ترجمة معاني سورة النحل باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية
مولانا عزيز الحق العمري
آية رقم 1
अल्लाह का आदेश आ गया है। अतः (हे काफ़िरो!) उसके शीघ्र आने की माँग न करो। वह (अल्लाह) पवित्र तथा उस शिर्क (मिश्रणवाद) से ऊँचा है, जो वे कर रहे हैं।
آية رقم 2
वह फ़रिश्तों को वह़्यी के साथ, अपने आदेश से, अपने जिस भक्त पर चाहता है, उतारता है कि (लोगों को) सावधान करो कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है, अतः मुझसे ही डरो।
آية رقم 3
उसने आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति सत्य के साथ की है, वह उनके शिर्क से बहुत ऊँचा है।
آية رقم 4
उसने मनुष्य की उत्पत्ति वीर्य से की है, फिर वह अकस्मात् खुला झगड़ालू बन गया।
آية رقم 5
तथा चौपायों की उत्पत्ति की, जिनमें तुम्हारे लिए गर्मी[1] और बहुत-से लाभ हैं और उनमें से कुछको खाते हो।
1. अर्थात उन की ऊन तथा खाल से गर्म वस्त्र बनाते हो।
آية رقم 6
तथा उनमें तुम्हारे लिए एक शोभा है, जिस समय संध्या को चराकर लाते हो और जब प्रातः चराने ले जाते हो।
آية رقم 7
और वे तुम्हारे बोझ, उन नगरों तक लादकर ले जाते हैं, जिनतक तुम बिना कड़े परिश्रम के नहीं पहुँच सकते। वास्तव में, तुम्हारा पालनहार अति करुणामय, दयावान् है।
آية رقم 8
तथा घोड़े, खच्चर और गधे पैदा किये, ताकि उनपर सवारी करो और (वे) शोभा (बनें) और (अल्लाह) ऐसी चीज़ों की उत्पत्ति करेगा, जिन्हें (अभी) तुम नहीं जानते हो[1]।
1. अर्थात सवारी के साधन इत्यादि। और आज हम उन में से बहुत सी चीज़ों को अपनी आँखों से देख रहे हैं, जिन की ओर अल्लाह ने आज से चौदह सौ वर्ष पहले इस आयत के अन्दर संकेत किया था। जैसे कार, रेल और विमान आदि।
آية رقم 9
और अल्लाह पर, सीधी राह बताना है और उनमें से कुछ[1] टेढ़े हैं तथा यदि अल्लाह चाहता, तो तुमसभी को सीधी राह दिखा देता।
1. अर्थात जो इस्लाम के विरुध्द हैं।
آية رقم 10
वही है, जिसने आकाश से जल बरसाया, जिसमें से कुछ तुम पीते हो तथा कुछसे वृक्ष उपजते हैं, जिसमें तुम (पशुओं को) चराते हो।
آية رقم 11
और तुम्हारे लिए उससे खेती उपजाता है और ज़ैतून, खजूर, अंगूर और प्रत्येक प्रकार के फल। वास्तव में इस, में एक बड़ी निशानी है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
آية رقم 12
और उसने तुम्हारे लिए रात्रि तथा दिवस को सेवा में लगा रखा है तथा सूर्य और चाँद को और (हाँ!) सितारे उसके आदेश के अधीन हैं। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ (लक्षण) हैं, उन लोगों के लिए, जो समझ-बूझ रखते हैं।
آية رقم 13
तथा जो तुम्हारे लिए धरती में विभिन्न रंगों की चीजें उत्पन्न की हैं, वास्तव में, इसमें एक बड़ी निशानी लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो शिक्षा ग्रहण करते हैं।
آية رقم 14
और वही है, जिसने सागर को वश में कर रखा है, ताकि तुम उससे ताज़ा[1] मांस खाओ और उससे अलंकार[2] निकालो, जिसे पहनते हो तथा तुम नौकाओं को देखते हो कि सागर में (जल को) फाड़ती हुई चलती हैं और इसलिए ताकि तुम उस अल्लाह के अनुग्रह[3] की खोज करो और ताकि कृतज्ञ बनो।
1. अर्थात मछलियाँ। 2. अलंकार अर्थात मोती और मूँगा निकालो। 3. अर्थात सागरों में व्यापारिक यात्रा कर के अपनी जीविका की खोज करो।
آية رقم 15
और उसने धरती में पर्वत गाड़ दिये, ताकि तुम्हें लेकर डोलने न लगे तथा नदियाँ और राहें, ताकि तुम राह पाओ।
آية رقم 16
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तथा बहुत-से चिन्ह (बना दिये) और वे सितारों से (भी) राह[1] पाते हैं।
1. अर्थात रात्रि में।
آية رقم 17
तो क्या, जो उत्पत्ति करता है, उसके समान है, जो उत्पत्ति नहीं करता? क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते[1]?
