الترجمة الهندية से الهندية में सूरह يوسف का अनुवाद
Verse 1
ﮢﮣﮤﮥﮦﮧ
ﮨ
अलिफ, लाम, रा। ये खुली पुस्तक की आयतें हैं।
Verse 2
ﮩﮪﮫﮬﮭﮮ
ﮯ
हमने इस क़ुर्आन को अरबी में उतारा है, ताकि तुम समझो[1]।
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1. क्योंकि क़ुर्आन के प्रथम संबोधित अरब लोग थे, फिर उन के द्वारा दूसरे साधारण मनुष्यों को संबोधित किया गया है। तो यदि प्रथम संबोधित ही क़ुर्आन नहीं समझ सकते तो दूसरों को कैसे समझा सकते थे?
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1. क्योंकि क़ुर्आन के प्रथम संबोधित अरब लोग थे, फिर उन के द्वारा दूसरे साधारण मनुष्यों को संबोधित किया गया है। तो यदि प्रथम संबोधित ही क़ुर्आन नहीं समझ सकते तो दूसरों को कैसे समझा सकते थे?
Verse 3
(हे नबी!) हम बहुत अच्छी शैली में आपकी ओर इस क़ुर्आन की वह़्यी द्वारा आपसे इस कथा का वर्णन कर रहे हैं। अन्यथा आप (भी) इससे पूर्व (इससे) असूचित थे।
Verse 4
जब यूसुफ़ ने अपने पिता से कहाः हे मेरे पिता! मैंने स्वप्न देखा है कि ग्यारह सितारे, सूर्य तथा चाँद मुझे सज्दा कर रहे हैं।
Verse 5
उसने कहाः हे मेरे पुत्र! अपना स्वप्न अपने भाईयों को न बताना[1], अन्यथा वे तेरे विरुध्द षड्यंत्र रचेंगे। वास्तव में, शैतान मानव का खुला शत्रु है।
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1. यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की दूसरी माँओं से दस भाई थे। और एक सगा भाई था। याक़ूब अलैहिस्सलाम यह जानते थे कि सौतीले भाई, यूसुफ़ से ईर्ष्या करते हैं। इस लिये उन को सावधान कर दिया कि अपना स्वप्न उन्हें न बतायें।
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1. यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की दूसरी माँओं से दस भाई थे। और एक सगा भाई था। याक़ूब अलैहिस्सलाम यह जानते थे कि सौतीले भाई, यूसुफ़ से ईर्ष्या करते हैं। इस लिये उन को सावधान कर दिया कि अपना स्वप्न उन्हें न बतायें।
Verse 6
और ऐसा ही होगा, तेरा पालनहार तुझे चुन लेगा तथा तुझे बातों का अर्थ सिखायेगा और तुझपर और याक़ूब के घराने पर अपना पुरस्कार पूरा करेगा[1]। जैसे इससे पहले तेरे पूर्वजों इब्राहीम और इस्ह़ाक़ पर पूरा किया। वास्तव में, तेरा पालनहार बड़ा ज्ञानी तथा गुणी है।
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1. यहाँ पुरस्कार से अभिप्राय नबी बनाना है। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
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1. यहाँ पुरस्कार से अभिप्राय नबी बनाना है। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
Verse 7
वास्तव में, यूसुफ़ और उसके भाईयों (की कथा) में पूछने वालों के[1] लिए कई निशानियाँ हैं।
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1. यह प्रश्न यहूदियों ने मक्का वासियों के माध्यम से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किया था, कि वह कौन से नबी हैं जो शाम में रहते थे, और जब उन का पुत्र मिस्र निकल गया तो उस पर रोते-रोते अंधे हो गये? इस पर यह पूरी सूरह उतरी। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
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1. यह प्रश्न यहूदियों ने मक्का वासियों के माध्यम से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किया था, कि वह कौन से नबी हैं जो शाम में रहते थे, और जब उन का पुत्र मिस्र निकल गया तो उस पर रोते-रोते अंधे हो गये? इस पर यह पूरी सूरह उतरी। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
Verse 8
जब उन (भाईयों) ने कहाः यूसुफ़ और उसका भाई हमारे पिता को, हमसे अधिक प्रिय हैं। जबकि हम एक गिरोह हैं। वास्तव में, हमारे पिता खुली गुमराही में हैं।
Verse 9
यूसुफ़ को वध कर दो या उसे किसी धरती में फेंक दो। इससे तुम्हारे पिता का ध्यान केवल तुम्हारी तरफ हो जायेगा और इसके पश्चात् पवित्र बन जाओ।
Verse 10
उनमें से एक ने कहाः यूसुफ़ को वध न करो, उसे किसी अन्धे कुएँ में डाल दो, उसे कोई क़ाफ़िला निकाल ले जायेगा, यदि कुछ करने वाले हो।
Verse 11
उन्होंने कहाः हे हमारे पिता! क्या बात है कि यूसुफ़ के विषय में आप हमपर भरोसा नहीं करते? जबकि हम उसके शुभचिन्तक हैं।
Verse 12
उसे कल हमारे साथ वन में भेज दें। वह खाये-पिये और खेले-कूदे और हम उसके रक्षक (प्रहरी) हैं।
Verse 13
