ترجمة معاني سورة الأحقاف باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية
مولانا عزيز الحق العمري
آية رقم 1
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ह़ा मीम।
آية رقم 2
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इस पुस्तक का उतरना अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी की ओर से है।
آية رقم 3
हमने नहीं उत्पन्न किया है आकाशों तथा धरती को और जो कुछ उनके बीच है, परन्तु सत्य के साथ, एक निश्चित अवधि तक के लिए तथा जो काफ़िर हैं, उन्हें जिस बात से सावधान किया जाता है, वे उससे मुँह मोड़े हुए हैं।
آية رقم 4
आप कहें कि भला देखो कि जिसे तुम पुकारते हो अल्लाह के सिवा, तनिक मुझे दिखा दो कि उन्होंने क्या उत्पन्न किया है धरती में से? अथवा उनका कोई साझा है आकाशों में? मेरे पास कोई पुस्तक[1] प्रस्तुत करो इससे पूर्व की अथवा बचा हुआ कुछ[2] ज्ञान, यदि तुम सच्चे हो।
1. अर्थात यदि तुम्हें मेरी शिक्षा का सत्य होना स्वीकार नहीं तो किसी धर्म की आकाशीय पुस्तक ही से सिध्द कर के दिखा दो कि सत्य की शिक्षा कुछ और है। और यह भी न हो सके तो किसी ज्ञान पर आधारित कथन और रिवायत ही से सिध्द कर दो कि यह शिक्षा पूर्व के नबियों ने नहीं दी है। अर्थ यह है कि जब आकाशों और धरती की रचना अल्लाह ही ने की है तो उस के साथ दूसरों को पूज्य क्यों बनाते हो? 2. अर्थात इस से पहले वाली आकाशीय पुस्तकों का।
آية رقم 5
तथा उससे अधिक बहका हुआ कौन हो सकता है, जो अल्लाह के सिवा उसे पुकारता हो, जो उसकी प्रार्थना स्वीकार न कर सके, प्रलय तक और वे उसकी प्रार्थना से निश्चेत (अनजान्) हों?
آية رقم 6
तथा जब लोग एकत्र किये जायेंगे, तो वे उनके शत्रु हो जायेंगे और उनकी इबादत का इन्हार कर[1] देंगे।
1. इस विषय की चर्चा क़ुर्आन की अनेक आयतों में आई है। जैसे सूरह यूनुस, आयतः 290, सूरह मर्यम, आयतः 81-82, सूरह अन्कबूत, आयतः 25 आदि।
آية رقم 7
और जब पढ़कर सुनाई गईं उन्हें हमारी खुली आयतें, तो काफ़िरों ने उस सत्य को, जो उनके पास आ चुका है, कह दिया कि ये तो खुला जादू है।
آية رقم 8
क्या वे कहते हैं कि आपने इसे[1] स्वयं बना लिया है? आप कह दें कि यदि मैंने इसे स्वयं बना लिया है, तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से बचाने का कोई अधिकार नहीं रखते।[2] वही अधिक ज्ञानि है उन बातों का, जो तुम बना रहे हो। वही पर्याप्त है गवाह के लिए मेरे तथा तुम्हारे बीच और वह बड़ा क्षमाशील, दयावान् है।
1. अर्थात क़ुर्आन को। 2. अर्थात अल्लाह की यातना से मेरी कोई रक्षा नहीं कर सकता। (देखियेः सूरह अह़्क़ाफ़, आयतः 44,47)
آية رقم 9
आप कह दें कि मैं कोई नया रसूल नहीं हूँ और न मैं जानता हूँ कि मेरे साथ क्या होगा[1] और न तुम्हारे साथ। मैं तो केवल अनुसरण कर रहा हूँ उसका, जो मेरी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। मैं तो केवल खुला सावधान करने वाला हूँ।
