الترجمة الهندية से الهندية में सूरह مريم का अनुवाद
Verse 1
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काफ़, हा, या, ऐन, स़ाद।
Verse 2
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ये आपके पालनहार की दया की चर्चा है, अपने भक्त ज़करिय्या पर।
Verse 3
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जबकि उसने अपने पालनहार से विनय की, गुप्त विनय।
Verse 4
उसने कहाः मेरे पालनहार! मेरी अस्थियाँ निर्बल हो गयीं, सिर बुढ़ापे से सफेद[1] हो गया है तथा मेरे पालनहार! कभी ऐसा नहीं हुआ कि तुझसे प्रार्थना करके निष्फल हुआ हूँ।
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1. अर्थात पूरे बाल सफ़ेद हो गये।
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1. अर्थात पूरे बाल सफ़ेद हो गये।
Verse 5
और मुझे अपने भाई-बंदों से भय[1] है, अपने (मरण) के पश्चात् तथा मेरी पत्नी बाँझ है, अतः मुझे अपनी ओर से एक उत्तराधिकारी प्रदान कर दे।
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1. अर्थात दुराचार और बुरे व्यवहार का।
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1. अर्थात दुराचार और बुरे व्यवहार का।
Verse 6
वह मेरा उत्तराधिकारी हो तथा याक़ूब के वंश का उत्तराधिकारी[1] हो और हे मेरे पालनहार! उसे प्रिय बना दे।
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1. अर्थात नबी हो। आदरणीय ज़करिय्या (अलैहिस्सलाम) याक़ूब (अलैहिस्सलाम) के वंश में थे।
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1. अर्थात नबी हो। आदरणीय ज़करिय्या (अलैहिस्सलाम) याक़ूब (अलैहिस्सलाम) के वंश में थे।
Verse 7
हे ज़करिय्या! हम तुझे एक बालक की शुभ सूचना दे रहे हैं, जिसका नाम यह़्या होगा। हमने नहीं बनाया है, इससे पहले उसका कोई समनाम।
Verse 8
उसने (आश्यर्य से) कहाः मेरे पालनहार! कहाँ से मेरे यहाँ कोई बालक होगा, जबकि मेरी पत्नि बाँझ है और मैं बुढ़ापे की चरम सीमा को जा पहुँचा हूँ।
Verse 9
उसने कहाः ऐसा ही होगा, तेरे पालनहार ने कहा हैः ये मेरे लिए सरल है, इससे पहले मैंने तेरी उत्पत्ति की है, जबकि तू कुछ नहीं था।
Verse 10
उस (ज़करिय्या) ने कहाः मेरे पालनहार! मेरे लिए कोई लक्षण (चिन्ह) बना दे। उसने कहाः तेरा लक्षण ये है कि तू बोल नहीं सकेगा, लोगों से निरंतर तीन रातें[1]।
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1. रात से अभिप्राय दिन तथा रात दोनों ही हैं। अर्थात जब बिना किसी रोग के लोगों से बात नहीं कर सकोगे तो यह शुभ सूचना का लक्षण होगा।
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1. रात से अभिप्राय दिन तथा रात दोनों ही हैं। अर्थात जब बिना किसी रोग के लोगों से बात नहीं कर सकोगे तो यह शुभ सूचना का लक्षण होगा।
Verse 11
फिर वह मेह़राब (चाप) से निकलकर अपनी जाति के पास आया और उन्हें संकेत द्वारा आदेश दिया कि उस (अल्लाह) की पवित्रता का वर्णन करो, प्रातः तथा संध्या।
Verse 12
हे यह़्या[1]! इस पुस्तक (तौरात) को थाम ले और हमने उसे बचपन ही में ज्ञान (प्रबोध) प्रदान किया।