उस (पिता) ने कहाः मुझे बड़ी चिन्ता इस बात की है कि तुम उसे ले जाओ और मैं डरता हूँ कि उसे भेड़िया न खा जाये और तुम उससे असावधान रह जाओ।
Verse 14
सब (भाईयों) ने कहाः यदि उसे भेड़िया खा गया, जबकि हम एक गिरोह हैं, तो वास्तव में, हम बड़े विनाश में हैं।
Verse 15
फिर जब वे उसे ले गये और निश्चय किया कि उसे अंधे कुएं में डाल दें और हमने उस (यूसुफ़) की ओर वह़्यी की कि तुम अवश्य इन्हें इनका कर्म बताओगे और वे कुछ जानते न होंगे।
Verse 16
ﭤﭥﭦﭧ
ﭨ
और वे संध्या को रोते हुए अपने पिता के पास आये।
Verse 17
सबने कहाः हे पिता! हम आपस में दौड़ करने लगे और यूसुफ को अपने सामान के पास छोड़ दिया और उसे भेड़िया खा गया और आप तो हमारा विश्वास करने वाले नहीं हैं, यद्यपि हम सच ही क्यों न बोल रहे हों।
Verse 18
और वे यूसुफ़ के कुर्ते पर झूठा रक्त[1] लगाकर लाये। उसने कहाः बल्कि तुम्हारे मन ने तुम्हारे लिए एक सुन्दर बात बना ली है! तो अब धैर्य धारण करना ही उत्तम है और उसके संबन्ध में जो बात तुम बना रहे हो, अल्ला ही से सहायता माँगनी है।
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1. भाष्यकारी ने लिखा है कि वे बकरी के बच्चे का रक्त लगा कर लाये थे।
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1. भाष्यकारी ने लिखा है कि वे बकरी के बच्चे का रक्त लगा कर लाये थे।
Verse 19
और एक क़ाफ़िला आया। उसने अपने पानी भरने वाले को भेजा, उसने अपना डोल डाला, तो पुकाराः शुभ हो! ये तो एक बालक है और उसे व्यपारिक सामग्री समझकर छुपा लिया और अल्लाह भली-भाँति जानने वाला था जो वे कर रहे थे।
Verse 20
और उसे तनिक मूल्य; कुछ गिनती के दिरहमों में बेच दिया और वे उसके बारे में कुछ अधिक की इच्छा नहीं रखते थे।
Verse 21
और मिस्र के जिस व्यक्ति ने उसे खरीदा, उसने अपनी पत्नी से कहाः इसे आदर-मान से रखो। संभव है ये हमें लाभ पहुँचाये, अथवा हम इसे अपना पुत्र बना लें। इस प्रकार उसे हमने स्थान दिया और ताकि उसे बातों का अर्थ सिखायें और अल्लाह अपना आदेश पूरा करके रहता है। परन्तु अधिक्तर लोग जानते नहीं हैं।
Verse 22
और जब वह जवानी को पहुँचा, तो हमने उसे निर्णय करने की शक्ति तथा ज्ञान प्रदान किया और इसी प्रकार हम सदाचारियों को प्रतिफल (बदला) देते हैं।
Verse 23
और वह जिस स्त्री[1] के घर में था, उसने उसके मन को रिझाया और द्वार बन्द कर लिए और बोलीः "आ जाओ"। उसने कहाः अल्लाह की शरण! वह मेरा स्वामी है। उसने मुझे अच्छा स्थान दिया है। वास्तव में, अत्याचारी सफल नहीं होते।
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1. अभिप्रेत मिस्र के राजा (अज़ीज़) की पत्नी है।
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1. अभिप्रेत मिस्र के राजा (अज़ीज़) की पत्नी है।
Verse 24
और उस स्त्री ने उसकी इच्छा की और वह (यूसुफ़) भी उसकी इच्छा करते, यदि अपने पालनहार का प्रमाण न देथ लेते[1]। इस प्रकार, हमने (उसे सावधान) किया ताकि उससे बुराई तथा निर्लज्जा को दूर कर दें। वास्तव में, वह हमारे शुध्द भक्तों में था।
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1. यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कोई फ़रिश्ता नहीं एक मनुष्य थे। इस लिये बुराई का इरादा कर सकते थे, किन्तु उसी समय उन के दिल में यह बात आई कि मैं पाप कर के अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकूँगा। इस प्रकार अल्लाह ने उन्हें बुराई से बचा लिया, जो यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की बहुत बड़ी प्रधानता है।
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1. यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कोई फ़रिश्ता नहीं एक मनुष्य थे। इस लिये बुराई का इरादा कर सकते थे, किन्तु उसी समय उन के दिल में यह बात आई कि मैं पाप कर के अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकूँगा। इस प्रकार अल्लाह ने उन्हें बुराई से बचा लिया, जो यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की बहुत बड़ी प्रधानता है।
Verse 25
और दोनों द्वार की ओर दौड़े और उस स्त्री ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ दिया और दोनों ने उसके पति को द्वार के पास पाया। उस (स्त्री) ने कहाः जिसने तेरी पत्नी के साथ बुराई का निश्चय किया, उसका दण्ड इसके सिवा क्या है कि उसे बंदी बना दिया जाये अथवा उसे दुःखदायी यातना (दी जाये)?