1. और उस की उत्पत्ति को उस का साझी और पूज्य बनाते हो।
آية رقم 18
और यदि तुम अल्लाह के पुरस्कारों की गणना करना चाहो, तो कभी नहीं कर सकते। वास्तव में, अल्लाह बड़ा क्षमा तथा दया करने वाला है।
آية رقم 19
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तथा अल्लाह जानता है, जो तुम छुपाते हो और जो तुम व्यक्त करते हो।
آية رقم 20
और जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वे किसी चीज़ की उत्पत्ति नहीं कर सकते। जबकि वे स्वयं उत्पन्न किये जाते हैं।
آية رقم 21
वे निर्जीव प्राणहीन हैं और (ये भी) नहीं जानते कि कब पुनः जीवित किये जायेंगे।
آية رقم 22
तुम्हारा पूज्य बस एक है, फिर जो लोग परलोक पर ईमान नहीं लाते, उनके दिल निवर्ती (विरोधी) हैं और वे अभिमानी हैं।
آية رقم 23
जो कुछ वे छुपाते तथा व्यक्त करते हैं, निश्चय अल्लाह उसे जानता है। वास्तव में, वह अभिमानियों से प्रेम नहीं करता।
آية رقم 24
और जब उनसे पूछा जाये कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है[1]? तो कहते हैं कि पूर्वजों की कल्पित कथाएँ हैं।
1. अर्थात मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर। तो यह जानते हुये कि अल्लाह ने क़ुर्आन उतारा है, झूठ बोलते हैं और स्वयं को तथा दूसरों को धोखा देते हैं।
آية رقم 25
ताकि वे अपने (पापों का) पूरा बोझ प्रलय के दिन उठायें तथा कुछ उन लोगों का बोझ (भी), जिन्हें बिना ज्ञान के कुपथ कर रहे थे, सावधान! वे कितना बुरा बोझ उठायेंगे!
آية رقم 26
इनसे पहले के लोग भी षड्यंत्र रचते रहे, तो अल्लाह ने उनके षड्यंत्र के भवन का उनमूलन कर दिया, फिर ऊपर से उनपर छत गिर पड़ी और उनपर ऐसी दिशा से यातना आ गई, जिसे वे सोच भी नहीं रहे थे।
آية رقم 27
फिर प्रलय के दिन उन्हें अपमानित करेगा और कहेगा कि मेरे वह साझी कहाँ हैं, जिनके लिए तुम झगड़ रहे थे? वे कहेंगेः जिन्हें ज्ञान दिया गया है कि वास्तव में, आज अपमान तथा बुराई (यातना) काफ़िरों के लिए है।
آية رقم 28
जिनके प्राण फ़रिश्ते निकालते हैं, इस दशा में कि वे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं, तो वे आज्ञाकारी बन जाते[1] हैं, (कहते हैं कि) हम कोई बुराई (शिर्क) नहीं कर रहे थे। क्यों नहीं? वास्तव में, अल्लाह तुम्हारे कर्मों से भली-भाँति अवगत है।
1. अर्थात मरण का समय अल्लाह को मान लेते हैं।
آية رقم 29
तो नरक के द्वारों में प्रवेश कर जाओ, उसमें सदावासी रहोगे, अतः क्या ही बुरा है अभिमानों का निवास स्थान!
آية رقم 30
और उनसे पूछा गया, जो अपने पालनहार से डरे कि तुम्हारे पालनहार ने क्या उतारा है? तो उन्होंने कहाः अच्छी चीज़ उतारी है। उनके लिए जिन्होंने इस लोक में सदाचार किये, बड़ी भलाई है और वास्तव में, परलोक का घर (स्वर्ग) अति उत्तम है और आज्ञाकारियों का आवास कितना अच्छा है!
آية رقم 31
सदा रहने के स्वर्ग जिसमें प्रवेश करेंगे, जिनमें नहरें बहती होंगी, उनके लिए उसमें जो चाहेंगे (मिलेगा)। इसी प्रकार, अल्लाह आज्ञाकारियों को प्रतिफल (बदला) देता है।
آية رقم 32
जिनके प्राण फ़रिश्ते इस दशा में निकालते हैं कि वे स्वच्छ-पवित्र हैं, तो कहते हैं: "तुमपर शान्ति हो।" तुम अपने सुकर्मों के बदले स्वर्ग में प्रवेश कर जाओ।
آية رقم 33
क्या वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उनके पास फ़रिश्ते[1] आ जायें अथवा आपके पालनहार का आदेश[2] आ पहुँचे? ऐसे ही, उनसे पूर्व के लोगों ने किया और अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
1. अर्थात प्राण निकालने के लिये। 2. अर्थात अल्लाह की यातना या प्रलय।
آية رقم 34
तो उनके कुकर्मों की बुराईयाँ[1] उनपर आ पड़ीं और उन्हें उसी (यातना) ने घेर लिया, जिसका वे परिहास कर रहे थे।
1. अर्थात दुष्परिणाम।
آية رقم 35
और कहा, जिन लोगों ने शिर्क (मिश्रणवाद) कियाः यदि अल्लाह चाहता, तो हम उसके सिवा किसी चीज़ की इबादत (वंदना) न करते, न हम और न हमारे बाप-दादा और न उसके आदेश के बिना किसी चीज़ को ह़राम (वर्जित) करते। ऐसे ही, इनसे पूर्व वाले लोगों ने किया। तो रसूलों पर केवल खुले रूप से उपदेश पहुँचा देना है।
آية رقم 36
और हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत (वंदना) करो और ताग़ूत (असुर- अल्लाह के सिवा पूज्यों) से बचो, तो उनमें से कुछ को, अल्लाह ने सुपथ दिखा दिया और कुछ पर कुपथ सिध्द हो गया। तो धरती में चलो-फिरो, फिर देखो कि झुठलाने वालों का अन्त कैसा रहा?