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1. अर्थात जब यह़्या का जन्म हो गया और कुछ बड़ा हुआ तो अल्लाह ने उसे तौरात का ज्ञान दिया।
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1. अर्थात जब यह़्या का जन्म हो गया और कुछ बड़ा हुआ तो अल्लाह ने उसे तौरात का ज्ञान दिया।
Verse 13
तथा अपनी ओर से प्रेम भाव तथा पवित्रता (प्रदान की) और वह बड़ा संयमी (सदाचारी) था।
Verse 14
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तथा अपनी माता-पिता के साथ सुशील था। वह क्रुर तथा अवज्ञाकारी नहीं था।
Verse 15
उसपर शान्ति है, जिस दिन उसने जन्म लिया और जिस दिन मरेगा और जिस दिन पुनः जीवित किया जायेगा।
Verse 16
तथा आप, इस पुस्तक (क़ुर्आन) में मर्यम[1] की चर्चा करें, जब वह अपने परिजनों से अलग होकर एक पूर्वी स्थान की ओर आयीं।
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1. मर्यम आदरणीय इम्रान की पुत्री, दावूद अलैहिस्सलाम के वंश से थीं। उन के जन्म के विषय में सूरह आले इमरान देखिये।
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1. मर्यम आदरणीय इम्रान की पुत्री, दावूद अलैहिस्सलाम के वंश से थीं। उन के जन्म के विषय में सूरह आले इमरान देखिये।
Verse 17
फिर उनकी ओर से पर्दा कर लिया, तो हमने उसकी ओर अपनी रूह़ (आत्मा)[1] को भेजा, तो उसने उसके लिए एक पूरे मनुष्य का रूप धारण कर लिया।
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1. इस से अभिप्रेत फ़रिश्ते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) हैं।
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1. इस से अभिप्रेत फ़रिश्ते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) हैं।
Verse 18
उसने कहाः मैं शरण माँगती हूँ अत्यंत कृपाशील की तुझ से, यदि तुझे अल्लाह का कुछ भी भय हो।
Verse 19
उसने कहाः मैं तेरे पालनहार का भेजा हुआ हूँ, ताकि तुझे एक पुनीत बालक प्रदान कर दूँ।
Verse 20
वह बोलीः ये कैसे हो सकता है कि मेरे बालक हों, जबकि किसी पुरुष ने मुझे स्पर्श भी नहीं किया है और न मैं व्यभिचारिणी हूँ?
Verse 21
फ़रिश्ते ने कहाः ऐसा ही होगा, तेरे पालनहार का वचन है कि वह मेरे लिए अति सरल है और ताकि हम उसे लोगों के लिए एक लक्षण (निशानी)[1] बनायें तथा अपनी विशेष दया से और ये एक निश्चित बात है।
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1. अर्थात अपने सामर्थ्य की निशानी कि हम नर-नारी के योग के बिना भी स्त्री के गर्भ से शिशु की उत्पित्ति कर सकते हैं।
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1. अर्थात अपने सामर्थ्य की निशानी कि हम नर-नारी के योग के बिना भी स्त्री के गर्भ से शिशु की उत्पित्ति कर सकते हैं।
Verse 22
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फिर वह गर्भवती हो गई तथा उस (गर्भ को लेकर) दूर स्थान पर चली गयी।
Verse 23
फिर प्रसव पीड़ा उसे एक खजूर के तने तक लायी, कहने लगीः क्या ही अच्छा होता, मैं इससे पहले ही मर जाती और भूली-बिसरी हो जाती।
Verse 24