Verse 26
उसने कहाः इसीने मुझे रिझाना चाहा था और उस स्त्री के घराने से एक साक्षी ने साक्ष्य दिया कि यदि उसका कुर्ता आगे से फाड़ा गया है, तो वह सच्ची है तथा वह झूठा है।
Verse 27
और यदि उसका कुर्ता पीछे से फाड़ा गया है, तो वह झूठी और वह (यूसुफ़) सच्चा है।
Verse 28
फिर जब उस (पति) ने देखा कि उसका कुर्ता पाछे से फाड़ा गया है, तो कहाः वास्तव में, ये तुम स्त्रियों की चालें हैं और तुम्हारी चालें बड़ी घोर होती हैं।
Verse 29
हे यूसुफ़! तुम इस बात को जाने दो और (हे स्त्री!) तू अपने पाप की क्षमा माँग, वास्तव में, तू पापियों में से है।
Verse 30
नगर की कुछ स्त्रियों ने कहाः अज़ीज़ (प्रमुख अधिकारी) की पत्नी, अपने दास को रिझा रही है! उसे प्रेम ने मुग्ध कर दिया है। हमारे विचार में वह खुली गुमराही में है।
Verse 31
फिर जब उसने उन स्त्रियों की मक्कारी की बात सुनी, तो उन्हें बुला भेजा और उनके (आतिथ्य) के लिए गाव-तकिये लगवाये और प्रत्येक स्त्री को एक छुरी दे दी[1]। उसने (यूसुफ़ से) कहाः इनके समक्ष "निकल आ"। फिर जब उन स्त्रियों ने उसे देखा, तो चकित (दंग) होकर अपने हाथ काट बैठीं तथा पुकार उठीं: अल्लाह पवित्र है! ये मनुष्य नहीं ये तो कोई सम्मानित फ़रिश्ता है।
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1. ताकि अतिथि स्त्रियाँ उस से फलों को काट कर खायें जो उन के लिये रखे गये थे।
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1. ताकि अतिथि स्त्रियाँ उस से फलों को काट कर खायें जो उन के लिये रखे गये थे।
Verse 32
उसने कहाः यही वह है, जिसके बारे में तुमने मेरी निंदा की है। वास्तव में, मैंने ही उसे रिझाया था। मगर वह बच निकला और यदि, वह मेरी बात न मानेगा, तो अवश्य बंदी बना दिया जायेगा और अपमानितों में हो जायेगा।
Verse 33
यूसुफ़ ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! मुझे क़ैद उससे अधिक प्रिय है, जिसकी ओर ये औरतें मुझे बुला रही हैं और यदि तूने मुझसे इनके छल को दूर नहीं किया, तो मैं इनकी ओर झुक पड़ूँगा और अज्ञानों में से हो जाऊँगा।
Verse 34
तो उसके पालनहार ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उससे उनके छल को दूर कर दिया। वास्तव में, वह बड़ा सुनने-जानने वाला है।
Verse 35
फिर उन लोगों[1] ने उचित समझा, इसके पश्चात् कि निशानियाँ देख[2] लीं कि उस (यूसुफ़) को एक अवधि तक के लिए बंदी बना दें।
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1. अर्थात अज़ीज़ (मिस्र देश का शासक) और उस के साथियों ने। 2. अर्थात् यूसुफ़ के निर्दोष होने की निशानियाँ।
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1. अर्थात अज़ीज़ (मिस्र देश का शासक) और उस के साथियों ने। 2. अर्थात् यूसुफ़ के निर्दोष होने की निशानियाँ।
Verse 36
और उसके साथ क़ैद में दो युवकों ने प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहाः मैंने स्वप्न देखा है कि शराब निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहाः मैंने स्वप्न देखा है कि अपने सिर के ऊपर रोटी उठाये हुए हूँ, जिसमें से पक्षी खा रहे हैं। हमें इसका अर्थ (स्वप्नफल) बता दो। हम देख रहे हैं कि तुम सदाचारियों में से हो।
Verse 37
यूसुफ़ ने कहाः तुम्हारे पास तुम्हारा वह भोजन नहीं आयेगा, जो तुम दोनों को दिया जाता है, परन्तु मैं तुम दोनों को उसका अर्थ (फल) बता दूँगा; ये उन बातों में से है, जो मेरे पालनहार ने मुझे सिखायी हैं। मैंने उस जाति का धर्म तज दिया है, जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखती और वही परलोक को नकारने वाले हैं।
Verse 38
और अपने पूर्वजों; इब्राहीम, इस्ह़ाक़ और याक़ूब के धर्म का अनुसरण किया है। हमारे लिए वैध नहीं कि किसी चीज़ को अल्लाह का साझी बनायें। ये अल्लाह की दया है, हमपर और लोगों पर। परन्तु अधिक्तर लोग कृतज्ञ नहीं होते[1]।
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1. अर्थात तौह़ीद और नबियों के धर्म को नहीं मानते जो अल्लाह का उपकार है।
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1. अर्थात तौह़ीद और नबियों के धर्म को नहीं मानते जो अल्लाह का उपकार है।
Verse 39
हे मेरे क़ैद के दोनों साथियो! क्या विभिन्न पूज्य उत्तम हैं या एक प्रभुत्वशाली अल्लाह??
Verse 40
तुम अल्लाह के सिवा जिसकी इबादत (वंदना) करते हो, वे केवल नाम हैं, जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह ने उनका कोई प्रमाण नहीं उतारा है। शासन तो केवल अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो। यही सीधा धर्म है। परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते हैं।
Verse 41
हे मेरे क़ैद के दोनों साथियो! रहा तुममें से एक, तो वह अपने स्वामि को शराब पिलायेगा तथा दूसरा, तो उसको फाँसी दी जायेगी और पक्षी उसके सिर में से खायेंगे। उसका निर्णय कर दिया गया है, जिसके संबन्ध में तुम दोनों प्रश्न कर रहे थे।
Verse 42
और उससे कहा, जिसे समझा कि वह उन दोनों में से मुक्त होने वाला हैः मेरी चर्चा अपने स्वामी के पास कर देना। तो शैतान ने उसे अपने स्वामी के पास, उसकी चर्चा करने को भुला दिया। अतः वह (यूसुफ़) कई वर्ष क़ैद में रह गया।
Verse 43
और (एक दिन) राजा ने कहाः मैं सात मोटी गायों को सपने में देखता हूँ, जिनको सात दुबली गायें खा रही हैं और सात हरी बालियाँ हैं और दूसरी सात सूखी हैं। हे प्रमुखो! मुझे मेरे स्वप्न के सम्बंध में बताओ, यदि तुम स्वप्न-फल बता सकते हो?