آية رقم 37
(हे नबी!) आप ऐसे लोगों को सुपथ दिखाने पर लोलुप हों, तो भी अल्लाह उसे सुपथ नहीं दिखायेगा, जिसे कुपथ कर दे और न उनका कोई सहायक होगा।
آية رقم 38
और उन (काफ़िरों) ने अल्लाह की भरपूर शपथ ली कि अल्लाह उसे पुनः जीवित नहीं करेगा, जो मर जाता है। क्यों नहीं? ये तो अल्लाह का अपने ऊपर सत्य वचन है, परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते।
آية رقم 39
(ऐसा करना इसलिए आवश्यक है) ताकि अल्लाह उस तथ्य को उजागर कर दे, जिसमें[1] वे विभेद कर रहे थे और ताकि काफ़िर जान लें कि वही झूठे थे।
1. अर्थात पुनरोज्जीन आदि के विषय में।
آية رقم 40
हमारा कथन, जब हम किसी चीज़ को अस्तित्व प्रदान करने का निश्चय करें, तो इसके सिवा कुछ नहीं होता कि उसे आदेश दें कि "हो जा" और वह हो जाती है।
آية رقم 41
तथा जो लोग अल्लाह के लिए हिजरत (प्रस्थान) कर गये, अत्याचार सहने के पश्चात्, तो हम उन्हें संसार में अच्छा निवास्-स्थान देंगे और परलोक का प्रतिफल तो बहुत बड़ा है, यदि वे[1] जानते।
1. इन से अभिप्रेत नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वह अनुयायी हैं, जिन को मक्का के मुश्रिकों ने अत्याचार कर के निकाल दिया। और ह़ब्शा और फिर मदीना हिजरत कर गये।
آية رقم 42
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जिन लोगों ने धैर्य धारण किया तथा अपने पालनहार पर ही वे भरोसा करते हैं।
آية رقم 43
और (हे नबी!) हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजे, वे सभी मानव-पुरुष थे। जिनकी ओर हम वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे। तो तुम ज्ञानियों से पूछ लो, यदि (स्वयं) नहीं[1] जानते।
1. मक्का के मुश्रिकों ने कहा कि यदि अल्लाह को कोई रसूल भेजना होता तो किसी फ़रिश्ते को भेजता। उसी पर यह आयत उतरी। ज्ञानियों से अभिप्राय वह अह्ले किताब हैं जिन्हें आकाशीय पुस्तकों का ज्ञान हो।
آية رقم 44
प्रत्यक्ष (खुले) प्रमाणों तथा पुस्तकों के साथ (उन्हें भेजा) और आपकी ओर ये शिक्षा (क़ुर्आन) अवतरित की, ताकि आप उसे सर्वमानव के लिए उजागर कर दें, जो कुछ उनकी ओर उतारा गया है, ताकि वे सोच-विचार करें।
آية رقم 45
तो क्या वे निर्भय हो गये हैं, जिन्होंने बुरे षड्यंत्र रचे हैं कि अल्लाह उन्हें धरती में धंसा दे? अथवा उनपर यातना ऐसी दिशा से आ जाये, जिसे वे सोचते भी न हों?
آية رقم 46
या उन्हें चलते-फिरते पकड़ ले, तो वे (अल्लाह को) विवश करने वाले नहीं हैं।
آية رقم 47
अथवा उन्हें भय की दशा में पकड़[1] ले? निश्चय तुम्हारा पालनहार अति करुणामय दयावान् है।
1. अर्थात जब कि पहले से उन्हें आपदा का भय हो।
آية رقم 48
क्या अल्लाह की उत्पन्न की हुई किसी चीज़ को उन्होंने नहीं देखा? जिसकी छाया दायें तथा बायें झुकती है, अल्लाह को सज्दा करते हुए? और वे सर्व विनयशील हैं।
آية رقم 49
तथा अल्लाह ही को सज्दा करते हैं, जो आकाशों में तथा धरती में चर (जीव) तथा फ़रिश्ते हैं और वे अहंकार नहीं करते।
آية رقم 50
वे[1] अपने पालनहार से डरते हैं, जो उनके ऊपर है और वही करते हैं, जो आदेश दिये जाते हैं।
1. अर्थात फ़रिश्ते।
آية رقم 51
और अल्लाह ने कहाः दो पूज्य न बनाओ, वही अकेला पूज्य है। अतः तुम मुझी से डरो।
آية رقم 52
और उसी का है, जो कुछ आकाशों तथा धरती में है और उसी की वंदना स्थायी है, तो क्या तुम अल्लाह के सिवा दूसरे से डरते हो?
آية رقم 53
तुम्हें, जोभी सुख-सुविधा प्राप्त है, वह अल्लाह ही की ओर से है। फिर जब तुम्हें दुःख पहुँचता है, तो उसी को पुकारते हो।
آية رقم 54
फिर जब तुमसे दुःख दूर कर देता है, तो तुम्हारा एक समुदाय अपने पालनहार का साझी बनाने लगता है।
آية رقم 55
ताकि हमने उन्हें, जो कुछ प्रदान किया है, उसके प्रति कृतघ्न हों, तो आनन्द ले लो, तुम्हें शीघ्र ही ज्ञान हो जायेगा।
آية رقم 56
और वे जिन्हें जानते[1] तक नहीं, उनका एक भाग, उसमें से बनाते हैं, जो जीविका हमने उन्हें दी है। तो अल्लाह की शपथ! तुमसे अवश्य पूछा जायेगा, उसके विषय में, जो तुम झूठी बातें बना रहे थे?
