الترجمة الهندية से الهندية में सूरह الكهف का अनुवाद
Verse 1
सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने अपने भक्त पर ये पुस्तक उतारी और उसमें कोई टेढ़ी बात नहीं रखी।
Verse 2
अति सीधी (पुस्तक), ताकि वह अपने पास की कड़ी यातना से सावधान कर दे और ईमान वालों को जो सदाचार करते हों, शुभ सूचना सुना दे कि उन्हीं के लिए अच्छा बदला है।
Verse 3
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जिसमें वे नित्य सदावासी होंगे।
Verse 4
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और उन्हें सावधान करे, जिन्होंने कहा कि अल्लाह ने अपने लिए कोई संतान बना ली है।
Verse 5
उन्हें इसका कुछ ज्ञान है और न उनके पूर्वजों को। बहुत बड़ी बात है, जो उनके मुखों से निकल रही है, वे सरासर झूठ ही बोल रहे हैं।
Verse 6
तो संभवतः आप इसके पीछे अपना प्राण खो देंगे, संताप के कारण, यदि वे इस ह़दीस (क़ुर्आन) पर ईमान न लायें।
Verse 7
वास्तव में, जो कुछ धरती के ऊपर है, उसे हमने उसके लिए शोभा बनाया है, ताकि उनकी परीक्षा लें कि उनमें कौन कर्म में सबसे अच्छा है?
Verse 8
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और निश्चय हम कर देने[1] वाले हैं, जो उस (धरती) के ऊपर है, उसे (बंजर) धूल।
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1. अर्थात प्रलय के दिन।
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1. अर्थात प्रलय के दिन।
Verse 9
(हे नबी!) क्या आपने समझा है कि गुफा तथा शिला लेख वाले[1], हमारे अद्भुत लक्षणों (निशानियों) में से थे[2]?
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1. कुछ भाष्यकारों ने लिखा है कि "रक़ीम" शब्द जिस का अर्थ, शिला लेख किया गया है, एक बस्ती का नाम है। 2. अर्थात आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति हमारी शक्ति का इस से भी बड़ा लक्षण है।
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1. कुछ भाष्यकारों ने लिखा है कि "रक़ीम" शब्द जिस का अर्थ, शिला लेख किया गया है, एक बस्ती का नाम है। 2. अर्थात आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति हमारी शक्ति का इस से भी बड़ा लक्षण है।
Verse 10
जब नवयुवकों ने गुफा की ओर शरण ली[1] और प्रार्थना कीः हे हमारे पालनहार! हमें अपनी विशेष दया प्रदान कर और हमारे लिए प्रबंध कर दे हमारे विषय के सुधार का।
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1. अर्थात नवयुवकों ने अपने ईमान की रक्षा के लिये गुफा में शरण ली। जिस गुफा के ऊपर आगे चल कर उन के नामों का स्मारक शिला लेख लगा दिया गया था। उल्लेखों से यह विद्वित होता है कि नवयुवक ईसा अलैहिस्सलाम के अनुयायियों में से थे। और रोम के मुश्रिक राजा की प्रजा थे। जो एकेश्वरवादियों का शत्रु था। और उन्हें मूर्ति पूजा के लिये बाध्य करता था। इस लिये वे अपने ईमान की रक्षा के लिये जार्डन की गुफा में चले गये जो नये शोध के अनुसार जार्डन की राजधानी से 8 की◦ मी◦ दूर (रजीब) में अवशेषज्ञों को मिली है। जिस गुफा के ऊपर सात स्तंभों की मस्जिद के खण्डर और गुफा के भीतर आठ समाधियाँ तथा उत्तरी दीवार पर पुरानी युनानी लिपी में एक शिला लेख मिला है और उस पर किसी जीव का चित्र भी है। जो कुत्ते का चित्र बताया जाता है और यह रजीब ही (रक़ीम) का बदला हुआ रूप है। (देखियेः भाष्य दावतुल क़ुर्आनः 2/983)
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1. अर्थात नवयुवकों ने अपने ईमान की रक्षा के लिये गुफा में शरण ली। जिस गुफा के ऊपर आगे चल कर उन के नामों का स्मारक शिला लेख लगा दिया गया था। उल्लेखों से यह विद्वित होता है कि नवयुवक ईसा अलैहिस्सलाम के अनुयायियों में से थे। और रोम के मुश्रिक राजा की प्रजा थे। जो एकेश्वरवादियों का शत्रु था। और उन्हें मूर्ति पूजा के लिये बाध्य करता था। इस लिये वे अपने ईमान की रक्षा के लिये जार्डन की गुफा में चले गये जो नये शोध के अनुसार जार्डन की राजधानी से 8 की◦ मी◦ दूर (रजीब) में अवशेषज्ञों को मिली है। जिस गुफा के ऊपर सात स्तंभों की मस्जिद के खण्डर और गुफा के भीतर आठ समाधियाँ तथा उत्तरी दीवार पर पुरानी युनानी लिपी में एक शिला लेख मिला है और उस पर किसी जीव का चित्र भी है। जो कुत्ते का चित्र बताया जाता है और यह रजीब ही (रक़ीम) का बदला हुआ रूप है। (देखियेः भाष्य दावतुल क़ुर्आनः 2/983)
Verse 11
तो हमने उन्हें गुफा में सुला दिया कई वर्षों तक।
Verse 12
फिर हमने उन्हें जगा दिया, ताकि हम ये जान लें कि दो समुदायों में से किसने उनके ठहरे रहने की अवधि को अधिक याद रखा है?
Verse 13
हम आपको उनकी सत्य कथा सुना रहे हैं। वास्तव में, वे कुछ नवयुवक थे, जो अपने पालनहार पर ईमान लाये और हमने उन्हें मार्गदर्शन में अधिक कर दिया।
Verse 14
और हमने उनके दिलों को सुदृढ़ कर दिया, जब वे खड़े हुए, फिर कहाः हमारा पालनहार वही है, जो आकाशों तथा धरती का पालनहार है। हम उसके सिवा कदापि किसी पूज्य को नहीं पुकारेंगे। (यदि हमने ऐसा किया) तो (सत्य से) दूर की बात होगी।
Verse 15
ये हमारी जाति है, जिसने अल्लाह के सिवा बहुत-से पूज्य बना लिए। क्यों वे उनपर कोई खुला प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते? उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर मिथ्या बात बनाये?