Verse 44
सबने कहाः ये तो उलझे स्वप्न की बातें हैं और हम ऐसे स्वप्नों का अर्थ (फल) नहीं जानते।
Verse 45
और उसने कहा, जो दोनों में से मुक्त हुआ था और उसे एक अवधि के पश्चात्, बात याद आयी थीः मैं तुम्हें इसका फल (अर्थ) बता दूँगा, तुम मुझे भेज[1] दो।
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1. अर्थात क़ैद ख़ाने में यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास।
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1. अर्थात क़ैद ख़ाने में यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास।
Verse 46
हे यूसुफ़! हे सत्यवादी! हमें सात मोटी गायों के बारे में बताओ, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं और सात हरी बालियाँ हैं और सात सूखी, ताकि लोगों के पास वापस जाऊँ और ताकि वे जान[1] लें।
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1. अर्थात आप की प्रतिष्ठा और ज्ञान को।
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1. अर्थात आप की प्रतिष्ठा और ज्ञान को।
Verse 47
यूसुफ़ ने कहाः तुम सात वर्ष निरन्तर खेती करते रहोगे। तो जो कुछ काटो, उसे उसकी बाली में छोड़ दो, परन्तु थोड़ा जिसे खाओगे। ( उसे बालियों से निकाल लो।)
Verse 48
फिर इसके पश्चात् सात कड़े अकाल के वर्ष होंगे, जो उसे खा जायेंगे, जो तुमने उनके लिए पहले से रखा है, परन्तु उसमें से थोड़ा, जिसे तुम सुरक्षित रखोगे।
Verse 49
फिर इसके पश्चात् एक ऐसा वर्ष आयेगा, जिसमें लोगों पर जल बरसाया जायेगा तथा उसीमें वे (रस) निचोड़ेंगे।
Verse 50
और राजा ने कहाः उसे मेरे पास लाओ और जब यूसुफ़ के पास भेजा हुआ आया, तो आपने उससे कहा कि अपने स्वामी के पास वापस जाओ[1] और उससे पूछो कि उन स्त्रियों की क्या दशा है, जिन्होंने अपने हाथ काट लिए थे? वास्तव में, मेरा पालनहार उन स्त्रियों के छल से भली-भाँति अवगत है।
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1. यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को बंदी बनाये जाने से अधिक उस का कारण जानने की चिन्ता थी। वह चाहते थे कि क़ैद से निकलने से पहले यह सिध्द होना चाहिये कि मैं निर्दोष था।
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1. यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को बंदी बनाये जाने से अधिक उस का कारण जानने की चिन्ता थी। वह चाहते थे कि क़ैद से निकलने से पहले यह सिध्द होना चाहिये कि मैं निर्दोष था।
Verse 51
(राजा) ने उन स्त्रियों से पूछाः तुम्हारा क्या अनुभव है, उस समय का, जब तुमने यूसुफ़ के मन को रिझाया था? सबने कहाः अल्लाह पवित्र है! उसपर हमने कोई बुराई का प्रभाव नहीं जाना। तब अज़ीज़ की पत्नी बोल उठीः अब सत्य उजागर हो गया, वास्तव में, मैंने ही उसके मन को रिझाया था और निःसंदेह वह सत्यवादियों में है[1]।
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1. यह क़ुर्आन पाक का बड़ा उपकार है कि उस ने रसूलों तथा नबियों पर लगाये गये बहुत से आरोपों का निवारण (खण्डन) कर दिया है। जिसे अह्ले किताब (यहूदी तथा ईसाई) ने यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के विषय में बहुत सी निर्मूल बातें घड़ ली थीं जिन को क़ुर्आन ने आ कर साफ़ कर दिया।
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1. यह क़ुर्आन पाक का बड़ा उपकार है कि उस ने रसूलों तथा नबियों पर लगाये गये बहुत से आरोपों का निवारण (खण्डन) कर दिया है। जिसे अह्ले किताब (यहूदी तथा ईसाई) ने यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के विषय में बहुत सी निर्मूल बातें घड़ ली थीं जिन को क़ुर्आन ने आ कर साफ़ कर दिया।
Verse 52
ये (यूसुफ़ ने) इसलिए किया, ताकि उसे (अज़ीज़ को) विश्वास हो जाये, कि मैंने गुप्त रूप से उसके साथ विश्वास घात नहीं किया और वस्तुतः, अल्लाह विश्वासघातियों से प्रेम नहीं करता।
Verse 53
और मैं अपने मन को निर्दोश नहीं कहता, मन तो बुराई पर उभारता है; परन्तु जिसपर मेरा पालनहार दया कर दे। मेरा पालनहार अति क्षमाशील तथा दयावान् है।
Verse 54
राजा ने कहाः उसे मेरे पास लाओ, उसे मैं अपने लिए विशेष कर लूँ और जब (राजा ने) उस (यूसुफ़) से बात की, तो कहाः वस्तुतः तू आज हमारे पास आदर्णीय भरोसा, करने योग्य है।
Verse 55
उस (यूसुफ़) ने कहाः मुझे देश का कोषाधिकारी बना दीजिये। वास्तव में मैं, रखवाला, बड़ा ज्ञानी हूँ।
Verse 56
और इस प्रकार, हमने यूसुफ को उस धरती (देश) में अधिकार दिया, वह उसमें जहाँ चाहे, रहे। हम अपनी दया जिसे चाहें, प्रदान करते हैं और सदाचारियों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करते।
Verse 57
और निश्चय परलोक का प्रतिफल उन लोगों के लिए उत्तम है, जो ईमान लाये और अल्लाह से डरते रहे।
Verse 58
और यूसुफ़ के भाई आये[1] तथा उसके पास उपस्थित हुए और उसने उन्हें पहचान लिया तथा वे उससे अपरिचित रह गये।
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1. अर्थात अकाल के युग में अन्न लेने के लिये फिलस्तीन से मिस्र आये थे।
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1. अर्थात अकाल के युग में अन्न लेने के लिये फिलस्तीन से मिस्र आये थे।
Verse 59
और जब उनका सामान तैयार कर दिया, तो कहाः अपने सौतीले भाई[1] को लाना। क्या तुम नहीं देखते कि मैं पूरा माप देता हूँ तथा उत्तम अतिथि-सत्कार करने वाला हूँ?