1. अर्थात अपने देवी-देवताओं की वास्तविक्ता को नहीं जानते।
آية رقم 57
और वे अल्लाह के लिए पुत्रियाँ बनाते[1] हैं, वह पवित्र है! और उनके लिए वह[2] है, जो वे स्वयं चाहते हों?
1. अरब के मुश्रिकों के पूज्यों में देवताओं से अधिक देवियाँ थीं। जिन के संबन्ध में उन का विचार था कि यह अल्लाह की पुत्रियाँ हैं। इसी प्रकार फ़रिश्तों को भी वे अल्लाह की पुत्रियाँ कहते थे, जिस का यहाँ खण्डन किया गया है। 2. अर्थात पुत्र।
آية رقم 58
और जब उनमें से किसी को पुत्री (के जन्म) की शुभसूचना दी जाये, तो उसका मुख काला हो जाता है और वह शोकपूर्ण हो जाता है।
آية رقم 59
और लोगों से छुपा फिरता है, उस बुरी सूचना के कारण, जो उसे दी गयी है। (सोचता है कि) क्या[1] उसे अपमान के साथ रोक ले अथवा भूमि में गाड़ दे? देखो! वे कितना बुरा निर्णय करते हैं।
1. अर्थात जीवित रहने दे। इस्लाम से पूर्व अरब समाज के कुछ क़बीलों में पुत्रियों के जन्म को लज्जा की चीज़ समझा जाता था। जिस का चित्रण इस आयत में किया गया है।
آية رقم 60
उन्हीं के लिए जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं रखते अपगुण है और अल्लाह के लिए सदगुण हैं तथा वह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।
آية رقم 61
और यदि अल्लाह, लोगों को उनके अत्याचार[1] पर (तत्क्षण) धरने लगे, तो धरती में किसी जीव को न छोड़े। परन्तु वह एक निर्धारित अवधि तक निलम्बित करता[2] है और जब उनकी अवधि आ जायेगी, तो एक क्षण न पीछे होंगे, न पहले।
1. अर्थात शिर्क और पापाचारों पर। 2. अर्थात अवसर देता है।
آية رقم 62
वह अल्लाह के लिए उसे[1] बनाते हैं, जिसे स्वयं अप्रिय समझते हैं तथा उनकी ज़ुबानें झूठ बोलती हैं कि उन्हीं के लिए भलाई है। निश्चय उन्हीं के लिए नरक है और वही सबसे पहले (नरक में) झोंके जायेंगे।
1. अर्थात पुत्रियाँ।
آية رقم 63
अल्लाह की शपथ! (हे नबी!) आपसे पहले हमने बहुत-से समुदायों की ओर रसूल भेजे। तो उनके लिए शैतान ने उनके कुकर्मों को सुसज्जित बना दिया। अतः वही आज उनका सहायक है और उन्हीं के लिए दुःखदायी यातना है।
آية رقم 64
और हमने आपपर ये पुस्तक (क़ुर्आन) इसी लिए उतारी है, ताकि आप उनके लिए उसे उजागर कर दें, जिसमें वे विभेद कर रहे हैं तथा मार्गदर्शन और दया है, उन लोगों के लिए, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
آية رقم 65
और अल्लाह ने ही आकाश से जल बरसाया, फिर उसने निर्जीव धरती को जीवित कर दिया। निश्चय इसमें उन लोगों के लिए एक निशानी है, जो सुनते हैं।
آية رقم 66
तथा वास्तव में, तुम्हारे लिए पशुओं में एक शिक्षा है। हम तुम्हें उससे, जो उसके भीतर है, गोबर तथा रक्त के बीच से शुध्द दूध पिलाते हैं, जो पीने वालों के लिए रुचिकर होता है।
آية رقم 67
तथा खजूरों और अंगूरों के फलों से, जिससे तुम मदिरा बना लेते हो तथा उत्तम जीविका भी, वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो समझ-बूझ रखते हैं।
آية رقم 68
और हमने मधुमक्खी को प्रेरणा दी कि पर्वतों में घर (छत्ते) बना तथा वृक्षों में और लोगों की बनायी छतों में।
آية رقم 69
फिर प्रत्येक फलों का रस चूस और अपने पालनहार की सरल राहों पर चलती रह। उसके भीतर से एक पेय निकलता है, जो विभिन्न रंगों का होता है, जिसमें लोगों के लिए आरोग्य है। वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
آية رقم 70
और अल्लाह ही ने तुम्हारी उत्पत्ति की है, फिर तुम्हें मौत देता है और तुममें से कुछको अबोध आयु तक पहुँचा दिया जाता है, ताकि जानने के पश्चात् कुछ न जाने। वास्तव में, अल्लाह सर्वज्ञ, सर्व सामर्थ्यवान्[1] है।
1. अर्थात वह पुनः जीवित भी कर सकता है।
آية رقم 71
और अल्लाह ने तुममें से कुछ को, कुछ पर जीविका में प्रधानता दी है, तो जिन्हें प्रधानता दी गयी है, वे अपनी जीविका अपने दासों की ओर फेरने वाले नहीं कि वे उसमें बराबर हो जायें, तो क्या वे अल्लाह के उपकारों को नहीं मानते हैं[1]?