Verse 16
और जब तुम उनसे विलग हो गये तथा अल्लाह के अतिरिक्त उनके पूज्यों से, तो अब अमुक गुफा की ओर शरण लो, अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी दया फैला देगा तथा तुम्हारे लिए तुम्हारे विषय में जीवन के साधनों का प्रबंध करेगा।
Verse 17
और तुम सूर्य को देखोगे कि जब निकलता है, तो उनकी गूफा से दायें झुक जाता है और जब डूबता है, तो उनसे बायें कतरा जाता है और वे उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। ये अल्लाह की निशानियों में से है और जिसे अल्लाह मार्ग दिखा दे, वही सुपथ पाने वाला है और जिसे कुपथ कर दे, तो तुम कदापि उसके लिए कोई सहायक मार्गदर्शक नहीं पाओगे।
Verse 18
और तुम[1] उन्हें समझोगे कि जाग रहे हैं, जबकि वे सोये हुए हैं और हम उन्हें दायें तथा बायें पार्शव पर फिराते रहते हैं और उनका कुत्ता गुफा के द्वार पर अपनी दोनों बाहें फैलाये पड़ा है। यदि तुम झाँककर देख लेते, तो पीठ फेरकर भाग जाते और उनसे भयपूर्ण हो जाते।
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1. इस में किसी को भी संबोधित माना जा सकता है, जो उन्हें उस दशा में देख सके।
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1. इस में किसी को भी संबोधित माना जा सकता है, जो उन्हें उस दशा में देख सके।
Verse 19
और इसी प्रकार, हमने उन्हें जगा दिया, ताकि वे आपस में प्रश्न करें। तो एक ने उनमें से कहाः तुम कितने (समय) रहे हो? सबने कहाः हम एक दिन रहे हैं अथवा एक दिन के कुछ (समय)। (फिर) सबने कहाः अल्लाह अधिक जानता है कि तुम कितने (समय) रहे हो, तुम अपने में से किसी को, अपना ये सिक्का देकर नगर में भेजो, फिर देखे कि किसके पास अधिक स्वच्छ (पवित्र) भोजन है और उसमें से कुछ जीविका (भोजन) लाये और चाहिए कि सावधानी बरते। ऐसा न हो कि तुम्हारा किसी को अनुभव हो जाये।
Verse 20
क्योंकि यदि वे तुम्हें जान जायेंगे तो तुम्हें पथराव करके मार डालेंगे या तुम्हें अपने धर्म में लौटा लेंगे और तब तुम कदापि सफल नहीं हो सकोगे।
Verse 21
इसी प्रकार, हमने उनसे अवगत करा दिया, ताकि उन (नागरिकों) को ज्ञान हो जाये कि अल्लाह का वचन सत्य है और ये कि प्रलय (होने) में कोई संदेह[1] नहीं। जब वे[2] आपस में विवाद करने लगे, तो कुछ ने कहाः उनपर कोई निर्माण करा दो, अल्लाह ही उनकी दशा को भली-भाँति जानता है। परन्तु उन्होंने कहा जो अपना प्रभुत्व रखते थे, हम अवश्य उन (की गुफा के स्थान) पर एक मस्जिद बनायेंगे।
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1. जिस के आने पर सब को उन के कर्मों का फल दिया जायेगा। 2. अर्थात जब पुराने सिक्के और भाषा के कारण उन का भेद खुल गया और वहाँ के लोगों को उन की कथा का ज्ञान हो गया तो फिर वे अपनी गुफा ही में मर गये। और उन के विषय में यह विवाद उत्पन्न हो गया। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि इस्लाम में समाधियों पर मस्जिद बनाना, और उस में नमाज़ पढ़ना तथा उस पर कोई निर्माण करना अवैध है। जिस का पूरा विवरण ह़दीसों में मिलेगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 435, मुस्लिमः531-32)
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1. जिस के आने पर सब को उन के कर्मों का फल दिया जायेगा। 2. अर्थात जब पुराने सिक्के और भाषा के कारण उन का भेद खुल गया और वहाँ के लोगों को उन की कथा का ज्ञान हो गया तो फिर वे अपनी गुफा ही में मर गये। और उन के विषय में यह विवाद उत्पन्न हो गया। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि इस्लाम में समाधियों पर मस्जिद बनाना, और उस में नमाज़ पढ़ना तथा उस पर कोई निर्माण करना अवैध है। जिस का पूरा विवरण ह़दीसों में मिलेगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 435, मुस्लिमः531-32)
Verse 22
कुछ[1] कहेंगे कि वे तीन हैं और चौथा उनका कुत्ता है और कुछ कहेंगे कि पाँच हैं और छठा उनका कुत्ता है। ये अंधेरे में तीर चलाते हैं और कहेंगे कि सात हैं और आठवाँ उनका कुत्ता है। (हे नबी!) आप कह दें कि मेरा पालनहार ही उनकी संख्या भली-भाँति जानता है, जिसे कुछ लोगों के सिवा कोई नहीं जानता[2]। अतः आप उनके संबन्ध में कोई विवाद न करें, सिवाय सरसरी बात के और न उनके विषय में किसी से कुछ पूछें[3]।