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1. जो यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का सगा भाई बिनयामीन था।
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1. जो यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का सगा भाई बिनयामीन था।
Verse 60
फिर यदि, तुम उसे मेरे पास नहीं लाये, तो मेरे यहाँ तुम्हारे लिए कोई माप नहीं और न तुम मेरे समीप होगे।
Verse 61
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ﯩ
वे बोलेः हम उसके पिता को इसकी प्रेरणा देंगे और हम अवश्य ऐसा करने वाले हैं।
Verse 62
और यूसुफ़ ने अपने सेवकों को आदेश दियाः उनका मूलधन[1] उनकी बोरियों में रख दो, संभवतः वे उसे पहचान लें, जब अपने परिजनों में जायें और संभवतः वापस आयें।
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1. अर्थात जिस धन से अन्न ख़रीदा है।
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1. अर्थात जिस धन से अन्न ख़रीदा है।
Verse 63
फिर जब अपने पिता के पास लौटकर गये, तो कहाः हमारे पिता! हम से भविष्य में (अन्न) रोक दिया गया है। अतः हमारे साथ हमारे भाई को भेजें कि हम सब अन्न (ग़ल्ला) लायें और (विशवास कीजीए कि) हम उसके रक्षक हैं।
Verse 64
उस (पिता) ने कहाः क्या मैं उसके लिए तुमपर वैसे ही विश्वास कर लूँ, जैसे इसके पहले उसके भाई (यूसुफ़) के बारे में विश्वास कर चुका हूँ? तो अल्लाह ही उत्तम रक्षक और वही सर्वाधिक दयावान् है।
Verse 65
और जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो पाया कि उनका मूलधन उन्हें फेर दिया गया है, उन्होंने कहाः हे हमारे पिता! हमें और क्या चाहिए? ये हमारा धन, हमें फेर दिया गया है? हम अपने घराने के लिए ग़ल्ले (अन्न) लायेंगे और एक ऊँट का बोझ अधिक लायेंगे[1], ये माप (अन्न) बहुत थोड़ा है।
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1. अर्थात अपने भाई बिनयामीन का जो उन की दूसरी माँ से था।
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1. अर्थात अपने भाई बिनयामीन का जो उन की दूसरी माँ से था।
Verse 66
उस (पिता) ने कहाः मैं कदापि उसे तुम्हारे साथ नहीं भेजूँगा, यहाँ तक कि अल्लाह के नाम पर मुझे दृढ़ वचन दो कि उसे मेरे पास अवश्य लाओगे, परन्तु ये कि तुमको घेर लिया[1] जाये और जब उन्होंने अपना दृढ़ वचन दिया, तो कहा, अल्लाह ही तुम्हारी बात (वचन) का निरीक्षक है।
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1. अर्थात विवश कर दिये जाओ।
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1. अर्थात विवश कर दिये जाओ।
Verse 67
और ( जब वे जाने लगे) तो उस (पिता) ने कहाः हे मेरे पुत्रो! तुम एक द्वार से मिस्र में प्रवेश न करना, बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना और मैं तुम्हें किसी चीज़ से नहीं बचा सकता, जो अल्लाह की ओर से हो और आदेश तो अल्लाह का चलता है, मैंने उसीपर भरोसा किया तथा उसीपर भरोसा करने वालों को भरोसा करना चाहिए।
Verse 68
और जब उन्होंने (मिस्र में) प्रवेश किया, जैसे उनके पिता ने आदेश दिया था, तो ऐसा नहीं हुआ कि वह उन्हें अल्लाह से कुछ बचा सके; परन्तु ये याक़ूब के दिल में एक विचार उत्पन्न हुआ, जिसे उसने पूरा कर लिया[1] और वास्तव में, वह उसका ज्ञानी था, जो ज्ञान हमने उसे दिया था। परन्तु अधिकांश लोग इस (की वास्तविक्ता) का ज्ञान नहीं रखते।
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1. अर्थात एक अपना उपाय था।
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1. अर्थात एक अपना उपाय था।
Verse 69
और जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे, तो उसने अपने भाई को अपनी शरण में ले लिया (और उससे) कहाः मैं तेरा भाई (यूसुफ़) हूँ। अतः उससे उदासीन न हो, जो (दुरव्यवहार) वे करते आ रहे हैं।
Verse 70
फिर जब उस (यूसुफ़) ने उनका सामान तैयार करा दिया, तो प्याला अपने भाई के सामान में रख दिया। फिर एक पुकारने वाले ने पुकाराः हे क़ाफ़िले वालो! तुम लोग तो चोर हो!
Verse 71
ﭡﭢﭣﭤﭥ
ﭦ
उन्होंने फिरकर कहाः तुम क्या खो रहे हो?