तो उसके नीचे से पुकारा[1] कि उदासीन न हो, तेरे पालनहार ने तेरे नीचे[2] एक स्रोत बहा दिया है।
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1. अर्थात जिब्रील फ़रिश्ते ने घाटी के नीचे से आवाज़ दी। 2. अर्थात मर्यम के चरणों के नीचे।
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1. अर्थात जिब्रील फ़रिश्ते ने घाटी के नीचे से आवाज़ दी। 2. अर्थात मर्यम के चरणों के नीचे।
Verse 25
और हिला दे अपनी ओर खजूर के तने को, तुझपर गिरायेगा वह ताज़ी पकी खजूरें[1]।
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1. अल्लाह ने अस्वभाविक रूप से आदरणीय मर्यम के लिये, खाने-पीने की व्यवस्था कर दी।
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1. अल्लाह ने अस्वभाविक रूप से आदरणीय मर्यम के लिये, खाने-पीने की व्यवस्था कर दी।
Verse 26
अतः, खा, पी तथा आँख ठण्डी कर। फिर यदि किसी पुरुष को देखे, तो कह देः वास्तव में, मैंने मनौती मान रखी है, अत्यंत कृपाशील के लिए व्रत की। अतः, मैं आज किसी मनुष्य से बात नहीं करूँगी।
Verse 27
फिर उस (शिशु ईसा) को लेकर अपनी जाति में आयी, सबने कहाः हे मर्यम! तूने बहुत बुरा किया।
Verse 28
हे हारून की बहन[1]! तेरा पिता कोई बुरा व्यक्ति न था और न तेरी माँ व्यभिचारिणी थी।
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1. अर्थात हारून अलैहिस्सलाम के वंशज की पुत्री। अरबों के यहाँ किसी क़बीले का भाई होने का अर्थ उस क़बीले और वंशज का व्यक्ति लिया जाता था।
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1. अर्थात हारून अलैहिस्सलाम के वंशज की पुत्री। अरबों के यहाँ किसी क़बीले का भाई होने का अर्थ उस क़बीले और वंशज का व्यक्ति लिया जाता था।
Verse 29
मर्यम ने उस (शिशु) की ओर संकेत किया। लोगों ने कहाः हम कैसे उससे बात करें, जो गोद में पड़ा हुआ एक शिशु है?
Verse 30
वह (शिशु) बोल पड़ाः मैं अल्लाह का भक्त हूँ। उसने मुझे पुस्तक (इन्जील) प्रदान की है तथा मुझे नबी बनाया है[1]।
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1. अर्थात मुझे पुस्तक प्रदान करने और नबी बनाने का निर्णय कर दिया है।
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1. अर्थात मुझे पुस्तक प्रदान करने और नबी बनाने का निर्णय कर दिया है।
Verse 31
तथा मुझे शुभ बनाया है, जहाँ रहूँ और मुझे आदेश दिया है नमाज़ तथा ज़कात का, जब तक जीवित रहूँ।
Verse 32
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तथा आपनी माँ का सेवक (बनाया है) और उसने मुझे क्रूर तथा अभागा[1] नहीं बनाया है।
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1. इस में यह संकेत है कि माता-पिता के साथ दुर्व्यहार करना क्रूरता तथा दुर्भाग्य है।
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1. इस में यह संकेत है कि माता-पिता के साथ दुर्व्यहार करना क्रूरता तथा दुर्भाग्य है।
Verse 33
तथा शान्ति है मुझपर, जिस दिन मैंने जन्म लिया, जिस दिन मरूँगा और जिस दिन पुनः जीवित किया जाऊँगा।
Verse 34
ये है ईसा मर्यम का सुत, यही सत्य बात है, जिसके विषय में लोग संदेह कर रहे हैं।
