سورة المرسلات

الترجمة الهندية

الترجمة الهندية से الهندية में सूरह المرسلات का अनुवाद

الترجمة الهندية

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مجمع الملك فهد

Verse 1
शपथ है भेजी हुई निरन्तर धीमी वायुओं की!
Verse 2
फिर झक्कड़ वाली हवाओं की!
Verse 3
और बादलों को फैलाने वालियों की![1]
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1. अर्थात जो हवायें अल्लाह के आदेशानुसार बादलों को फैलाती हैं।
Verse 4
फिर अन्तर करने[1] वालों की!
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1. अर्थात सत्योसत्य तथा वैध और अवैध के बीच अन्तर करने के लिये आदेश लाते हैं।
Verse 5
फिर पहुँचाने वालों की वह़्यी (प्रकाशना[1]) को!
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1. अर्थात जो वह़्यी (प्रकाशना) ग्रहण कर के उसे रसूलों तक पहुँचाते हैं।
Verse 6
क्षमा के लिए अथवा चेतावनी[1] के लिए!
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1. अर्थात ईमान लाने वालों के लिये क्षमा का वचन तथा काफ़िरों के लिये यातना की सूचना लाते हैं।
Verse 7
निश्चय जिसका वचन तुम्हें दिया जा रहा है, वह अवश्य आनी है।
Verse 8
फिर जब तारे धुमिल हो जायेंगे।
Verse 9
तथा जब आकाश खोल दिया जायेगा।
Verse 10
तथा जब पर्वत चूर-चूर करके उड़ा दिये जायेंगे।
Verse 11
और जब रसूलों का एक समय निर्धारित किया जायेगा।[1]
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1. उन के तथा उन के समुदायों के बीच निर्णय करने के लिये। और रसूल गवाही देंगे।
Verse 12
किस दिन के लिए इसे निलम्बित रखा गया है?
Verse 13
निर्णय के दिन के लिए।
आप क्या जानें कि क्या है वह निर्णय का दिन?
Verse 15
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
Verse 16
क्या हमने विनाश नहीं कर दिया (अवज्ञा के कारण) अगली जातियों का?
Verse 17
फिर पीछे लगा[1] देंगे उनके पिछलों को।
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1. अर्थात उन्हीं के समान यातना ग्रस्त कर देंगे।
Verse 18
इसी प्रकार, हम करते हैं अपराधियों के साथ।
Verse 19
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
क्या हमने पैदा नहीं किया है तुम्हें तुच्छ जल (वीर्य) से?
Verse 21
फिर हमने रख दिया उसे एक सुदृढ़ स्थान (गर्भाशय) में।
Verse 22
एक निश्चित अवधि तक।[1]
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1. अर्थात गर्भ की अवधि तक।
Verse 23
तो हमने सामर्थ्य[1] रखा, अतः हम अच्छा सामर्थ्य रखने वाले हैं।
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1. अर्थात उसे पैदा करने पर।
Verse 24
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
Verse 25
क्या हमने नहीं बनाया धरती को समेटकर[1] रखने वाली?
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1. अर्थात जब तक लोग जीवित रहते हैं तो उस के ऊपर रहते तथा बसते हैं। और मरण के पश्चात उसी में चले जाते हैं।
Verse 26
जीवित तथा मुर्दों को।
तथा बना दिये हमने उसमें बहुत-से ऊँचे पर्वत और पिलाया हमने तुम्हें मीठा जल।
Verse 28
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
(कहा जायेगाः) चलो उस (नरक) की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे।
चलो ऐसी छाया[1] की ओर जो तीन शाखाओं वाली है।
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1. छाया से अभिप्राय, नरक के धुवें की छाया है। जो तीन दिशाओं में फैला होगा।
जो न छाया देगी और न ज्वाला से बचायेगी।
Verse 32
वह (अग्नि) फेंकती होगी चिँगारियाँ भवन के समान।
Verse 33
जैसे वह पीले ऊँट हों।
Verse 34
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
Verse 35
ये वो दिन है कि वे बोल[1] नहीं सकेंगे।
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1. अर्थात उन के विरुध्द ऐसे तर्क परस्तुत कर दिये जायेंगे कि वह अवाक रह जायेंगे।
Verse 36
और न उन्हें अनुमति दी जायेगी कि वे बहाने बना सकें।
Verse 37
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
ये निर्णय का दिन है, हमने एकत्र कर लिया है तुम्हें तथा पूर्व के लोगों को।
तो यदि तुम्हारे पास कोई चाल[1] हो, तो चल लो।
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1. अर्थात मेरी पकड़ से बचने की।
Verse 40
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
निःसंदेह, आज्ञाकारी उस दिन छाँव तथा जल स्रोतों में होंगे।
Verse 42
तथा मन चाहे फलों में।
खाओ तथा पिओ मनमानी उन कर्मों के बदले, जो तुम करते रहे।
Verse 44
हम इसी प्रकार प्रतिफल देते हैं।
Verse 45
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
(हे झुठलाने वालो!) तुम खा लो तथा आनन्द ले लो कुछ[1] दिन। वास्तव में, तुम अपराधी हो।
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1. अर्थात संसारिक जीवन में।
Verse 47
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
जब उनसे कहा जाता है कि (अल्लाह के समक्ष) झुको, तो झुकते नहीं।
Verse 49
विनाश है उस दिन झुठलाने वालों के लिए।
Verse 50
तो (अब) वे किस बात पर इस (क़ुर्आन) के पश्चात् ईमान[1] लायेंगे?
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1. अर्थात जब अल्लाह की अन्तिम पुस्तक पर ईमान नहीं लाते तो फिर कोई दूसरी पुस्तक नहीं हो सकती जिस पर वह ईमान लायें। इसलिये कि अब और कोई पुस्तक आसमान से आने वाली नहीं है।
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