Verse 72
उन (कर्मचारियों) ने कहाः हमें राजा का प्याला नहीं मिल रहा है और जो उसे ले आये, उसके लिए एक ऊँट का बोझ है और मैं उसका प्रतिभु[1] हूँ।
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1. अर्थात एक ऊँट के बोझ बराबर पुरस्कार देने का भार मुझ पर है।
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1. अर्थात एक ऊँट के बोझ बराबर पुरस्कार देने का भार मुझ पर है।
Verse 73
उन्होंने कहाः तुम जानते हो कि हम इस देश में उपद्रव करने नहीं आये हैं और न हम चोर ही हैं।
Verse 74
ﮁﮂﮃﮄﮅﮆ
ﮇ
उन लोगों ने कहाः तो यदि तुम झूठे निकले, तो उसका दण्ड क्या होगा[1]?
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1. अर्थात चोर का।
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1. अर्थात चोर का।
Verse 75
उन्होंने कहाः उसका दण्ड! जिसके सामान में (प्याला) पाया जाये, वही उसका दण्ड होगा। इसी प्रकार, हम अत्याचारियों को दण्ड देते हैं[1]।
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1. अर्थात याक़ुब अलैहिस्सलाम के धर्म विधान में चोर को दास बना लेने का नियम था। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
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1. अर्थात याक़ुब अलैहिस्सलाम के धर्म विधान में चोर को दास बना लेने का नियम था। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
Verse 76
फिर उसने खोज का आरंभ उस (यूसुफ़) के भाई की बोरी से पहले, उनकी बोरियों से किया। फिर उसे उस (बिनयामीन) की बोरी से निकाल लिया। इस प्रकार, हमने यूसुफ़ के लिए उपाय किया। वह राजा के नियमानुसार अपने भाई को नहीं रख सकता था, परन्तु ये कि अल्लाह चाहता। हम जिसका चाहें मान सम्मान ऊँचा कर देते हैं और प्रत्येक ज्ञानी से ऊपर एक बड़ा ज्ञानी[1] है।
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1. अर्थात अल्लाह से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं हो सकता। इस लिये किसी को अपने ज्ञान पर गर्व नहीं होना चाहिये।
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1. अर्थात अल्लाह से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं हो सकता। इस लिये किसी को अपने ज्ञान पर गर्व नहीं होना चाहिये।
Verse 77
उन भाईयों ने कहाः यदि उसने चोरी की है, तो उसका एक भाई भी इससे पहले चोरी कर चुका है। तो यूसुफ़ ने ये बात अपने दिल में छुपा ली और उसे उनके लिए प्रकट नहीं किया। (यूसुफ़ ने) कहाः सबसे बुरा स्थान तुम्हारा है और अल्लाह उसे अधिक जानता है, जो तुम कह रहे हो।
Verse 78
उन्होंने कहाः हे अज़ीज़[1]! उसका पिता बहुत बूढ़ा है। अतः हम में से किसी एक को उसके स्थान पर ले लो। वास्तव में, हम आपको परोपकारी देख रहे हैं।
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1. यहाँ "अज़ीज़" का प्रयोग यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के लिये किया गया है। क्यों कि उन्हीं के पास सरकार के अधिक्तर अधिकार थे।
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1. यहाँ "अज़ीज़" का प्रयोग यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के लिये किया गया है। क्यों कि उन्हीं के पास सरकार के अधिक्तर अधिकार थे।
Verse 79
उस (यूसुफ) ने कहाः अल्लाह की शरण कि हम (किसी अन्य को) पकड़ लें, उसके सिवा जिसके पास अपना सामान पाया है। (यदि ऐसा न करें) तो हम वास्तव में अत्याचारी होंगे।
Verse 80
फिर जब उससे निराश हो गये, तो एकान्त में होकर प्रामर्श करने लगे। उनके बड़े ने कहाः क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पिता ने तुमसे अल्लाह को साक्षी बनाकर दृढ़ वचन लिया था? और इससे पहले जो अपराध तुमने यूसुफ के बारे में किया है? तो मैं इस धरती (मिस्र) से नहीं जाऊँगा, जब तक मुझे मेरे पिता अनुमति न दे दें अथवा अल्लाह मेरे लिए निर्णय न कर दे और वही सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है।
Verse 81
तुम अपने पिता की ओर लौट जाओ और कहो कि हमारे पिता! आपके पुत्र ने चोरी की है और हमने वही साक्ष्य दिया, जिसे हमने[1] जाना और हम ग़ैब के रखवाले नहीं[2] थे।
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1. अर्थात राजा का प्याला उस के सामान से निकलते देखा। 2. अर्थात आप को उस के वापिस लाने का वचन देते समय यह नहीं जानते थे कि वह चोरी करेगा। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
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1. अर्थात राजा का प्याला उस के सामान से निकलते देखा। 2. अर्थात आप को उस के वापिस लाने का वचन देते समय यह नहीं जानते थे कि वह चोरी करेगा। (तफ़्सीरे क़ुर्तुबी)
Verse 82
आप उस बस्ती वालों से पूछ लें, जिसमें हम थे और उस क़ाफ़िले से जिसमें हम आये हैं और वास्तव में हम सच्चे हैं।
Verse 83
उस (पिता) ने कहाः ऐसा नहीं है, बल्कि तुम्हारे दिलों ने एक बात बना ली है। इसलिए अब सहन करना ही उत्तम है, संभव है कि अल्लाह उनसब को मेरे पास वापस ले आए, वास्तव में, वही जानने वाला, तत्वदर्शी है।
Verse 84
और उनसे मुँह फेर लिया और कहाः हाय यूसुफ़! और उसकी दोनों आँखें शोक के कारण (रोते-रोते) सफेद हो गयीं और उसका दिल शोक से भर गया।
Verse 85
उन (पुत्रों) ने कहाः अल्लाह की शपथ! आप बराबर यूसुफ़ को याद करते रहेंगे, यहाँ तक कि (शोक से) घुल जायें या अपना विनाश कर लें।
Verse 86
उसने कहाः मैं अपनी आपदा तथा शोक की शिकायत अल्लाह के सिवा किसी से नहीं करता और अल्लाह की ओर से वह बात जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते।
Verse 87
हे मेरे पुत्र! जाओ और यूसुफ़ और उसके भाई का पता लगाओ और अल्लाह की दया से निराश न हो। वास्तव में, अल्लाह की दया से वही निराश होते हैं, जो काफ़िर हैं।
Verse 88
फिर जब (यूसुफ़ के भाई) उसके पास (मिस्र) गये, तो कहाः हे अज़ीज़! हमपर और गमारे घराने पर आपदा (अकाल) आ पड़ी है और हम थोड़ा धन (मूल्य) लाये हैं, अतः हमें (अन्न का) पूरा माप दें और हम पर दान करें। वास्तव में, अल्लाह दानशीलों को प्रतिफल प्रदान करता है।
Verse 89
उस (यूसुफ़) ने कहाः क्या तुम जानते हो कि तुमने यूसुफ़ तथा उसके भाई के साथ क्या कुछ किया है, जब तुम अज्ञान थे?