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1. इन से मुराद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग के अह्ले किताब हैं। 2. भावार्थ यह है कि उन की संख्या का सह़ीह़ ज्ञान तो अल्लाह ही को है किन्तु वास्तव में ध्यान देने की बात यह है कि इस से हमें क्या शिक्षा मिल रही है। 3. क्योंकि आप को उन के बारे में अल्लाह के बताने के कारण उन लोगों से अधिक ज्ञान है। और उन के पास कोई ज्ञान नहीं। इस लिये किसी से पूछने की आवश्यक्ता भी नहीं है।
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1. इन से मुराद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग के अह्ले किताब हैं। 2. भावार्थ यह है कि उन की संख्या का सह़ीह़ ज्ञान तो अल्लाह ही को है किन्तु वास्तव में ध्यान देने की बात यह है कि इस से हमें क्या शिक्षा मिल रही है। 3. क्योंकि आप को उन के बारे में अल्लाह के बताने के कारण उन लोगों से अधिक ज्ञान है। और उन के पास कोई ज्ञान नहीं। इस लिये किसी से पूछने की आवश्यक्ता भी नहीं है।
Verse 23
और कदापि किसी विषय में न कहें कि मैं इसे कल करने वाला हूँ।
Verse 24
परन्तु ये कि अल्लाह[1] चाहे तथा अपने पालनहार को याद करें, जब भूल जायेँ और कहें: संभव है, मेरा पालनहार मुझे इससे समीप सुधार का मार्ग दर्शा दे।
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1. अर्थात भविष्य में कुछ करने का निश्चय करें, तो "इन् शा अल्लाह" कहें। अर्थता यदि अल्लाह ने चाहा तो।
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1. अर्थात भविष्य में कुछ करने का निश्चय करें, तो "इन् शा अल्लाह" कहें। अर्थता यदि अल्लाह ने चाहा तो।
Verse 25
और वे गुफा में तीन सौ वर्ष रहे और नौ वर्ष अधिक[1] और।
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1. अर्थात सूर्य के वर्ष से तीन सौ वर्ष, और चाँद के वर्ष से नौ वर्ष अधिक गुफा में सोये रहे।
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1. अर्थात सूर्य के वर्ष से तीन सौ वर्ष, और चाँद के वर्ष से नौ वर्ष अधिक गुफा में सोये रहे।
Verse 26
आप कह दें कि अल्लाह उनके रहने की अवधि से सर्वाधिक अवगत है। आकाशों तथा धरती का परोक्ष वही जानता है। क्या ही ख़ूब है वह देखने वाला और सुनने वाला। नहीं है उनका उसके सिवा कोई सहायक और न वह अपने शासन में किसी को साझी बनाता है।
Verse 27
और आप उसे सुना दें, जो आपकी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की गयी है, आपके पालनहार की पुस्तक में से, उसकी बातों को कोई बदलने वाला नहीं है और आप कदापि नहीं पायेंगे उसके सिवा कोई शरण स्थान।
Verse 28
और आप उनके साथ रहें, जो अपने पालनहार की प्रातः-संध्या बंदगी करते हैं। वे उसकी प्रसन्नता चाहते हैं और आपकी आँखें सांसारिक जीवन की शोभा के लिए[1] उनसे न फिरने पायें और उसकी बात न मानें, जिसके दिल को हमने अपनी याद से निश्चेत कर दिया और उसने मनमानी की और जिसका काम ही उल्लंघन (अवज्ञा करना) है।
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1. भाष्यकारों ने लिखा है कि यह आयत उस समय उतरी जब मुश्रिक क़ुरैश के कुछ प्रमुखों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह माँग की कि आप अपने निर्धन अनुयायियों के साथ न रहें। तो हम आप के पास आ कर आप की बातें सुनेंगे। इस लिये अल्लाह ने आप को आदेश दिया कि इन का आदर किया जाये, ऐसा नहीं होना चाहिये कि इन की उपेक्षा कर के उन धनवानों की बात मानी जाये जो अल्लाह की याद से निश्चेत हैं।
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1. भाष्यकारों ने लिखा है कि यह आयत उस समय उतरी जब मुश्रिक क़ुरैश के कुछ प्रमुखों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह माँग की कि आप अपने निर्धन अनुयायियों के साथ न रहें। तो हम आप के पास आ कर आप की बातें सुनेंगे। इस लिये अल्लाह ने आप को आदेश दिया कि इन का आदर किया जाये, ऐसा नहीं होना चाहिये कि इन की उपेक्षा कर के उन धनवानों की बात मानी जाये जो अल्लाह की याद से निश्चेत हैं।
Verse 29
आप कह दें कि ये सत्य है, तुम्हारे पालनहार की ओर से, तो जो चाहे, ईमान लाये और जो चाहे कुफ़्र करे, निश्चय हमने अत्याचारियों के लिए ऐसी अग्नि तैयार कर रखी है, जिसकी प्राचीर[1] ने उन्हें घेर लिया है और यदि वे जल के लिए गुहार करेंगे, तो उन्हें तेल की तलछट के समान जल दिया जायेगा, जो मुखों को भून देगा, वह क्या ही बुरा पेय है और वह क्या ही बुरा विश्राम स्थान है!