Verse 35
अल्लाह का ये काम नहीं कि अपने लिए कोई संतान बनाये, वह पवित्र है! जब वह किसी कार्य का निर्णय करता है, तो उसके सिवा कुछ नहीं होता कि उसे आदेश दे किः "हो जा" और वह हो जाता है।
Verse 36
और (ईसा ने कहाः) वास्तव में, अल्लाह मेरा पालनहार तथा तुम्हारा पालनहार है, अतः, उसी की इबादत (वंदना) करो, यही सुपथ (सीधी राह) है।
Verse 37
फिर सम्प्रदायों[1] ने आपस में विभेद किया, तो विनाश है उनके लिए, जो काफ़िर हो गये, एक बड़े दिन के आ जाने के कारण।
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1. अर्थात अह्ले किताब के सम्प्रदायों ने ईसा अलैहिस्सलाम की वास्तविक्ता जानने के पश्चात् उन के विषय में विभेद किया। यहूदियों ने उसे जादूगर तथा वर्णसंकर कहा। और ईसाईयों के एक सम्प्रदाय ने कहा कि वह स्वयं अल्लाह है। दूसरे ने कहाः वह अल्लाह का पुत्र है। और उन के तीसरे कैथुलिक सम्प्रदाय ने कहा कि वह तीन में का तीसरा है। बड़े दिन से अभिप्राय प्रलय का दिन है।
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1. अर्थात अह्ले किताब के सम्प्रदायों ने ईसा अलैहिस्सलाम की वास्तविक्ता जानने के पश्चात् उन के विषय में विभेद किया। यहूदियों ने उसे जादूगर तथा वर्णसंकर कहा। और ईसाईयों के एक सम्प्रदाय ने कहा कि वह स्वयं अल्लाह है। दूसरे ने कहाः वह अल्लाह का पुत्र है। और उन के तीसरे कैथुलिक सम्प्रदाय ने कहा कि वह तीन में का तीसरा है। बड़े दिन से अभिप्राय प्रलय का दिन है।
Verse 38
वे भली-भाँति सुनेंगे और देखेंगे, जिस दिन हमारे पास आयेंगे, परन्तु अत्याचारी आज खुले कुपथ में हैं।
Verse 39
और (हे नबी!) आप उन्हें संताप के दिन से सावधान कर दें, जब निर्णय[1] कर दिया जायेगा, जबकि वे अचेत हैं तथा ईमान नहीं ला रहे हैं।
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1. अर्थात प्रत्येक के कर्मानुसार उस के लिये नरक अथवा स्वर्ग का निर्णय कर दिया जायेगा। फिर मौत को एक भेड़ के रूप में वध कर दिया जायेगा। तथा घोषणा कर दी जायेगी कि हे स्वर्गियो! तुम्हें सदा रहना है, और अब मौत नहीं है। और हे नारकियो! तुम्हें सदा नरक में रहना है, अब मौत नहीं है। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4730)
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1. अर्थात प्रत्येक के कर्मानुसार उस के लिये नरक अथवा स्वर्ग का निर्णय कर दिया जायेगा। फिर मौत को एक भेड़ के रूप में वध कर दिया जायेगा। तथा घोषणा कर दी जायेगी कि हे स्वर्गियो! तुम्हें सदा रहना है, और अब मौत नहीं है। और हे नारकियो! तुम्हें सदा नरक में रहना है, अब मौत नहीं है। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4730)
Verse 40
निश्चय हम ही उत्तराधिकारी होंगे धरती के तथा जो उसके ऊपर है और हमारी ही ओर सब प्रत्यागत किये जायेंगे।
Verse 41
तथा आप चर्चा कर दें इस पुस्तक (क़ुर्आन) में इब्राहीम की। वास्तव में, वह एक सत्यवादी नबी था।
Verse 42
जब उसने कहा अपने पिता सेः हे मेरे प्रिय पिता! क्यों आप उसे पूजते हैं, जो न सुनता है, न देखता है और न आपके कुछ काम आता?
