سورة عبس

الترجمة الهندية

ترجمة معاني سورة عبس باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الناشر

مجمع الملك فهد

آية رقم 1
(नबी ने) त्योरी चढ़ाई तथा मुँह फेर लिया।
آية رقم 2
इस कारण कि उसके पास एक अँधा आया।
آية رقم 3
और तुम क्या जानो शायद वह पवित्रता प्राप्त करे।
آية رقم 4
या नसीह़त ग्रहण करे, जो उसे लाभ देती।
آية رقم 5
परन्तु, जो विमुख (निश्चिन्त) है।
آية رقم 6
तुम उनकी ओर ध्यान दे रहे हो।
آية رقم 7
जबकि तुमपर कोई दोष नहीं, यदि वह पवित्रता ग्रहण न करे।
آية رقم 8
तथा जो तुम्हारे पास दौड़ता आया।
آية رقم 9
और वह डर भी रहा है।
آية رقم 10
तुम उसकी ओर ध्यान नहीं देते।[1]
1. (1-10) भावार्थ यह है कि सत्य के प्रचारक का यह कर्तव्य है कि जो सत्य की खोज में हो भले ही वह दरिद्र हो उसी के सुधार पर ध्यान दे। और जो अभिमान के कारण सत्य की परवाह नहीं करते उन के पीछे समय न गवायें। आप का यह दायित्व भी नहीं है कि उन्हें अपनी बात मनवा दें।
آية رقم 11
कदापि ये न करो, ये (अर्थात क़ुर्आन) एक स्मृति (याद दहानी) है।
آية رقم 12
अतः, जो चाहे स्मरण (याद) करे।
آية رقم 13
माननीय शास्त्रों में है।
آية رقم 14
जो ऊँचे तथा पवित्र हैं।
آية رقم 15
ऐसे लेखकों (फ़रिश्तों) के हाथों में है।
آية رقم 16
जो सम्मानित और आदरणीय हैं।[1]
1. (11-16) इन में क़ुर्आन की महानता को बताया गया है कि यह एक स्मृति (याद दहानी) है। किसी पर थोपने के लिये नहीं आया है। बल्कि वह तो फ़रिश्तों के हाथों में स्वर्ग में एक पवित्र शास्त्र के अन्दर सूरक्षित है। और वहीं से वह (क़ुर्आन) इस संसार में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा जा रहा है।
آية رقم 17
इन्सान मारा जाये, वह कितना कृतघ्न (नाशुक्रा) है।
آية رقم 18
उसे किस वस्तु से (अल्लाह) ने पैदा किया?
آية رقم 19
उसे वीर्य से पैदा किया, फिर उसका भाग्य बनाया।
آية رقم 20
फिर उसके लिए मार्ग सरल किया।
آية رقم 21
फिर मौत दी, फिर समाधि में डाल दिया।
آية رقم 22
फिर जब चाहेगा, उसे जीवित कर लेगा।
آية رقم 23
वस्तुतः, उसने उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया।[1]
1. (17-23) तक विश्वासहीनों पर धिक्कार है कि यदि वह अपने अस्तित्व पर विचार करें कि हम ने कितनी तुच्छ वीर्य की बूँद से उस की रचना की तथा अपनी दया से उसे चेतना और समझ दी। परन्तु इन सब उपकारों को भूल कर कृतघ्न बना हुआ है, और पूजा उपासना अन्य की करता है।
آية رقم 24
इन्सान अपने भोजन की ओर ध्यान दे।
آية رقم 25
हमने मूसलाधार वर्षा की।
آية رقم 26
फिर धरती को चीरा फाड़ा।
آية رقم 27
फिर उससे अन्न उगाया।
آية رقم 28
तथा अंगूर और तरकारियाँ।
آية رقم 29
तथा ज़ैतून एवं खजूर।
آية رقم 30
तथा घने बाग़।
آية رقم 31
एवं फल तथा वनस्पतियाँ।
آية رقم 32
तुम्हारे तथा तुम्हारे पशुओं के लिए।[1]
1. (24-32) इन आयतों में इन्सान के जीवन साधनों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अल्लाह की अपार दया की परिचायक हैं। अतः जब सारी व्यवस्था वही करता है तो फिर उस के इन उपकारों पर इन्सान के लिये उचित था कि उसी की बात माने और उसी के आदेशों का पालन करे जो क़ुर्आन के माध्यम से अन्तिम नबी मूह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म) द्वारा परस्तुत किया जा रहा है। (दावतुल क़ुर्आन)
آية رقم 33
तो जब कान फाड़ देने वाली (प्रलय) आ जायेगी।
آية رقم 34
उस दिन इन्सान अपने भाई से भागेगा।
آية رقم 35
तथा अपने माता और पिता से।
آية رقم 36
एवं अपनी पत्नी तथा अपने पुत्रों से।
آية رقم 37
प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन अपनी पड़ी होगी।
آية رقم 38
उस दिन बहुत से चेहरे उज्ज्वल होंगे।
آية رقم 39
हंसते एवं प्रसन्न होंगे।
آية رقم 40
तथा बहुत-से चेहरों पर धूल पड़ी होगी।
آية رقم 41
उनपर कालिमा छाई होगी।
آية رقم 42
वही काफ़िर और कुकर्मी लोग हैं।[1]
1. (33-42) इन आयतों का भावार्थ यह है कि संसार में किसी पर कोई आपदा आती है तो उस के अपने लोग उस की सहायता और रक्षा करते हैं। परन्तु प्रलय के दिन सब को अपनी अपनी पड़ी होगी और उस के कर्म ही उस की रक्षा करेंगे।
تقدم القراءة