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1. क़र्आन में "सुरादिक़" शब्द प्रयुक्त हुआ है। जिस का अर्थ प्राचीर, अर्थात वह दीवार है जो नरक के चारों ओर बनाई गई है।
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1. क़र्आन में "सुरादिक़" शब्द प्रयुक्त हुआ है। जिस का अर्थ प्राचीर, अर्थात वह दीवार है जो नरक के चारों ओर बनाई गई है।
Verse 30
निश्चय जो ईमान लाये तथा सदाचार किये, तो हम उनका प्रतिफल व्यर्थ नहीं करेंगे, जो सदाचारी हैं।
Verse 31
यही हैं, जिनके लिए स्थायी स्वर्ग हैं, जिनमें नहरें प्रवाहित हैं, उसमें उन्हें सोने के कंगन पहनाये जायेंगे।[1] तथा (वे) महीन और गाढ़े रेशम के हरे वस्त्र पहनेंगे, उसमें सिंहासनों के ऊपर आसीन होंगे। ये क्या ही अच्छा प्रतिफल और क्या ही अच्छा विश्राम स्थान है।
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1. यह स्वर्ग वासियों का स्वर्ण कंगन है। किन्तु संसार में इस्लाम की शिक्षानुसार पुरुषों के लिये सोने का कंगन पहनना ह़राम है।
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1. यह स्वर्ग वासियों का स्वर्ण कंगन है। किन्तु संसार में इस्लाम की शिक्षानुसार पुरुषों के लिये सोने का कंगन पहनना ह़राम है।
Verse 32
और (हे नबी!) आप उन्हें एक उदाहरण दो वयक्तियों का दें; हमने जिनमें से एक को दो बाग़ दिये अंगूरों के और घेर दिया दोनों को खजूरों से और दोनों के बीच खेती बना दी।
Verse 33
दोनों बाग़ों ने अपने पूरे फल दिये और उसमें कुछ कमी नहीं की और हमने जारी कर दी दोनों के बीच एक नहर।
Verse 34
और उसे लाभ प्राप्त हुआ, तो एक दिन उसने अपने साथी से कहा जबकि वह उससे बात कर रहा थाः मैं तुझसे अधिक धनी हूँ तथा स्वजनों में भी अधिक[1] हूँ।
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1. अर्थात यदि किसी का धन संतान तथा बाग़ इत्यादि अच्छा लगे तो ((मा शा अल्लाह ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह)) कहना चाहिये। ऐसा कहने से नज़र नहीं लगती। यह इस्लाम धर्म की शिक्षा है, जिस से आपस में द्वेष नहीं होता।
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1. अर्थात यदि किसी का धन संतान तथा बाग़ इत्यादि अच्छा लगे तो ((मा शा अल्लाह ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह)) कहना चाहिये। ऐसा कहने से नज़र नहीं लगती। यह इस्लाम धर्म की शिक्षा है, जिस से आपस में द्वेष नहीं होता।
Verse 35
और उसने अपने बाग़ में प्रवेश किया, अपने ऊपर अत्याचार करते हुए, उसने कहाः मैं नहीं समझता कि इसका विनाश हो जायेगा कभी।
Verse 36
और न ये समझता हूँ कि प्रलय होगी और यदि मुझे अपने पालनहार की ओर पुनः ले जाया गया, तो मैं अवश्य ही इससे उत्तम स्थान पाऊँगा।
Verse 37
उससे, उसके साथी ने कहा और वह उससे बात कर रहा थाः क्या तूने उसके साथ कुफ़्र कर दिया, जिसने तुझे मिट्टी से उत्पन्न किया, फिर वीर्य से, फिर तुझे बना दिया एक पूरा पुरुष?
Verse 38
रहा मैं, तो वही अल्लाह मेरा पालनहार है और मैं साझी नहीं बनाऊँगा अपने पालनहार का किसी को।
Verse 39
और क्यों नहीं जब तुमने अपने बाग़ में प्रवेश किया, तो कहा कि "जो अल्लाह चाहे, अल्लाह की शक्ति के बिना कुछ नहीं हो सकता।" यदि तू मुझे देखता है कि मैं तुझसे कम हूँ धन तथा संतान में[1],
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1. अर्थात मेरे सेवक और सहायक भी तुझ से अधिक हैं।
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1. अर्थात मेरे सेवक और सहायक भी तुझ से अधिक हैं।
Verse 40
तो आशा है कि मेरा पालनहार मुझे प्रदान कर दे, तेरे बाग़ से अच्छा और इस बाग़ पर आकाश से कोई आपदा भेज दे और वह चिकनी भूमि बन जाये।
Verse 41
अथवा उसका जल भीतर उतर जाये, फिर तू उसे पा न सके।
Verse 42
(अन्ततः) उसके फलों को घेर[1] लिया गया, फिर वह अपने दोनों हाथ मलता रह गया उसपर, जो उसमें खर्च किया था और वह अपने छप्परों सहित गिरा हुआ था और कहने लगाः क्या ही अच्छा होता कि मैं किसी को अपने पालनहार का साझी न बनाता।
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1. अर्थात आपदा ने घेर लिया।
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1. अर्थात आपदा ने घेर लिया।
Verse 43
और नहीं रह गया उसके लिए कोई जत्था, जो उसकी सहायता करता और न स्वयं अपनी सहायता कर सका।
Verse 44
यहीं सिध्द हो गया कि सब अधिकार सत्य अल्लाह को है, वही अच्छा है प्रतिफल प्रदान करने में तथा अच्छा है परिणाम लाने में।
Verse 45
और (हे नबी!) आप उन्हें सांसारिक जीवन का उदाहरण दें, उस जल से, जिसे हमने आकाश से बरसाया। फिर उसके कारण मिल गई धरती की उपज, फिर चूर हो गई, जिसे वायु उड़ाये फिरती[1] है और अल्लाह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखने वाला है।
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1. अर्थात संसारिक जीवन और उस का सुख-सुविधा सब साम्यिक है।
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1. अर्थात संसारिक जीवन और उस का सुख-सुविधा सब साम्यिक है।
Verse 46
धन और पुत्र सांसारिक जीवन की शोभा हैं और शेष रह जाने वाले सत्कर्म ही अच्छे हैं, आपके पालनहार के यहाँ प्रतिफल में तथा अच्छे हैं, आशा रखने के लिए।
Verse 47
तथा जिस दिन हम पर्वतों को चलायेंगे तथा तुम धरती को खुला चटेल[1] देखोगे और हम उन्हें एकत्र कर देंगे, फिर उनमें से किसी को नहीं छोड़ेंगे।