Verse 43
हे मेरे पिता! मेरे पास वह ज्ञान आ गया है, जो आपके पास नहीं आया, अतः आप मेरा अनुसरण करें, मैं आपको सीधी राह दिखा दूँगा।
Verse 44
हे मेरे प्रिय पिता! शैतान की पूजा न करें, वास्तव में, शैतान अत्यंत कृपाशील (अल्लाह) का अवज्ञाकारी है।
Verse 45
हे मेरे पिता! वास्तव में, मुझे भय हो रहा है कि आपको अत्यंत कृपाशील की कोई यातना आ लगे, तो आप शैतान के मित्र हो जायेंगे[1]।
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1. अर्थात अब मैं आप को संबोधित नहीं करूँगा।
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1. अर्थात अब मैं आप को संबोधित नहीं करूँगा।
Verse 46
उसने कहाः क्या तू हमारे पूज्यों से विमुख हो रहा है? हे इब्राहीम! यदि तू (इससे) नहीं रुका, तो मैं तुझे पत्थरों से मार दूँगा और तू मुझसे विलग हो जा, सदा के लिए।
Verse 47
(इब्राहीम) ने कहाः सलाम[1] है आपको! मैं क्षमा की प्रार्थना करता रहूँगा आपके लिए अपने पालनहार से, मेरा पालनहार मेरे प्रति बड़ा करुणामय है।
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1. इस्ह़ाक़ इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पुत्र तथा याक़ूब के पिता थे, इन्हीं के वंश को बनी इस्राईल कहते हैं।
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1. इस्ह़ाक़ इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पुत्र तथा याक़ूब के पिता थे, इन्हीं के वंश को बनी इस्राईल कहते हैं।
Verse 48
तथा मैं तुम सभीको छोड़ता हूँ और जिसे तुम पुकारते हो अल्लाह के सिवा और प्रार्थना करता रहूँगा अपने पालनहार से। मुझे विश्वास है कि मैं अपने पालनहार से प्रार्थना करके असफल नहीं हूँगा।
Verse 49
फिर जब उन्हें छोड़ दिया तथा जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकार रहे थे, तो हमने उसे प्रदान कर दिया इस्ह़ाक़ तथा याक़ूब, और हमने प्रत्येक को नबी बना दिया।
Verse 50
तथा हमने प्रदान की, उन सबको, अपनी दया में से और हमने बना दी, उनकी शुभ चर्चा सर्वोच्च।
Verse 51
और आप इस पुस्तक में मूसा की चर्चा करें। वास्तव में, वह चुना हुआ तथा रसूल एवं नबी था।
Verse 52
और हमने उसे पुकारा तूर पर्वत के दायें किनारे से तथा उसे समीप कर लिया रहस्य की बात करते हूए।
Verse 53
और हमने प्रदान किया उसे अपनी दया में से, उसके भाई हारून को नबी बनाकर।
Verse 54
तथा इस पुस्तक में इस्माईल[1] की चर्चा करो, वास्तव में, वह वचन का पक्का तथा रसूल-नबी था।
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1. आप इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बड़े पुत्र थे, इन्हीं से अरबों का वंश चला और आप ही के वंश से अंतिम नबी मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबी बना कर भेजे गये हैं।
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1. आप इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बड़े पुत्र थे, इन्हीं से अरबों का वंश चला और आप ही के वंश से अंतिम नबी मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबी बना कर भेजे गये हैं।
Verse 55
और आदेश देता था अपने परिवार को नमाज़ तथा ज़कात का और अपने पालनहार के यहाँ प्रिय था।
Verse 56
तथा इस पुस्तक में इद्रीस की चर्चा करो, वास्तव में, वह सत्यवादी नबी था।
Verse 57
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तथा हमने उसे उठाया उच्च स्थान पर।
Verse 58
यही वो लोग हैं, जिनपर अल्लाह ने पुरस्कार किया, नबियों में से, आदम की संतति में से तथा उनमें से, जिन्हें हमने (नाव पर) सवार किया नूह़ के साथ तथा इब्राहीम और इस्राईल की संतति में से तथा उनमें से जिन्हें हमने मार्गदर्शन दिया और चुन लिया, जब इनके समक्ष पढ़ी जाती थी अत्यंत कृपाशील की आयतें, तो वे गिर जाया करते थे सज्दा करते हुए तथा रोते हुए।