1. अर्थात संसार में। अन्यथा यह निश्चित है कि परलोक में ईमान वाले के लिये स्वर्ग तथा काफ़िर के लिये नरक है। किन्तु किसी निश्चित व्यक्ति के परिणाम का ज्ञान किसी को नहीं।
آية رقم 10
आप कह दें: तुम बताओ यदि ये (क़ुर्आन) अल्लाह की ओर से हो और तुम उसे न मानो, जबकि गवाही दे चुका है एक गवाह, इस्राईल की संतान में से इसी बात[1] पर, फिर वह ईमान लाया तथा तुम घमंड कर गये? तो वास्तव में अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता अत्याचारी जाति को।[2]
1. जैसे इस्राईली विद्वान अब्दुल्लाह पुत्र सलाम ने इसी क़ुर्आन जैसी बात के तौरात में होने की गवाही दी कि तौरात में मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के नबी होने का वर्णन है। और वे आप पर ईमान भी लाये। (सह़ीह़ बुख़ारीः3813, सह़ीह़ मुस्लिमः 2484) 2. अर्थात अत्याचारियों को उन के अत्याचार के कारण ही कुपथ में रहने देता है ज़बरदस्ती किसी को सीधी राह पर नहीं चलाता।
آية رقم 11
और काफ़िरों ने कहा, उनसे जो ईमान लाये, यदि ये (धर्म) उत्तम होता, तो वह पहले नहीं आते हमसे, उसकी ओर और जब नहीं पाया मार्गदर्शन उन्होंने इस (क़ुर्आन) से, तो अब यही कहेंगे कि ये तो पुराना झूठ है।
آية رقم 12
जबकि इससे पूर्व मूसा की पुस्तक मार्गदर्शक तथा दया बनकर आ चुकी और ये पुस्तक (क़ुर्आन) सच[1] बताने वाली है अरबी भाषा में।[2] ताकि वह सावधान कर दे, अत्याचारियों को और शुभ सूचना हो, सदाचारियों के लिए।
1. अपने पूर्व की आकाशीय पुस्तकों को। 2. अर्थात इस की कोई मूल शिक्षा ऐसी नहीं जो मूसा की पुस्तक में न हो। किन्तु यह अर्बी भाषा में है। इस लिये कि इस से प्रथम संबोधित अरब लोग थे। फिर सारे लोग। इस लिये क़ुर्आन का अनुवाद प्राचीन काल ही से दूसरी भाषाओं में किया जा रहा है। ताकि जो अर्बी नहीं समझते वह भी उस से शिक्षा ग्रहण करें।
آية رقم 13
निश्चय जिन्होंने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है। फिर उसपर स्थिर रह गये, तो कोई भय नहीं होगा उनपर और न वे[1] उदासीन होंगे।
1. (देखियेः सूरह ह़ा, मीम, सज्दा, आयतः31) ह़दीस में है एक व्यक्ति ने कहाः हे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम!) मूझे इस्लाम के बारे में ऐसी बात बतायें कि फिर किसी से कुछ पूछना न पड़े। आप ने फ़रमायाः कहो कि मैं अल्लाह पर ईमान लाया फिर उसी पर स्थित हो जाओ। (सह़ीह़ मुस्लिमः38)
آية رقم 14
यही स्वर्गीय हैं, जो सदावासी होंगे उसमें, उन कर्मों के प्रतिफल (बदले) में, जो वे करते रहे।
آية رقم 15
और हमने निर्देश दिया है मनुष्य को, अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का। उसे गर्भ में रखा है उसकी माँ ने दुःख झेलकर तथा जन्म दिया उसे दुःख झेलकर तथा उसके गर्भ में रखने तथा दूध छुड़ाने की अवधि तीस महीने रही।[1] यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ, तो कहने लागाः हे मेरे पालनहार! मुझे क्षमता दे कि कृतज्ञ रहूँ तेरे उस पुरस्कार का, जो तूने प्रदान किया है मुझे तथा मेरे माता-पिता को। तथा ऐसा सत्कर्म करूँ, जिससे तू प्रसन्न हो जाये तथा सुधार दे मेरे लिए मेरी संतान को, मैं ध्यानमग्न हो गया तेरी ओर तथा मैं निश्चय मुस्लिमों में से हूँ।