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1. अर्थात न उस में कोई चिन्ह होगा न छुपने का स्थान।
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1. अर्थात न उस में कोई चिन्ह होगा न छुपने का स्थान।
Verse 48
और सभी आपके पालनहार के समक्ष पंक्तियों में प्रस्तुत किये जायेंगे, तुम हमारे पास आ गये, जैसे हमने तुम्हारी उत्पत्ति प्रथम बार की थी, बल्कि तुमने समझा था कि हम तुम्हारे लिए कोई वचन का समय निर्धारित ही नहीं करेंगे।
Verse 49
और कर्म लेख[1] (सामने) रख दिये जायेंगे, तो आप अपराधियों को देखेंगे कि उससे डर रहे हैं, जो कुछ उसमें (अंकित) है तथा कहेंगे कि हाय हमारा विनाश! ये कैसी पुस्तक है, जिसने किसी छोटे और बड़े कर्म को नहीं छोड़ा है, परन्तु उसे अंकित कर रखा है? और जो कर्म उन्होंने किये हैं, उन्हें वह सामने पायेंगे और आपका पालनहार किसी पर अत्याचार नहीं करेगा।
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1. अर्थात प्रत्येक का कर्म पत्र जो उस ने संसारिक जीवन में किया है।
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1. अर्थात प्रत्येक का कर्म पत्र जो उस ने संसारिक जीवन में किया है।
Verse 50
तथा (याद करो) जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से कहाः आदम को सज्दा करो, तो सबने सज्दा किया, इब्लीस के सिवा। वह जिन्नों में से था, अतः उसने उल्लंघन किया अपने पालनहार की आज्ञा का, तो क्या तुम उसे और उसकी संतति को सहायक मित्र बनाते हो, मुझे छोड़कर जबकि वे तुम्हारे शत्रु हैं? अत्याचारियों के लिए बुरा बदला है।
Verse 51
मैंने उन्हें उपस्थित नहीं किया, आकाशों तथा धरती की उतपत्ति के समय और न स्वयं उनकी उत्पत्ति के समय और न मैं कुपथों को सहायक[1] बनाने वाला हूँ।
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1. भावार्थ यह है कि विश्व की उत्पत्ति के समय इन का अस्तित्व न था। यह तो बाद में उत्पन्न किये गये हैं। उन की उत्पत्ति में भी उन से कोई सहायता नहीं ली गई, तो फिर यह अल्लाह के बराबर कैसे हो गये।
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1. भावार्थ यह है कि विश्व की उत्पत्ति के समय इन का अस्तित्व न था। यह तो बाद में उत्पन्न किये गये हैं। उन की उत्पत्ति में भी उन से कोई सहायता नहीं ली गई, तो फिर यह अल्लाह के बराबर कैसे हो गये।
Verse 52
जिस दिन वह (अल्लाह) कहेगा कि मेरे साझियों को पुकारो, जिन्हें (तुम मेरे साझी) समझ रहे थे। वह उन्हें पुकारेंगे, तो वे उनका कोई उत्तर नहीं देंगे और हम बना देंगे उनके बीच एक विनाशकारी खाई।
Verse 53
और अपराधी नरक को देखेंगे, तो उन्हें विश्वास जो जायेगा कि वे उसमें गिरने वाले हैं और उससे फिरने का कोई स्थान नहीं पायेंगे।
Verse 54
और हमने इस क़ुर्आन में प्रत्येक उदाहरण से लोगों को समझाया है। और मनुष्य बड़ा ही झगड़ालू है।
Verse 55
और नहीं रोका लोगों को कि ईमान लायें, जब उनके पास मार्गदर्शन आ गया और अपने पालनहार से क्षमा याचना करें, किन्तु इसीने कि पिछली जातियों की दशा उनकी भी हो जाये अथवा उनके समक्ष यातना आ जाये।
Verse 56
तथा हम रसूलों को नहीं भेजते, परन्तु शुभ सूचना देने वाले और सावधान करने वाले बनाकर और जो काफ़िर हैं, असत्य (अनृत) के सहारे विवाद करते हैं, ताकि उसके द्वारा वे सत्य को नीचा[1] दिखायें और उन्होंने बनाया हमारी आयतों को तथा जिस बात की उन्हें चेतावनी दी गई, परिहास।
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1. अर्थात सत्य को दबा दें।
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1. अर्थात सत्य को दबा दें।
Verse 57
और उससे बड़ा अत्याचारी कौन है, जिसे उसके पालनहार की आयतें सुनाई जायेँ, फिर (भी) उनसे मुँह फेर ले और अपने पहले किये हुए करतूत भूल जाये? वास्तव में, हमने उनके दिलों पर ऐसे आवरण (पर्दे) बना दिये हैं कि उसे[1] समझ न पायें और उनके कानों में बोझ। और यदि आप उन्हें सीधी राह की ओर बुलायें, तब (भी) कभी सीधी राह नहीं पा सकेंग।
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1. अर्थात क़ुर्आन को।
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1. अर्थात क़ुर्आन को।
Verse 58
और आपका पालनहार अति क्षमी दयावान् है। यदि वह उन्हें उनके करतूतों पर पकड़ता, तो तुरन्त यातना दे देता। बल्कि उनके लिए एक निश्चित समय का वचन है और वे उसके सिवा कोई बचाव का स्थान नहीं पायेंगे।
Verse 59
तथा ये बस्तियाँ हैं। हमने उन (के निवासियों) का विनाश कर दिया, जब उन्होंने अत्याचार किया और हमने उनके विनाश के लिए एक निर्धारित समय बना दिया था।
Verse 60
तथा (याद करो) जब मूसा ने अपने सेवक से कहाः मैं बराबर चलता रहूँगा, यहाँ तक कि दोनों सागरों के संगम पर पहुँच जाऊँ अथवा वर्षों चलता[1] रहूँ।
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1. मूसा अलैहिस्सलाम की यात्रा का कारण यह बना था कि वह एक बार भाषण दे रहे थे। तो किसी ने पूछा कि इस संसार में सर्वाधिक ज्ञानी कौन है? मूसा ने कहाः मैं हूँ। यह बात अल्लाह को अप्रिय लगी। और मूसा से फ़रमाया कि दो सागरों के संगम के पास मेरा एक भक्त है जो तुम से अधिक ज्ञानी है। मूसा ने कहाः मैं उस से कैसे मिल सकता हूँ? अल्लाह ने फ़रमायाः एक मछली रख लो, और जिस स्थान पर वह खो जाये, तो वहीं वह मिलेगा। और वह अपने सेवक यूशअ बिन नून को ले कर निकल पड़े। (संक्षिप्त अनुवाद सह़ीह़ बुख़ारीः 4725)