Verse 59
फिर इनके पश्चात् ऐसै कपूत पैदा हुए, जिन्होंने गंवा दिया नमाज़ को तथा अनुसरण किया मनोकांक्षाओं का, तो वे शीघ्र ही कुपथ (के परिणाम) का सामना करेंगे।
Verse 60
परन्तु जिन्होंने क्षमा माँग ली तथा ईमान लाये और सदाचार किये, तो वही स्वर्ग में प्रवेश करेंगे और उनपर तनिक अत्याचार नहीं किया जायेगा।
Verse 61
स्थायी बिन देखे स्वर्ग, जिनका परोक्षतः वचन अत्यंत कृपाशील ने अपने भक्तों को दिया है, वास्तव में, उसका वचन पूरा होकर रहेगा।
Verse 62
वे नहीं सुनेंगे, उसमें कोई बक्वास, सलाम के सिवा तथा उनके लिए उसमें जीविका होगी प्रातः और संध्या।
Verse 63
यही वो स्वर्ग है, जिसका हम उत्तराधिकारी बना देंगे, अपने भक्तों में से उसे, जो आज्ञाकारी हो।
Verse 64
और हम[1] नहीं उतरते, परन्तु आपके पालनहार के आदेश से, उसी का है, जो हमारे आगे तथा पीछे है और जो इसके बीच है और आपका पालनहार भूलने वाला नहीं है।
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1. ह़दीस के अनुसार एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (फ़रिश्ते) जिब्रील से कहा कि क्या चीज़ आप को रोक रही है कि आप मुझ से और अधिक मिला करें। इसी पर यह आयत अवतरित हुई। ( सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4731)
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1. ह़दीस के अनुसार एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (फ़रिश्ते) जिब्रील से कहा कि क्या चीज़ आप को रोक रही है कि आप मुझ से और अधिक मिला करें। इसी पर यह आयत अवतरित हुई। ( सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः4731)
Verse 65
आकाशों तथा धरती का पालनहार तथा जो उन दोनों के बीच है। अतः उसी की इबादत (वंदना) करें तथा उसकी इबादत पर स्थित रहें। क्या आप उसके समक्ष किसी को जानते हैं?
Verse 66
तथा मनुष्य कहता है कि क्या जब मैं मर जाऊँगा, तो फिर निकाला जाऊँगा जीवित होकर?
Verse 67
क्या मनुष्य याद नहीं रखता कि हम ही ने उसे इससे पूर्व उत्पन्न किया है, जबकि वह कुछ (भी) न था?
Verse 68
तो आपके पालनहार की शपथ! हम उन्हें अवश्य एकत्र कर देंगे और शैतानों को, फिर उन्हें अवश्य उपस्थित कर देंगे, नरक के किनारे मुँह के बल गिरे हुए।
Verse 69
फिर हम अलग कर लेंगे, प्रत्येक समुदाय से, उनमें से उसे, जो अत्यंत कृपाशील का अधिक अवज्ञाकारी था।
Verse 70
फिर हम ही भली-भाँति जानते हैं कि कौन अधिक योग्य है उसमें झोंक दिये जाने के।
Verse 71
और नहीं है तुममें से कोई, परन्तु वहाँ गुज़रने वाला[1] है, ये आपके पालनहार पर अनिवार्य है, जो पूरा होकर रहेगा।
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1. अर्थात नरक से जिस पर एक पुल बनाया जायेगा। उस पर से सभी ईमान वालों और काफ़िरों को अवश्य गुज़रना होगा। यह और बात है कि ईमान वालों को इस से कोई हानि न पहुँचे। इस की व्याख्या सह़ीह़ ह़दीसों में वर्णित है।
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1. अर्थात नरक से जिस पर एक पुल बनाया जायेगा। उस पर से सभी ईमान वालों और काफ़िरों को अवश्य गुज़रना होगा। यह और बात है कि ईमान वालों को इस से कोई हानि न पहुँचे। इस की व्याख्या सह़ीह़ ह़दीसों में वर्णित है।
Verse 72
फिर हम उन्हें बचा लेंगे, जो डरते रहे तथा उसमें छोड़ देंगे अत्याचारियों को मुँह के बल गिरे हुए।
Verse 73
तथा जब उनके समक्ष हमारी खुली आयतें पढ़ी जाती हैं, तो काफ़िर ईमान वालों से कहते हैं कि (बताओ) दोनों सम्प्रदायों में किसकी दशा अच्छी है और किसकी मज्लिस (सभा) अधिक भव्य है?