1. आयत का भावार्थ यह है कि जब वह स्वयं अपने दासों को अपने बराबर करने के लिये तैयार नहीं हैं तो फिर अल्लाह की उत्पत्ति और उस के दासों को कैसे पूजा-अर्चना में उस के बराबर करते हैं? क्या यह अल्लाह के उपकारों का इन्कार नहीं है?
آية رقم 72
और अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से पत्नियाँ बनायीं और तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियों से पुत्र तथा पौत्र बनाये और तुम्हें स्वच्छ चीज़ों से जीविका प्रदान की। तो क्या वे असत्य पर विश्वास रखते हैं और अल्लाह के पुरस्कारों के प्रति अविश्वास रखते हैं?
آية رقم 73
और अल्लाह के सिवा उनकी वंदना करते हैं, जो उनके लिए आकाशों तथा धरती से कुछ भी जीविका देने का अधिकार नहीं रखते और न इसका सामर्थ्य रखते हैं।
آية رقم 74
और अल्लाह के लिए उदाहरण न दो। वास्तव में, अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते[1]।
1. क्यों कि उस के समान कोई नहीं।
آية رقم 75
अल्लाह ने एक उदाहरण[1] दिया है; एक प्राधीन दास है, जो किसी चीज़ का अधिकार नहीं रखता और दूसरा (स्वाधीन) व्यक्ति है, जिसे हमने अपनी ओर से उत्तम जीविका प्रदान की है और वह उसमें छुपे और खुले व्यय करता है। क्या वे दोनों समान हो जायेंगे? सब प्रशंसा अल्लाह[2] के लिए है। बल्कि अधिक्तर लोग (ये बात) नहीं जानते।
1. आयत का भावार्थ यह है कि जैसे पराधीन दास और धनी स्वतंत्र व्यक्ति को तुम बराबर नहीं समझते, ऐसे मुझे और इन मूर्तियों को कैसे बराबर समझ रहे हो जो एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकतीं। और यदि मक्खी उन का चढ़ावा ले भागे तो वह छीन भी नहीं सकतीं? इस से बड़ा अत्याचार क्या हो सकता है? 2. अर्थात अल्लाह के सिवा तुम्हारे पूज्यों में से कोई प्रशंसा के लायक़ नहीं है।
آية رقم 76
तथा अल्लाह ने दो व्यक्तियों का उदाहरण दिया है; दोनों में से एक गूँगा है, वह किसी चीज़ का अधिकार नहीं रखता, वह अपने स्वामी पर बोझ है, वह उसे जहाँ भेजता है, कोई भलाई नहीं लाता। तो क्या वह और जो न्याय का आदेश देता हो और स्वयं सीधी[1] राह पर हो, बराबर हो जायेंगे?
1. यह दूसरा उदाहरण है जो मूर्तियों का दिया है। जो गूँगी-बहरी होती हैं।
آية رقم 77
और अल्लाह ही को आकाशों तथा धरती के परोक्ष[1] का ज्ञान है और प्रलय (क़्यामत) का विषय तो बस पलक झपकने जैसा[2] होगा अथवा उससे भी अधिक शीघ्र। वास्तव में, अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।
1. अर्थात गुप्त तथ्यों का। 2. अर्थात पल भर में आयेगी
آية رقم 78
और अल्लाह ही ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के गर्भों से निकाला, इस दशा में कि तुम कुछ नहीं जानते थे और तुम्हारे कान और आँख तथा दिल बनाये, ताकि तुम (उसका) उपकार मानो।
آية رقم 79
क्या वे पक्षियों को नहीं देखते कि वे अंतरिक्ष में कैसे वशीभूत हैं? उन्हें अल्लाह ही थामता[1] है। वास्तव में, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो ईमान लाते हैं।
1. अर्थात पक्षियों को यह क्षमता अल्लाह ही ने दी है।
آية رقم 80
और अल्लाह ही ने तुम्हारे घरों को निवास स्थान बनाया और पशुओं की खालों से तुम्हारे लिए ऐसे घर[1] बनाये, जिन्हें तुम अपनी यात्रा तथा अपने विराम के दिन हल्का (अल्पभार) पाते हो और उनकी ऊन और रोम तथा बालों से उपक्रण और लाभ के सामान, जीवन की निश्चित अवधि तक के लिए (बनाये)।
1. अर्थात चमड़ों के खेमे।
آية رقم 81
और अल्लाह ही ने तुम्हार लिए उस चीज़ में से, जो उत्पन्न की है, छाया बनायी है और तुम्हारे लिए पर्वतों में गुफाएँ बनायी हैं और तुम्हारे लिए ऐसे वस्त्र बनाये हैं, जो तुम्हे धूप से बचायें[1]। इसी प्रकार, वह तुमपर अपना उपकार पूरा करता है, ताकि तुम आज्ञाकारी बनो।
1. अर्थात कवच आदि।
آية رقم 82
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फिर यदि वे विमुख हों, तो आपपर बस प्रत्यक्ष (खुला) उपदेश पहुँचा देना है।
آية رقم 83
वे अल्लाह के उपकार पहचानते हैं, फिर उसका इन्कार करते हैं और उनमें अधिक्तर कृतघ्न हैं।
آية رقم 84