1. इस आयत तथा क़ुर्आन की अन्य आयतों में भी माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने पर विशेष बल दिया गया है। तथा उन के लिये प्रार्थना करने का आदेश दिया गया है। देखियेः सूरह बनी इस्राईल, आयतः170। ह़दीसों में भी इस विषय पर अति बल दिया गया है। आदर्णीय अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि एक व्यक्ति ने आप से पूछा कि मेरे सदव्यवहार का अधिक योग्य कौन है? आप ने फ़रमायाः तेरी माँ। उस ने कहाः फिर कौन? आप ने कहाः तेरी माँ। उस ने कहाः फिर कौन? आप ने कहाः तेरी माँ। चौथी बार आप ने कहाः तेरे पिता। (सह़ीह़ बुख़ारीः 5971, सह़ीह़ मुस्लिमः2548)
آية رقم 16
वही हैं, स्वीकार कर लेंगे हम जिनसे, उनके सर्वोत्तम कर्मों को तथा क्षमा कर देंगे, उनके दुष्कर्मों को। (वे) स्वर्ग वासियों में से हैं, उस सत्य वचन के अनुसार, जो उनसे किया जाता था।
آية رقم 17
तथा जिसने कहा अपने माता पिता सेः धिक है तुम दोनों पर! क्या मुझे डरा रहे हो कि मैं धरती से निकाला[1] जाऊँगा, जबकि बहुत-से युग बीत गये[2] इससे पूर्व? और वो दोनों दुहाई दे रहे थे अल्लाह कीः तेरा विनाश हो! तू ईमान ला! निश्चय अल्लाह का वचन सच है। तो वह कह रहा था कि ये अगलों की कहानियाँ हैं।[3]
1. अर्थात मौत के पश्चात् प्रलय के दिन पुनः जीवित कर के समाधि से निकाला जाऊँगा। इस आयत में बुरी संतान का व्यवहार बताया गया है। 2. और कोई फिर जीवित हो कर नहीं आया। 3. इस आयत में मुसलमान माता-पिता का विवाद एक काफ़िर पुत्र के साथ हो रहा है जिस का वर्णन उदाहरण के लिये इस आयत में किया गया है। और इस प्रकार का वाद-विवाद किसी भी मुसलमान तथा काफ़िर में हो सकता है। जैसा कि आज अनेक पश्चिमी आदि देशों में हो रहा है।
آية رقم 18
यही वो लोग हैं, जिनपर अल्लाह की यातना का वचन सिध्द हो गया, उन समुदायों में, जो गुज़र चुके इनसे पूर्व, जिन्न तथा मनुष्यों में से। वास्तव में, वही क्षति में हैं।
آية رقم 19
तथा प्रत्येक के लिए श्रेणियाँ हैं, उनके कर्मानुसार और उन्हें भरपूर बदला दिया जायेगा उनके कर्मों का तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।
آية رقم 20
और जिस दिन सामने लाये जायेंगे, जो काफ़िर हो गये, अग्नि के। (उनसे कहा जायेगाः) तुम ले चुके अपना आन्नद अपने सांसारिक जीवन में और लाभान्वित हो चुके उनसे। तो आज तुम्हें अपमान की यातना दी जायेगी उसके बदले, जो तुम घमंड करते रहे धरती में अनुचित तथा उसके बदले, जो उल्लंघन करते रहे।
آية رقم 21
तथा याद करो आद के भाई (हूद[1]) को। जब उसने अपनी जाति को सावधान किया, अह़्क़ाफ़[2] में, जबकि गुज़र चुके सावधान करने वाले (रसूल) उसके पहले और उसके पश्चात् कि इबादत (वंदना) न करो अल्लाह के अतिरिक्त की। मैं डरता हूँ तुमपर, एक बड़े दिन की यातना से।