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1. मूसा अलैहिस्सलाम की यात्रा का कारण यह बना था कि वह एक बार भाषण दे रहे थे। तो किसी ने पूछा कि इस संसार में सर्वाधिक ज्ञानी कौन है? मूसा ने कहाः मैं हूँ। यह बात अल्लाह को अप्रिय लगी। और मूसा से फ़रमाया कि दो सागरों के संगम के पास मेरा एक भक्त है जो तुम से अधिक ज्ञानी है। मूसा ने कहाः मैं उस से कैसे मिल सकता हूँ? अल्लाह ने फ़रमायाः एक मछली रख लो, और जिस स्थान पर वह खो जाये, तो वहीं वह मिलेगा। और वह अपने सेवक यूशअ बिन नून को ले कर निकल पड़े। (संक्षिप्त अनुवाद सह़ीह़ बुख़ारीः 4725)
Verse 61
तो जब दोनों उनके संगम पर पहुँचे, तो दोनों अपनी मछली भूल गये और उसने सागर में अपनी राह बना ली, सुरंग के समान।
Verse 62
फिर, जब दोनों आगे चले गये, तो उस (मूसा) ने अपने सेवक से कहा कि हमारा दिन का भोजन लाओ। हम अपनी इस यात्रा से थक गये हैं।
Verse 63
उसने कहाः क्या आपने देखा? जब हमने उस शिला खण्ड के पास शरण ली थी, तो मैं मछली भूल गया और मुझे उसे शैतान ही ने भुला दिया कि मैं उसकी चर्चा करूँ और उसने अपनी राह सागर में अनोखे तरीक़े से बना ली।
Verse 64
मूसा ने कहाः वही है, जो हम चाहते थे। फिर दोनों अपने पद्चिन्हों को देखते हुए वापिस हुए।
Verse 65
और दोनों ने पाया हमारे भक्तों में से एक भक्त[1] को, जिसे हमने अपनी विशेष दया प्रदान की थी और उसे अपने पास से कुछ विशेष ज्ञान दिया था।
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1. इस से अभिप्रेत आदरणीय ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हैं।
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1. इस से अभिप्रेत आदरणीय ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हैं।
Verse 66
मूसा ने उससे कहाः क्या मैं आपका अनुसरण करूँ, ताकि मुझे भी उस भलाई में से कुछ सिखा दें, जो आपको सिखाई गई है?
Verse 67
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उसने कहाः तुम मेरे साथ धैर्य नहीं कर सकोगे।
Verse 68
और कैसे धैर्य करोगे उस बात पर, जिसका तुम्हें पूरा ज्ञान नहीं?
Verse 69
उसने कहाः यदि अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सहनशील पायेंगे और मैं आपकी किसी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करूँगा।
Verse 70
उसने कहाः यदि तुम्हें मेरा अनुसरण करना है, तो मुझसे किसी चीज़ के बारे में प्रश्न न करना, जब तक मैं स्वयं तुमसे उसकी चर्चा न करूँ।
Verse 71
फिर दोनों चले, यहाँ तक कि जब दोनों नौका में सवार हुए, तो उस (ख़िज़्र) ने उसमें छेद कर दिया। मूसा ने कहाः क्या आपने इसमें छेदकर दिया, ताकि उसके सवारों को डुबो दें, आपने अनुचित काम कर दिया।
Verse 72
उसने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम मेरे साथ सहन नहीं कर सकोगे?
Verse 73
कहाः मुझे आप मेरी भूल पर न पकड़े और मेरी बात के कारण मुझे असुविधा में न डालें।
Verse 74
फिर दोनों चले, यहाँ तक कि एक बालक से मिले, तो उस (ख़िज़्र) ने उसे वध कर दिया। मूसा ने कहाः क्या आपने एक निर्दोष प्राण ले लिया, वह भी किसी प्राण के बदले[1] नहीं? आपने बहुत ही बुरा काम किया।
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1. अर्थात उस ने किसी प्राणी को नहीं मारा कि उस के बदले में उसे मारा जाये।
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1. अर्थात उस ने किसी प्राणी को नहीं मारा कि उस के बदले में उसे मारा जाये।
Verse 75
उसने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा कि वास्तव में, तुम मेरे साथ धैर्य नहीं कर सकोगे?
Verse 76
मूसा ने कहाः यदि मैं आपसे प्रश्न करूँ, किसी विषय में इसके पश्चात्, तो मुझे अपने साथ न रखें। निश्चय आप मेरी ओर से याचना को पहुँच[1] चुके।
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1. अर्थात अब कोई प्रश्न करूँ तो आप के पास मुझे अपने साथ न रखने का उचित कारण होगा।
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1. अर्थात अब कोई प्रश्न करूँ तो आप के पास मुझे अपने साथ न रखने का उचित कारण होगा।
Verse 77
फिर दोनो चले, यहाँ तक कि जब एक गाँव के वासियों के पास आये, तो उनसे भोजन माँगा। उन्होंने उनका अतिथि सत्कार करने से इन्कार कर दिया। वहाँ उन्होंने एक दीवार पायी, जो गिरा चाहती थी। उसने उसे सीधा कर दिया। कहाः यदि आप चाहते, तो इसपर पारिश्रमिक ले लेते।
Verse 78
उसने कहाः ये मेरे तथा तुम्हारे बीच वियोग है। मैं तुम्हें उसकी वास्तविक्ता बताऊँगा, जिसे तुम सहन नहीं कर सके।
Verse 79
रही नाव, तो वह कुछ निर्धनों की थी, जो सागर में काम करते थे। तो मैंने चाहा कि उसे छिद्रित[1] कर दूँ और उनके आगे एक राजा था, जो प्रत्येक (अच्छी) नाव का अपहरण कर लेता था।
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1. अर्थात उस में छेद कर दूँ।
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1. अर्थात उस में छेद कर दूँ।
Verse 80
और रहा बालक, तो उसके माता-पिता ईमान वाले थे, अतः हम डरे कि उन्हें अपनी अवज्ञा और अधर्म से दुःख न पहुँचाये।
Verse 81
इसलिए हमने चाहा कि उन दोनों को उनका पालनहार, इसके बदले उससे अधिक पवित्र और अधिक प्रेमी प्रदान करे।
Verse 82