Verse 90
उन्होंने कहाः क्या आप यूसुफ़ हैं? यूसुफ़ ने कहाः मैं यूसुफ़ हूँ और ये मेरा भाई है। अल्लाह ने हमपर उपकार किया है। वास्तव में, जो (अल्लाह से) डरता तथा सहन करता है, तो अल्लाह सदाचारियों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करता।
Verse 91
उन्होंने कहाः अल्लाह की शपथ! उसने आपको हमपर श्रेष्ठता प्रदान की है। वास्तव में, हम दोषी थे।
Verse 92
यूसुफ़ ने कहाः आज तुमपर कोई दोष नहीं, अल्लाह तुम्हें क्षमा कर दे! वही सर्वाधिक दयावान् है।
Verse 93
मेरा ये कुर्ता ले जाओ और मेरे पिता के मुँह पर डाल दो, वह देखने लगेंगे। और अपने पूरे घराने को (मिस्र) ले आओ।
Verse 94
और जब क़ाफ़िले ने परस्थान किया, तो उनके पिता ने कहाः मुझे यूसुफ़ की सुगन्ध आ रही है, यदि तुम मुझे बहका हुआ बूढ़ा न समझो।
Verse 95
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उन लोगों[1] ने कहाः अल्लाह की शपथ! आप तो अपनी पुरानी सनक में पड़े हुए हैं।
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1. याक़ूब अलैहिस्सलाम के परिजनों ने जो फ़िलस्तीन में उन के पास थे।
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1. याक़ूब अलैहिस्सलाम के परिजनों ने जो फ़िलस्तीन में उन के पास थे।
Verse 96
फिर जब शुभ-सूचक आ गया, तो उसने वह कुर्ता उनके मुख पर डाल दिया और वे तुरन्त देखने लगे। याक़ूब ने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि वास्तव में अल्लाह की ओर से जो कुछ मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते?
Verse 97
सब (भाईयों) ने कहाः हे हमारे पिता! हमारे लिए हमारे पापों की क्षमा माँगिए, वास्तव में, हम ही दोषी थे।
Verse 98
याक़ूब ने कहाः मैं तुम्हारे लिए अपने पालनहार से क्षमा की प्रार्थना करूँगा, वास्तव में, वह अति क्षमी, दयावान् है।
Verse 99
फिर जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे, तो उसने अपनी माता-पिता को अपनी शरण में ले लिया और कहाः नगर (मिस्र) में प्रवेश कर जाओ, यदि अल्लाह ने चाहा, तो शान्ति से रहोगे।
तथा अपने माता-पिता को उठाकर सिंहासन पर बिठा लिया और सब उसके समक्ष सज्दे में गिर गये और यूसुफ़ ने कहाः हे मेरे पिता! यही मेरे स्वप्न का अर्थ है, जो मैंने पहले देखा था। मेरे पालनहार ने उसे सच कर दिया है तथा मेरे साथ उपकार किया, जब उसने मुझे कारावास से निकाला और आप लोगों को गाँव से मेरे पास (नगर में) ले आया, इसके पश्चात् कि शैतान ने मेरे तथा मेरे भाईयों के बीच विरोध डाल दिया। वास्तव में, मेरा पालनहार जिसके लिए चाहे, उसके लिए उत्तम उपाय करने वाहा है। निश्चय वही अति ज्ञानी, तत्वज्ञ है।
Verse 101
हे मेरे पालनहार! तूने मुझे राज प्रदान किया तथा मुझे स्वप्नों का अर्थ सिखाया। हे आकाशों तथा धरती के उत्पत्तिकार! तू लोक तथा परलोक में मेरा रक्षक है। तू मेरा अन्त इस्लाम पर कर और मुझे सदाचारियों में मिला दे।
Verse 102
(हे नबी!) ये (कथा) परोक्ष के समाचारों में से है, जिसकी वह़्यी हम आपकी ओर कर रहे हैं। और आप उन (भाईयों) के पास नहीं थे, जब वे आपस की सहमति से षड्यंत्र रचते रहे।
Verse 103
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और अधिकांश लोग आप कितनी ही लालसा करें, ईमान लाने वाले नहीं हैं।
Verse 104
और आप इस (धर्मप्रचार) पर उनसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगते। ये (क़ुर्आन) तो विश्ववासियों के लिए (केवल) एक शिक्षा है।
Verse 105
तथा आकाशों और धरती में बहुत सी निशानियाँ (लक्षण[1]) हैं, जिनपर से लोग गुज़रते रहते हैं और उनपर ध्यान नहीं देते[2]।
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1. अर्थात सहस्त्रों वर्ष की यह कथा इस विवरण के साथ वह़्यी द्वारा ही संभव है, जो आप के अल्लाह के नबी होने तथा क़ुर्आन के अल्लाह की वाणी होने का स्पष्ट प्रमाण है। 2. अर्थात विश्व की प्रत्येक चीज़ अल्लाह के अस्तित्व और उस की शक्ति और सदगुणों की परिचायक है, मात्र सोच विचार की आवश्यक्ता है।