Verse 74
जबकि हम ध्वस्त कर चुके हैं, इनसे पहले बहुत-सी जातियों को, जो इनमें उत्तम थीं संसाधन तथा मान-सम्मान में।
Verse 75
(हे नबी!) आप कह दें कि जो कुपथ में ग्रस्त होता है, अत्यंत कृपाशील उसे अधिक अवसर देता है। यहाँ तक कि जब उसे देख लें, जिसका वचन दिये जाते हैं; या तो यातना को अथवा प्रलय को, उस समय उन्हें ज्ञान हो जायेगा कि किसकी दशा बुरी और किसका जत्था अधिक निर्बल है।
Verse 76
और अल्लाह उन्हें, जो सुपथ हों, मार्गदर्शन में आधिक कर देता है और शेष रह जाने वाले सदाचार ही उत्तम हैं, आपके पालनहार के समीप कर्म-फल में तथा उत्तम हैं परिणाम के फलस्वरूप।
Verse 77
(हे नबी!) क्या आपने उसे देखा, जिसने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र (अविश्वास) किया तथा कहाः मैं अवश्य धन तथा संतान दिया जाऊँगा?
Verse 78
क्या वह अवगत हो गया है परोक्ष से अथवा उसने अत्यंत दयाशील से कोई वचन ले रखा है?
Verse 79
कदापि नहीं, हम लिख लेंगे, जो वह कहता है और हम अधिक करते जायेंगे उसकी यातना को अत्यधिक।
Verse 80
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और हम ले लेंगे जिसकी वह बात कर रहा है और वह हमारे पास अकेला[1] आयेगा।
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1. इन आयतों के अवतरित होने का कारण यह बताया गया है कि ख़ब्बाब बिन अरत्त का आस बिन वायल (काफ़िर) पर कुछ ऋण था। जिसे माँगने के लिये गये तो उस ने कहाः मैं तुझे उस समय तक नहीं दूँगा जब तक मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ कुफ़्र नहीं करेगा। उन्हों ने कहा कि यह काम तो तू मर कर पुनः जीवित हो जाये, तब भी नहीं करँगा। उस ने कहाः क्या मैं मरने के पश्चात् पुनः जीवित कर दिया जाऊँगा? ख़ब्बाब ने कहाः हाँ। आस ने कहाः वहाँ मुझे धन और संतान मिलेगी तो तुम्हारा ऋण चुका दूँगा। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः 4732)
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1. इन आयतों के अवतरित होने का कारण यह बताया गया है कि ख़ब्बाब बिन अरत्त का आस बिन वायल (काफ़िर) पर कुछ ऋण था। जिसे माँगने के लिये गये तो उस ने कहाः मैं तुझे उस समय तक नहीं दूँगा जब तक मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ कुफ़्र नहीं करेगा। उन्हों ने कहा कि यह काम तो तू मर कर पुनः जीवित हो जाये, तब भी नहीं करँगा। उस ने कहाः क्या मैं मरने के पश्चात् पुनः जीवित कर दिया जाऊँगा? ख़ब्बाब ने कहाः हाँ। आस ने कहाः वहाँ मुझे धन और संतान मिलेगी तो तुम्हारा ऋण चुका दूँगा। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्याः 4732)
Verse 81
तथा उन्होंने बना लिए हैं अल्लाह के सिवा बहुत-से पूज्य, ताकि वे उनके सहायक हों।
Verse 82
ऐसा कदापि नहीं होगा, वे सब इसकी पूजा (उपासना) का अस्वीकार कर[1] देंगे और उनके विरोधी हो जायेंगे।
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1. अर्थात प्रलय के दिन।
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1. अर्थात प्रलय के दिन।
Verse 83
क्या आपने नहीं देखा कि हमने भेज दिया है शैतानों को काफ़िरों पर, जो उन्हें बराबर उकसाते रहते हैं?