और रही दीवार, तो वह दो अनाथ बालकों की थी और उसके भीतर उनका कोष था और उनके माता-पिता पुनीत थे, तो तेरे पालनहार ने चाहा कि वे दोनों अपनी युवा अवस्था को पहुँचें और अपना कोष निकालें, तेरे पालनहार की दया से और मैंने ये अपने विचार तथा अधिकार से नहीं किया[1]। ये उसकी वास्तविक्ता है, जिसे तुम सहन नहीं कर सके।
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1. यह सभी कार्य विशेष रूप से निर्दोष बालक का वध धार्मिक नियम से उचित न था। इस लिये मूसा (अलैहिस्सलाम) इस को सहन न कर सके। किन्तु ((ख़िज़्र)) को विशेष ज्ञान दिया गया था जो मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास नहीं था। इस प्रकार अल्लाह ने जता दिया कि हर ज्ञानी के ऊपर भी कोई ज्ञानी है।
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1. यह सभी कार्य विशेष रूप से निर्दोष बालक का वध धार्मिक नियम से उचित न था। इस लिये मूसा (अलैहिस्सलाम) इस को सहन न कर सके। किन्तु ((ख़िज़्र)) को विशेष ज्ञान दिया गया था जो मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास नहीं था। इस प्रकार अल्लाह ने जता दिया कि हर ज्ञानी के ऊपर भी कोई ज्ञानी है।
Verse 83
और (हे नबी!) वे आपसे ज़ुलक़रनैन[1] के विषय में प्रश्न करते हैं। आप कह दें कि मैं उनकी कुछ दशा तुम्हें पढ़कर सुना देता हूँ।
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1. यह तीसरे प्रश्न का उत्तर है जिसे यहूदियों ने मक्का के मिश्रणवादियों द्वारा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कराया था। ज़ुलक़रनैन के आगामी आयतों में जो गुण-कर्म बताये गये हैं उन से विद्वित होता है कि वह एक सदाचारी विजेता राजा था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शोध के अनुसार यह वही राजा है जिसे यूनानी साईरस, हिब्रु भाषा में खोरिस तथा अरब में ख़ुसरु के नाम से पुकारा जाता है। जिस का शासन काल 559 ई पूर्व है। वह लिखते हैं कि 1838 ई में साईरस की एक पत्थर की मूर्ति अस्तख़र के खण्डरों में मिली है। जिस में बाज़ पक्षी के भाँति उस के दो पंख तथा उस के सिर पर भेड़ के समान दो सींग हैं। इस में मीडिया और फ़ारस के दो राज्यों की उपमा दो सींगों से दी गयी है। (देखियेः तर्जमानुल क़ुर्आन, भागः 3, पृष्ठः 436-438)
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1. यह तीसरे प्रश्न का उत्तर है जिसे यहूदियों ने मक्का के मिश्रणवादियों द्वारा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कराया था। ज़ुलक़रनैन के आगामी आयतों में जो गुण-कर्म बताये गये हैं उन से विद्वित होता है कि वह एक सदाचारी विजेता राजा था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शोध के अनुसार यह वही राजा है जिसे यूनानी साईरस, हिब्रु भाषा में खोरिस तथा अरब में ख़ुसरु के नाम से पुकारा जाता है। जिस का शासन काल 559 ई पूर्व है। वह लिखते हैं कि 1838 ई में साईरस की एक पत्थर की मूर्ति अस्तख़र के खण्डरों में मिली है। जिस में बाज़ पक्षी के भाँति उस के दो पंख तथा उस के सिर पर भेड़ के समान दो सींग हैं। इस में मीडिया और फ़ारस के दो राज्यों की उपमा दो सींगों से दी गयी है। (देखियेः तर्जमानुल क़ुर्आन, भागः 3, पृष्ठः 436-438)
Verse 84
हमने उसे धरती में प्रभुत्व प्रदान किया तथा उसे प्रत्येक प्रकार का साधन दिया।
Verse 85
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तो वह एक राह के पीछे लगा।
Verse 86
यहाँ तक कि जब सूर्यास्त के स्थान तक[1] पहुँचा, तो उसने पाया कि वह एक काली कीचड़ के स्रोत में डूब रहा है और वहाँ एक जाति को पाया। हमने कहाः हे ज़ुलक़रनैन! तू उन्हें यातना दे अथवा उनमें अच्छा व्यवहार बना।
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1. अर्थात पश्चिम की अन्तिम सीमा तक।
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1. अर्थात पश्चिम की अन्तिम सीमा तक।
Verse 87
उसने कहाः जो अत्याचार करेगा, हम उसे दण्ड देंगे। फिर वह अपने पालनहार की ओर फेरा[1] जायेगा, तो वह उसे कड़ी यातना देगा।
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1. अर्थात निधन के पश्चात् प्रलय के दिन।
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1. अर्थात निधन के पश्चात् प्रलय के दिन।
Verse 88
परन्तु जो ईमान लाये तथा सदाचार करे, तो उसी के लिए अच्छा प्रतिफल (बदला) है और हम उसे अपना सरल आदेश देंगे।
Verse 89
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फिर वह एक (अन्य) राह की ओर लगा।
Verse 90
यहाँ तक कि सूर्य़ोदय के स्थान तक पहुँचा। तो उसे पाया कि ऐसी जाति पर उदय हो रहा है, जिससे हमने उनके लिए कोई आड़ नहीं बनायी है।
Verse 91
उनकी दशा ऐसी ही थी और उस (ज़ुलक़रनैन) के पास जो कुछ था, हम उससे पूर्णतः सूचित हैं।
Verse 92
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फिर वह एक दूसरी राह की ओर लगा।
Verse 93
यहाँ तक कि जब दो पर्वतों के बीच पहुँचा, तो उन दोनों की उस ओर एक जाति को पाया, जो नहीं समीप थी कि किसी बात को समझे[1]।
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1. अर्थात अपनी भाषा के सिवा कोई भाषा नहीं समझती थी।
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1. अर्थात अपनी भाषा के सिवा कोई भाषा नहीं समझती थी।
Verse 94
उन्होंने कहाः हे ज़ुलक़रनैन! वास्तव में, याजूज तथा माजूज उपद्रवी हैं, इस देश में। तो क्या हम निर्धारित कर दें आपके लिए कुछ धन। इसलिए कि आप हमारे और उनके बीच कोई रोक (बन्ध) बना दें?