और जिस[1] दिन, हम प्रत्येक समुदाय से एक साक्षी (गवाह) खड़ा[2] करेंगे, फिर काफ़िरों को बात करने की अनुमति नहीं दी जायेगी और न उनसे क्षमा याचना की माँग की जायेगी।
1. अर्थात प्रलय के दिन। 2. (देखियेः सूरह निसा, आयतः41)
آية رقم 85
और जब अत्याचारी यातना देखेंगे, उनकी यातना कुछ कम नहीं की जायेगी और न उन्हें अवकाश दिया[1] जायेगा।
1. अर्थात तौबा करने का।
آية رقم 86
और जब मुश्रिक अपने (बनाये हुए) साझियों को देखेंगे, तो कहेंगेः हे हमारे पालनहार! यही हमारे साझी हैं, जिन्हें हम, तुझे छोड़कर पुकार रहे थे। तो वे (पूज्य) बोलेंगे कि निश्चय तुम सब मिथ्यावादी (झूठे) हो।
آية رقم 87
उस दिन, वे अल्लाह के आगे झुक जायेंगे और उनसे खो जायेँगी, जो मिथ्या बातें वे बनाते थे।
آية رقم 88
जो लोग काफिर हो गये और (दूसरों को भी) अल्लाह की डगर (इस्लाम) से रोक दिये, उन्हें हम यातना पर यातना देंगे, उस उपद्रव के बदले, जो वे कर रहे थे।
آية رقم 89
और जिस दिन, हम प्रत्येक समुदाय से एक साक्षी उनके विरुध्द उन्हीं में से खड़ा कर देंगे और (हे नबी!) हम आपको उनपर साक्षी (गवाह) बनायेंगे[1] और हमने आपपर ये पुस्तक (क़ुर्आन) अवतरित की है, जो प्रत्येक विषय का खुला विवरण है, मार्गदर्शन दया तथा शुभ सूचना है आज्ञाकारियों के लिए।
1. (देखियेः सूरह बक़रा, आयतः143)
آية رقم 90
वस्तुतः, अल्लाह तुम्हें न्याय, उपकार और समीपवर्तियों को देने का आदेश दे रहा है और निर्लज्जा, बुराई और विद्रोह से रोक रहा है और तुम्हें सिखा रहा है, ताकि तुम शिक्षा ग्रहण करो।
آية رقم 91
और जब अल्लाह से कोई वचन करो, तो उसे पूरा करो और अपनी शपथों को सुदृढ़ करने के पश्चात् भंग न करो, जब तुमने अल्लाह को अपने ऊपर गवाह बनाया है। निश्चय अल्लाह जो कुछ तुम करते हो, उसे जानता है।
آية رقم 92
और तुम्हारी दशा उस स्त्री जैसी न हो जाये, जिसने अपना सूत कातने के पश्चात् उधेड़ दिया। तुम अपनी शपथों को आपस में विश्वासघात का साधन बनाते हो, ताकि एक समुदाय दूसरे समुदाय से अधिक लाभ प्राप्त करे। अल्लाह इस[1] (वचन) के द्वारा तुम्हारी परीक्षा ले रहा है और प्रलय के दिन तुम्हारे लिए अवश्य उसे उजागर कर देगा, जिसमें तुम विभेद कर रहे थे।
1. अर्थात किसी समुदाय से समझौता कर के विश्वासघात न किया जाये कि दूसरे समुदाय से अधिक लाभ मिलने पर समझौता तोड़ दिया जाये।
آية رقم 93
और यदि अल्लाह चाहता, तो तुम्हें एक समुदाय बना देता। परन्तु वह जिसे चाहता है, कुपथ कर देता है और जिसे चाहता है, सुपथ दर्शा देता है और तुमसे उसके बारे में अवश्य पूछा जायेगा, जो तुम कर रहे थे।
آية رقم 94
और अपनी शपथों को आपस में विश्वासघात का साधन न बनाओ, ऐसा न हो कि कोई पग अपने स्थिर (दृढ़) होने के पश्चात् (ईमान से) फिसल[1] जाये और तुम उसके बदले बुरा परिणाम चखो कि तुमने अल्लाह की राह से रोका है और तुम्हारे लिए बड़ी यातना हो।
1. अर्थात ऐसा न हो कि कोई व्यक्ति इस्लाम की सत्यता को स्वीकार करने के पश्चात् केवल तुम्हारे दुराचार को देख कर इस्लाम से फिर जाये। और तुम्हारे समुदाय में सम्मिलित होने से रुक जाये। अन्यथा तुम्हारा व्यवहार भी दूसरों से कुछ भिन्न नहीं है।
آية رقم 95
और अल्लाह से किये हुए वचन को तनिक मूल्य के बदले न बेचो[1]। वास्तव में, जो अल्लाह के पास है, वही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो।
1. अर्थात संसारिक लाभ के लिये वचन भंग न करो। (देखियेः सूरह आराफ़, आयतः172)
آية رقم 96
जो तुम्हारे पास है, वह व्यय (ख़र्च) हो जायेगा और जो अल्लाह के पास है, वह शेष रह जाने वाला है और हम, जो धैर्य धारण करते हैं, उन्हें अवश्य उनका पारिश्रमिक (बदला) उनके उत्तम कर्मों के अनुसार प्रदान करेंगे।
آية رقم 97
जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत करायेंगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।
آية رقم 98
तो (हे नबी!) जब आप क़ुर्आन का अध्ययन करें, तो धिक्कारे हुए शैतान से अललाह की शरण[1] माँग लिया करें।
1. अर्थात "अऊज़ुबिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम" पढ़ लिया करें।