1. इस में मक्का के प्रमुखों को जिन्हें अपने धन तथा बल पर बड़ा गर्व था अरब क्षेत्र की एक प्राचीन जाति की कथा सुनाने को कहा जा रहा है जो बड़ी सम्पन्न तथा शक्तिशाली थी। अह़्क़ाफ़, अर्थात ऊँचा रेत का टीला है। यह जाति उसी क्षेत्र में निवास करती थी जिसे
آية رقم 22
तो उन्होंने कहा कि क्या तुम हमें फेरने आये हो हमारे पूज्यों से? तो ले आओ हमारे पास, जिसकी हमें धमकी दे रहे हो, यदि तुम सच्चे हो।
آية رقم 23
हूद ने कहाः उसका ज्ञान तो अल्लाह ही को है और मैं तुम्हें वही उपदेश पहुँचा रहा हूँ, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ। परन्तु, मैं देख रहा हूँ तुम्हें कि तुम अज्ञानता की बातें कर रहे हो।
آية رقم 24
फिर जब उन्होंने देखा एक बादल आते हुए अपनी वादियों की ओर, तो कहाः ये एक बादल है हमपर बरसने वाला। बल्कि ये वही है, जिसकी तुमने जल्दी मचायी है। ये आँधी है, जिसमें दुःखदायी यातना है।[1]
1. ह़दीस मे है कि जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बादल या आँधी देखते तो व्याकूल हो जाते। आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कहाः अल्लाह के रसूल! लोग बादल देख कर वर्षा की आशा में प्रसन्न होते हैं और आप क्यों व्याकूल हो जाते हैं? आप ने कहाः आइशा! मैझे भय रहता है कि इस में कोई यातना न हो? एक जाति को आँधी से यातना दी गई। और एक जाति ने यातना देखी तो कहाः यह बादल हम पर वर्षा करेगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4829, तथा सह़ीह़ सुस्लिमः 899)
آية رقم 25
वह विनाश कर देगी प्रत्येक वस्तु को अपने पालनहार के आदेश से, तो वे हो गये ऐसे कि नहीं दिखाई देता था कुछ, उनके घरों के अतिरिक्त। इसी प्रकार, हम बदला दिया करते हैं अपराधी लोगों को।
آية رقم 26
तथा हमने उन्हें वह शक्ति दी थी, जो इन्हें[1] नहीं दी है। हमने बनाये थे उनके कान, आँखें और दिल, तो नहीं काम आये उनके कान, उनकी आँखें तथा न उनके दिल कुछ भी। क्योंकि वे इन्कार करते थे अल्लाह की आयतों का तथा घेर लिया उन्हें उसने, जिसका वे उपहास कर रहे थे।
1. अर्थात मक्का के काफ़िरों को।
آية رقم 27
तथा हम ध्वस्त कर चुके हैं तुम्हारे आस-पास की बस्तियों को तथा हमने उन्हें अनेक प्रकार से आयतें सुना दीं, ताकि वे वापस आ जायें।
آية رقم 28
तो क्यों नहीं सहायता की उनकी, उन्होंने जिन्हें बनाया था अल्लाह के अतिरिक्त (अल्लाह के) सामीप्य के लिए पूज्य (उपास्य)? बल्कि वे खो गये उनस और ये[1] उनका झूठ था तथा जिसे स्वयं वे घड़ रहे थे।
1. अर्थात अल्लाह के अतिरिक्त को पूज्य बनाना।
آية رقم 29
तथा याद करें, जब हमने फेर दिया आपकी ओर जिन्नों के एक[1] गिरोह को, ताकि वे क़ुर्आन सुनें। तो जब वे उपस्थित हुए आपके पास, तो उन्होंने कहा कि चुप रहो और जब पढ़ लिया गया, तो वे फिर गये अपनी जाति की ओर सावधान करने वाले होकर।