Verse 84
अतः शीघ्रता न करें उनपर[1], हम तो केवल उनके दिन गिन रहे हैं।
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1. अर्थात यातना के आने का। और इस के लिये केवल उन की आयु पूरी होने की देर है।
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1. अर्थात यातना के आने का। और इस के लिये केवल उन की आयु पूरी होने की देर है।
Verse 85
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जिस दिन हम एकत्र कर देंगे, आज्ञाकारियों को, अत्यंत कृपाशील की ओर अतिथि बनाकर।
Verse 86
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तथा हांक देंगे पापियों को नरक की ओर प्यासे पशुओं के समान।
Verse 87
वह (काफ़िर) अभिस्तावना का अधिकार नहीं रखेंगे, परन्तु जिसने बना लिया हो अत्यंत कृपाशील के पास कोई वचन[1]।
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1. अर्थात अल्लाह की अनुमति से वही सिफ़ारिश करेगा जो ईमान लाया है।
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1. अर्थात अल्लाह की अनुमति से वही सिफ़ारिश करेगा जो ईमान लाया है।
Verse 88
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तथा उन्होंने कहा कि बना लिया है अत्यंत कृपाशील ने अपने लिए एक पुत्र[1]।
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1. अर्थात ईसाईयों ने- जैसा कि इस सूरह के आरंभ में आया है- ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का पुत्र बना लिया। और इस भ्रम में पड़ गये कि उन्हों ने मनुष्य के पापों का प्रायश्चित चुका दिया। इस आयत में इसी कुपथ का खण्डन किया जा रहा है।
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1. अर्थात ईसाईयों ने- जैसा कि इस सूरह के आरंभ में आया है- ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का पुत्र बना लिया। और इस भ्रम में पड़ गये कि उन्हों ने मनुष्य के पापों का प्रायश्चित चुका दिया। इस आयत में इसी कुपथ का खण्डन किया जा रहा है।
Verse 89
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वास्तव में, तुम एक भारी बात घड़ लाये हो।
Verse 90
समीप है कि इस कथन के कारण आकाश फट पड़े तथा धरती चिर जाये और गिर जायेँ पर्वत कण-कण होकर।
Verse 91
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कि वे सिध्द करने लगे अत्यंत कृपाशील के लिए संतान।
Verse 92
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ﯮ
तथा नहीं योग्य है अत्यंत कृपाशील के लिए कि वह कोई संतान बनाये।
Verse 93
प्रत्येक जो आकाशों तथा धरती में हैं, आने वाले हैं, अत्यंत कृपाशील की सेवा में दास बनकर।
Verse 94
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उसने उन्हें नियंत्रण में ले रखा है तथा उन्हें पूर्णतः गिन रखा है।
Verse 95
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और प्रत्येक उसके समक्ष आने वाला है, प्रलय के दिन, अकेला[1]।
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1. अर्थात उस दिन कोई किसी का सहायक न होगा। और न ही किसी को उस का धन-संतान लाभ देगा।
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1. अर्थात उस दिन कोई किसी का सहायक न होगा। और न ही किसी को उस का धन-संतान लाभ देगा।
Verse 96
निश्चय जो ईमान वाले हैं तथा सदाचार किये हैं, शीघ्र बना देगा, उनके लिए अत्यंत कृपाशील (दिलों में)[1] प्रेम।
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1. अर्थात उन के ईमान और सदाचार के कारण, लोग उन से प्रेम करने लगेंगे।
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1. अर्थात उन के ईमान और सदाचार के कारण, लोग उन से प्रेम करने लगेंगे।
Verse 97
अतः (हे नबी!) हमने सरल बना दिया है, इस (क़ुर्आन) को आपकी भाषा में, ताकि आप इसके द्वारा शुभ सूचना दें संयमियों (आज्ञाकारियों) को तथा सतर्क कर दें विरोधियों को।
Verse 98
तथा हमने ध्वस्त कर दिया है, इनसे पहले बहुत सी जातियों को, तो क्या आप देखते हैं, उनमें किसी को अथवा सुनते हैं, उनकी कोई ध्वनि?
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