Verse 95
उसने कहाः जो कुछ मुझे मेरे पालनहार ने प्रदान किया है, वह उत्तम है। तो तुम मेरी सहायता बल और शक्ति से करो, मैं बना दूँगा तुम्हारे और उनके मध्य एक दृढ़ भीत।
Verse 96
मुझे लोहे की चादरें ला दो और जब दोनों पर्वतों के बीच दीवार तैयार कर दी, तो कहा कि आग दहकाओ, यहाँतक कि जब उस दीवार को आग (के समान लाल) कर दिया, तो कहाः मेरे पास लाओ, इसपर पिघला हुआ ताँबा उंडेल दूँ।
Verse 97
फिर वह उसपर चढ़ नहीं सकते थे और न उसमें कोई सेंध लगा सकते थे।
Verse 98
उस (ज़ुलक़रनैन) ने कहाः ये मेरे पालनहार की दया है। फिर जब मेरे पालनहार का वचन[1] आयेगा, तो वह इसे खण्ड-खण्ड कर देगा और मेरे पालनहार का वचन सत्य है।
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1. वचन से अभिप्राय प्रलय के आने का समय है। जैसी कि सह़ीह़ बुख़ारी ह़दीस संख्याः3346 आदि में आता है कि क़्यामत आने के समीप याजूज-माजूज वह दीवार तोड़ कर निकलेंगे, और धरती में उपद्रव मचा देंगे।
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1. वचन से अभिप्राय प्रलय के आने का समय है। जैसी कि सह़ीह़ बुख़ारी ह़दीस संख्याः3346 आदि में आता है कि क़्यामत आने के समीप याजूज-माजूज वह दीवार तोड़ कर निकलेंगे, और धरती में उपद्रव मचा देंगे।
Verse 99
और हम छोड़ देंगे उस[1] दिन लोगों को एक-दूसरे में लहरें लेते हुए तथा निरसिंघा में फूंक दिया जायेगा और हम सबको एकत्र कर देंगे।
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1. इस आयत में उस प्रलय के आने के समय की दशा का चित्रण किया गया है जिसे ज़ुलक़रनैन ने सत्य वचन कहा है।
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1. इस आयत में उस प्रलय के आने के समय की दशा का चित्रण किया गया है जिसे ज़ुलक़रनैन ने सत्य वचन कहा है।
Verse 100
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और हम सामने कर देंगे उस दिन नरक को काफ़िरों के समक्ष।
Verse 101
जिनकी आँखें मेरी याद से पर्दे में थीं और कोई बात सुन नहीं सकते थे।
Verse 102
तो क्या उन्होंने सोचा है जो काफ़िर हो गये कि वे बना लेंगे मेरे दासों को मेरे सिवा सहायक? वास्तव में, हमने काफ़िरों के आतिथ्य के लिए नरक तैयार कर दी है।
Verse 103
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आप कह दें कि क्या हम तुम्हें बता दें कि कौन अपने कर्मों में सबसे अधिक क्षतिग्रस्त हैं?
Verse 104
वह हैं, जिनके सांसारिक जीवन के सभी प्रयास व्यर्थ हो गये तथा वे समझते रहे कि वे अच्छे कर्म कर रहे हैं।
Verse 105
यही वे लोग हैं, जिन्होंने नहीं माना अपने पालनहार की आयतों तथा उससे मिलने को, अतः हम प्रलय के दिन उनका कोई भार निर्धारित नहीं करेंगे[1]।
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1. अर्थात उन का हमारे यहाँ कोई भार न होगा। ह़दीस में आया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः क़्यामत के दिन एक भारी भरकम व्यक्ति आयेगा। मगर अल्लाह के सदन में उस का भार मच्छर के पंख के बराबर भी नहीं होगा। फिर आप ने इसी आयत को पढ़ा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4729)
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1. अर्थात उन का हमारे यहाँ कोई भार न होगा। ह़दीस में आया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः क़्यामत के दिन एक भारी भरकम व्यक्ति आयेगा। मगर अल्लाह के सदन में उस का भार मच्छर के पंख के बराबर भी नहीं होगा। फिर आप ने इसी आयत को पढ़ा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4729)
Verse 106
उन्हीं का बदला नरक है, इस कारण कि उन्होंने कुफ़्र किया और मेरी आयतों और मेरे रसूलों का उपहास किया।
Verse 107
निश्चय जो ईमान लाये और सदाचार किये, उन्हीं के आतिथ्य के लिए फ़िरदौस[1] के बाग़ होंगे।
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1. फ़िर्दौस, स्वर्ग के सर्वोच्च स्थान का नाम है। (सह़ीह़ बुख़ारीः7423)
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1. फ़िर्दौस, स्वर्ग के सर्वोच्च स्थान का नाम है। (सह़ीह़ बुख़ारीः7423)
Verse 108
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उसमें वे सदावासी होंगे, उसे छोड़कर जाना नहीं चाहेंगे।
Verse 109
(हे नबी!) आप कह दें कि यदि सागर मेरे पालनहार की बातें लिखने के लिए स्याही बन जायेँ, तो सागर समाप्त हो जायें इससे पहले कि मेरे पालनहार की बातें समाप्त हों, यद्यपि उतनी ही स्याही और ले आयें।
Verse 110
आप कह देः मैंतो तुम जैसा एक मनुष्य पुरुष हूँ, मेरी ओर प्रकाशना (वह़्यी) की जाती है कि तुम्हारा पूज्य बस एक ही पूज्य है। अतः, जो अपने पालनहार से मिलने की आशा रखता हो, उसे चाहिए कि सदाचार करे और साझी न बनाये अपने पालनहार की इबादत (वंदना) में किसी को।
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