़मान" प्रचलित न था। इस लिये, वह इस नाम पर आपत्ति करते थे। यह आयत इसी का उत्तर है। 2. ह़दीस में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (आरंभिक युग में) मक्का में छुप कर रहते थे। और जब अपने साथियों को ऊँचे स्वर में नमाज़ पढ़ाते थे तो मुश्रिक उसे सुन कर क़ुर्आन को तथा जिस ने क़ुर्आन उतारा है, और जो उसे लाया है, सब को गालियाँ देते थे। अतः अल्लाह ने अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह आदेश दिया। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4722)
तथा कहो कि सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसके कोई संतान नहीं और न राज्य में उसका कोई साझी है और न अपमान से बचाने के लिए उसका कोई समर्थक है और आप उसकी महिमा का वर्णन करें।
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