آية رقم 99
वस्तुतः, उसका वश उनपर नहीं है, जो ईमान लाये हैं और अपने पालनहार ही पर भरोसा करते हैं।
آية رقم 100
उसका वश तो केवल उनपर चलता है, जो उसे अपना संरक्षक बनाते हैं और जो मिश्रणवादी (मुश्रिक) हैं।
آية رقم 101
और जब हम किसी आयत (विधान) के स्थान पर कोई आयत बदल देते हैं और अल्लाह ही अधिक जानता है उसे, जिसे वह उतारता है, तो कहते हैं कि आप तो केवल घड़ लेते हैं, बल्कि उनमें अधिक्तर जानते ही नहीं।
آية رقم 102
आप कह दें कि इसे (रूह़ुल कुदुस)[1] ने आपके पालनहार की ओर से सत्य के साथ क्रमशः उतारा है, ताकि उन्हें सुदृढ़ कर दे, जो ईमान लाये हैं तथा मार्गदर्शन और शुभ सूचना है, आज्ञाकारियों के लिए।
2. इस का अर्थ पवित्रात्मा है। जो जिब्रील अलैहिस्सलाम की उपाधि है। यही वह फ़रिश्ता है जो वह़्यी लाता था।
آية رقم 103
तथा हम जानते हैं कि वे (काफ़िर) कहते हैं कि उसे (नबी को) कोई मनुष्य सिखा रहा[1] है। जबकी उसकी भाषा जिसकी ओर संकेत करते हैं, विदेशी है और ये[2] स्पष्ट अरबी भाषा है।
1. इस आयत में मक्का के मिश्रणवादियों के इस आरोप का खण्डन किया गया है कि क़ुर्आन आप को एक विदेशी सिखा रहा है। 2. अर्थात मक्के वाले जिसे कहते हैं कि वह मुह़म्मद को क़ुर्आन सिखाता है उस की भाषा तो अर्बी है ही नहीं, तो वह आप को क़ुर्आन कैसे सिखा सकता है जो बहुत उत्तम तथा श्रेष्ठ अर्बी भाषा में है। क्या वे इतना भी नहीं समझते?
آية رقم 104
वास्तव में, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं लाते, उन्हें अल्लाह सुपथ नहीं दर्शाता और उन्हीं के लिए दुःखदायी यातना है।
آية رقم 105
झूठ केवल वही घड़ते हैं, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं लाते और वही मिथ्यावादी (झूठे) हैं।
آية رقم 106
जिसने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, अपने ईमान लाने के पश्चात्, परन्तु जो बाध्य कर दिया गया हो, इस दशा में कि उसका दिल ईमान से संतुष्ट हो, (उसके लिए क्षमा है)। परन्तु जिसने कुफ़्र के साथ सीना खोल दिया[1] हो, तो उन्हीं पर अल्लाह का प्रकोप है और उन्हीं के लिए महा यातना है।
1. अर्थात स्वेच्छा कुफ़्र किया हो।
آية رقم 107
ये इसलिए कि उन्होंने सांसारिक जीवन को प्रलोक पर प्राथमिकता दी है और वास्तव में अल्लाह, काफ़िरों को सुपथ नहीं दिखाता।
آية رقم 108
वही लोग हैं, जिनके दिलों, कानों और आँखों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है तथा यही लोग अचेत हैं।
آية رقم 109
निश्चय वही लोग, प्रलोक में क्षतिग्रस्त होने वाले हैं।
آية رقم 110
फिर वास्तव में, आपका पालनहार उन लोगों[1] के लिए जिन्होंने हिजरत (प्रस्थान) की और उसके पश्चात् परीक्षा में डाले गये, फिर जिहाद किया और सहनशील रहे, वास्तव में, आपका पालनहार इस (परीक्षा) के पश्चात् बड़ा क्षमाशील, दयावान् है।
1. इन से अभिप्रेत नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वह अनुयायी हैं, जो मक्कासे मदीना हिजरत कर गये।
آية رقم 111
जिस दिन प्रत्येक प्राणी को अपने बचाव की चिन्ता होगी और प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जायेगा और उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।
آية رقم 112
अल्लाह ने एक बस्ती का उदाहरण दिया है, जो शान्त संतुष्ट थी, उसकी जीविका प्रत्येक स्थान से प्राचूर्य के साथ पहुँच रही थी, तो उसने अल्लाह के उपकारों के साथ कुफ़्र किया। तब अल्ल्लाह ने उसे भूख और भय का वस्त्र चखा[1] दिया, उसके बदले जो वह[2] कर रहे थे।
1. अर्थात उन पर भूख और भय की आपदायें छा गईं। 2. अर्थात उस बस्ती के निवासी। और इस बस्ती से अभिप्रेत मक्का है, जिन पर उन के कुफ़्र के कारण अकाल पड़ा।
آية رقم 113
और उनके पास एक[1] रसूल उन्हीं में से आया, तो उन्होंने उसे झुठला दिया। अतः उन्हें यातना ने पकड़ लिया और वे अत्याचारी थे।
1. अर्थात मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का के क़ुरैशी वंश से ही थे, फिर भी उन्हों ने आप की बात को नहीं माना।
آية رقم 114