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1. अर्थात सहस्त्रों वर्ष की यह कथा इस विवरण के साथ वह़्यी द्वारा ही संभव है, जो आप के अल्लाह के नबी होने तथा क़ुर्आन के अल्लाह की वाणी होने का स्पष्ट प्रमाण है। 2. अर्थात विश्व की प्रत्येक चीज़ अल्लाह के अस्तित्व और उस की शक्ति और सदगुणों की परिचायक है, मात्र सोच विचार की आवश्यक्ता है।
Verse 106
और उनमें से अधिक्तर अल्लाह को मानते तो हैं, परन्तु (साथ ही) मुश्रिक (मिश्रणवादी)[1] भी हैं।
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1. अर्थात अल्लाह के अस्तित्व और गुणों का विश्वास रखते हैं, फिर भी पूजा-अर्चना अन्य की करते हैं।
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1. अर्थात अल्लाह के अस्तित्व और गुणों का विश्वास रखते हैं, फिर भी पूजा-अर्चना अन्य की करते हैं।
Verse 107
तो क्या वे निर्भय हो गये हैं कि उनपर अल्लाह की यातना छा जाये अथवा उनपर प्रलय अकस्मात आ जाये और वे अचेत रह जायेँ?
Verse 108
(हे नबी!) आप कह दें: यही मेरी डगर है, मैं अल्लाह की ओर बुला रहा हूँ। मैं पूरे विश्वास और सत्य पर हूँ और जिसने मेरा अनुसरण किया (वे भी) तथा अल्लाह पवित्र है और मैं मुश्रिकों (मिश्रणवादियों) में से नहीं हूँ।
Verse 109
और हमने आपसे पहले मानव[1] पुरुषों ही को नबी बनाकर भेजा, जिनकी ओर प्रकाशना भेजते रहे, नगर वासियों में से, क्या वे धरती में चले फिरे नहीं, ताकि देखते कि उनका परिणाम क्या हुआ, जो इनसे पहले थे? और निश्चय आख़िरत (परलोक) का घर (स्वर्ग) उनके लिए उत्तम है, जो अल्लाह से डरे, तो क्या तुम समझते नहीं हो?
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1. क़ुर्आन की अनेक आयतों में आप को यह बात मिलेगी कि रसूलों का अस्वीकार उन की जातियों ने दो ही कारणों से कियाः एक तो यह कि उन के एकेश्वरवाद की शिक्षा उन के बाप दादा के परम्परा के विरुध्द थी, इस लिये सत्य को जानते हुये भी उन्हों ने उस का विरोध किया। दूसरा यह कि उन के दिल में यह बात नहीं उतरी कि कोई मानव पुरुष अल्लाह का रसूल कैसे हो सकता है? रसूल तो किसी फ़रिश्ते को होना चाहनये। फिर यदि रसूलों को किसी जाति ने स्वीकार भी किया तो कुछ युगों के पश्चात उन्हें ईश्वर अथवा ईश्वर का पुत्र बना कर एकेश्वरवाद को आघात पहुँचाया और शिर्क (मिश्रणवाद) का द्वार खोल दिया। इसी लिये क़ुर्आन ने इन दोनों कुविचारों का बार बार खण्डन किया है।
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1. क़ुर्आन की अनेक आयतों में आप को यह बात मिलेगी कि रसूलों का अस्वीकार उन की जातियों ने दो ही कारणों से कियाः एक तो यह कि उन के एकेश्वरवाद की शिक्षा उन के बाप दादा के परम्परा के विरुध्द थी, इस लिये सत्य को जानते हुये भी उन्हों ने उस का विरोध किया। दूसरा यह कि उन के दिल में यह बात नहीं उतरी कि कोई मानव पुरुष अल्लाह का रसूल कैसे हो सकता है? रसूल तो किसी फ़रिश्ते को होना चाहनये। फिर यदि रसूलों को किसी जाति ने स्वीकार भी किया तो कुछ युगों के पश्चात उन्हें ईश्वर अथवा ईश्वर का पुत्र बना कर एकेश्वरवाद को आघात पहुँचाया और शिर्क (मिश्रणवाद) का द्वार खोल दिया। इसी लिये क़ुर्आन ने इन दोनों कुविचारों का बार बार खण्डन किया है।
Verse 110
(इससे पहले भी रसूलों के साथ यही हुआ।) यहाँ तक कि जब रसूल निराश हो गये और लोगों को विश्वास हो गया कि उनसे झूठ बोला गया है, तो उनके लिए हमारी सहायता आ गई, फिर हम जिसे चाहते हैं, बचा लेते हैं और हमारी यातना अपराधियों से फेरी नहीं जाती।
Verse 111
इन कथाओं में, बुध्दिमानों के लिए बड़ी शिक्षा है, ये (क़ुर्आन) ऐसी बातों का संग्रह नहीं है, जिसे स्वयं बना लिया जाता हो, परन्तु इससे पहले की पुस्तकों की सिध्दि और प्रत्येक वस्तु का विवरण (ब्योरा) है तथा मार्गदर्शन और दया है, उन लोगों के लिए जो ईमान (विश्वास) रखते हों।
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