1. आदरणीय इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि एक बार नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने कुछ अनुयायियों (सह़ाबा) के साथ उकाज़ के बाज़ार की ओर जा रहे थे। इन दिनों शैतानों को आकाश की सूचनायें मिलनी बंद हो गई थीं। तथा उन पर आकाश से अंगारे फेंके जा रहे थे। तो वे इस खोज में पूर्व तथा पशिचम की दिशाओं में निकले कि इस का क्या कारण है? कुछ शैतान तिहामा (ह़जाज़) की ओर भी आये और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तक पहुँच गये। उस समय आप "नखला" में फ़ज्र की नमाज़ पढ़ा रहे थे। जब जिन्नों ने क़ुर्आन सुना तो उस की ओर कान लगा दिये। फिर कहा कि यही वह चीज़ है जिस के कारण हम को आकाश की सूचनायें मिलनी बंद हो गई हैं। और अपनी जाति से जा कर यह बात कही। तथा अल्लाह ने यह आयत अपने नबी पर उतारी। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4921) इन आयतों में संकेत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जैसे मनुष्यों के नबी थे वैसे ही जिन्नों के भी नबी थे। और सभी नबी मनुष्यों में आये। (देखियेः सूरह नह़्ल, आयतः 43, सूरह फ़ुर्क़ान, आयतः20)
آية رقم 30
उन्होंने कहाः हे हमारी जाति! हमने सूनी है एक पुस्तक, जो उतारी गयी है मुसा के पश्चात्। वह अपने से पूर्व की किताबों की पुष्टि करती है और सत्य तथा सीधी राह दिखाती है।
آية رقم 31
हे हमारी जाति! मान लो अल्लाह की ओर बुलाने वाले की बात तथा ईमान लाओ उसपर, वह क्षमा कर देगा तुम्हारे लिए तुम्हारे पापों को तथा बचा लेगा तुम्हें दुःखदायी यातना से।
آية رقم 32
तथा जो मानेगा नहीं अल्लाह की ओर बुलाने वाले की बात, तो नहीं है वह विवश करने वाला धरती में और नहीं है उसके लिए अल्लाह के अतिरिक्त कोई सहायक। यही लोग खुले कुपथ में हैं।
آية رقم 33
और क्या उन लोगों ने नहीं समझा कि अल्लाह, जिसने उत्पन्न किया है आकाशों तथा धरती को और नहीं थका उनको बनाने से, वह सामर्थ्वान है कि जीवीत कर दे मुर्दों को? क्यों नहीं? वास्तव में, वह जो चाहे, कर सकता है।
آية رقم 34
और जिस दिन सामने लाये जायेंगे, जो काफ़िर हो गये, नरक के, (और उनसे कहा जायेगाः) क्या ये सच नहीं है? वे कहेंगे: क्यों नहीं? हमारे पालनहार की शपथ! वह कहेगाः तब चखो यातना, उस कुफ़्र के बदले, जो तुम कर रहे थे।
آية رقم 35
तो (हे नबी!) आप सहन करें, जैसे साहसी रसूलों ने सहन किया तथा जल्दी न करें उन (की यातना) के लिए। जिस दिन वे देख लेंगे, जिसका उन्हें वचन दिया जा रहा है, तो समझेंगे कि जैसे वे नहीं रहे हैं, परन्तु दिन के कुछ[1] क्षण। बात पूहुँचा दी गयी है, तो अब उन्हीं का विनाश होगा, जो अवज्ञाकारी हैं।
1. अर्थात प्रलय की भीषणता के आगे संसारिक सुख क्षण भर प्रतीत होगा। ह़दीस में है कि नारकियों में से प्रलय के दिन संसार के सब से सुखी व्यक्ति को ला कर नरक में एक बार डाल कर कहा जायेगाः क्या कभी तुमने सुख देखा है? वह कहेगाः मेरे पालनहार! (कभी) नहीं (देखा)। (सह़ीह़ मुस्लिम शरीफ़ः2807)
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