अतः उसमें से खाओ, जो अल्लाह ने तुम्हें ह़लाल (वैध) स्वच्छ जीविका प्रदान की है और अल्लाह का उपकार मानो, यदि तुम उसी की इबादत (वंदना) करते हो।
آية رقم 115
जो कुछ उसने तुमपर ह़राम (अवैध) किया है, वह मुर्दार, रक्त और सुअर का मांस है और जिसपर अल्लाह के सिवा दूसरे का नाम लिया गया[1] हो, फिर जो भूख से आतुर हो जाये, इस दशा में कि वह नियम न तोड़ रहा[2] हो और न आवश्यक्ता से अधिक खाये, तो वास्तव में, अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।
1. अर्थात अल्लाह के सिवा अन्य के नाम से बलि दिया गया पशु। ह़दीस में है कि जो अल्लाह के सिवा दूसरे के नाम से बलि दे उस पर अल्लाह की धिक्कार है। (सह़ीह़ बुख़ारीः1978) 2. (देखियेः सूरह बक़रा, आयतः173, सूरह माइदा, आयतः3, तथा सूरह अन्आम, आयतः145)
آية رقم 116
और मत कहो -उस झूठ के कारण, जो तुम्हारी ज़ुबानों पर आ जाये- कि ये ह़लाल (वैध) है और ये ह़राम (अवैध) है, ताकि अल्लाह पर मिथ्यारोप[1] करो। वास्तव में, जो लोग अल्लाह पर मिथ्यारोप करते हैं, वे (कभी) सफल नहीं होते।
1. क्यों कि ह़लाल और ह़राम करने का अधिकार केवल अल्लाह को है।
آية رقم 117
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(इस मिथ्यारोपन का) लाभ तो थोड़ा है और उन्हीं के लिए (परलोक में) दुःखदायी यातना है।
آية رقم 118
और उनपर, जो यहूदी हो गये, हमने उसे ह़राम (अवैध) कर दिया, जिसका वर्णन हमने इस[1] से पहले आपसे कर दिया है और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
1. इस से संकेत सूरह अन्आम, आयतः26 की ओर है।
آية رقم 119
फिर वास्तव में, आपका पालनहार उन्हें, जो अज्ञानता के कारण बुराई कर बैठे, फिर उसके पश्चात् क्षमा याचना कर ली और अपना सुधार कर लिया, वास्तव में, आपका पालनहार इसके पश्चात् अति क्षमी, दयावान् है।
آية رقم 120
वास्तव में, इब्राहीम एक समुदाय[1] था, अल्लाह का आज्ञाकारी एकेश्वरवादी था और मिश्रणवादियों (मुश्रिकों) में से नहीं था।
1. अर्थात वह अकेला सम्पूर्ण समुदाय था। क्यों कि उस के वंश से दो बड़ी उम्मतें बनीं: एक बनी इस्राईल, और दूसरी बनी इस्माईल जो बाद में अरब कहलाये। इस का एक दूसरा अर्थ मुखिया भी होता है।
آية رقم 121
उसके उपकारों को मानता था, उसने उसे चुन लिया और उसे सीधी राह दिखा दी।
آية رقم 122
और हमने उसे संसार में भलाई दी और वास्तव में वह परलोक में सदाचारियों में से होगा।
آية رقم 123
फिर हमने (हे नबी!) आपकी और वह़्यी की कि एकेश्वरवादी इब्राहीम के धर्म का अनुसरण करो और वह मिश्रणवादियों में से नहीं था।
آية رقم 124
सब्त[1] (शनिवार का दिन) तो उन्हीं पर, निर्धारित किया गया, जिन्होंने उसमें विभेद किया। और वस्तुतः, आपका पालनहार उनके बीच उसमें निर्णय कर देगा, जिसमें वे विभेद कर रहे थे।
1. अर्थात सब्त का सम्मान जैसे इस्लाम में नहीं है, इसी प्रकार इब्राहीम अलैहिस्स्लाम के धर्म में भी नहीं है। यह तो केवल उन के लिये निर्धारित किया गया जिन्हों ने विभेद कर के जुमुआ के दिन की जगह सब्त का दिन निर्धारित कर लिया। तो अल्लाह ने उन के लिये उसी का सम्मान अनिवार्य कर दिया कि इस में शिकार न करो। (देखियेः सूरहा आराफ, आयतः163)
آية رقم 125
(हे नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार की राह (इस्लाम) की ओर तत्वदर्शिता तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे अंदाज़ में शास्त्रार्थ करें, जो उत्तम हो। वास्तव में, अल्लाह उसे अधिक जानता है, जो उसकी राह से विचलित हो गया और वही सुपथों को भी अधिक जानता है।
آية رقم 126
और यदि तुम लोग बदला लो, तो उतना ही लो, जितना तुम्हें सताया गया हो और यदि सहन कर जाओ, तो सहनशीलों के लिए यही उत्त्म है।
آية رقم 127
और (हे नबी!) आप सहन करें और आपका सहन करना अल्लाह ही की सहायता से है और उनके (दुर्व्यवहार) पर शोक न करें और न उनके षड्यंत्र से तनिक भी संकुचित हों।
آية رقم 128
वास्तव में, अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो सदाचारी हैं और जो उपकार करने वाले हैं।
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