سورة الواقعة

الترجمة الهندية

الترجمة الهندية से الهندية में सूरह الواقعة का अनुवाद

الترجمة الهندية

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مجمع الملك فهد

Verse 1
जब होने वाली, हो जायेगी।
Verse 2
उसका होना कोई झूठ नहीं है।
Verse 3
नीचा-ऊँचा करने[1] वाली।
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1. इस से अभिप्राय प्रलय है। जो सत्य के विरोधियों को नीचा कर के नरक तक पहुँचायेगी। तथा आज्ञाकारियों को स्वर्ग के ऊँचे स्थान तक पहुँचायेगी। आरंभिक आयतों में प्रलय के होने की चर्चा, फिर उस दिन लोगों के तीन भागों में विभाजित होने का वर्णन किया गया है।
Verse 4
जब धरती तेज़ी से डोलने लगेगी।
Verse 5
और चूर-चूर कर दिये जायेंगे पर्वत।
Verse 6
फिर हो जायेंगे बिखरी हुई धूल।
Verse 7
तथा तुम हो जाओगे तीन समूह।
तो दायें वाले, तो क्या हैं दायें वाले![1]
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1. दायें वाले से अभिप्राय वह हैं जिन का कर्मपत्र दायें हाथ में दिया जायेगा। तथा बायें वाले वह दुराचारी होंगे जिन का कर्मपत्र बायें हाथ में दिया जायेगा।
और बायें वाले, तो क्या हैं बायें वाले!
Verse 10
और अग्रगामी तो अग्रगामी ही हैं।
Verse 11
वही समीप किये[1] हुए हैं।
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1. अर्थात अल्लाह के प्रियवर और उस के समीप होंगे।
Verse 12
वे सुखों के स्वर्गों में होंगे।
Verse 13
बहुत-से अगले लोगों में से।
Verse 14
तथा कुछ पिछले लोगों में से होंगे।
Verse 15
स्वर्ण से बुने हुए तख़्तों पर।
Verse 16
तकिये लगाये उनपर, एक-दूसरे के सम्मुख (आसीन) होंगे।
Verse 17
फिरते होंगे उनकी सेवा के लिए बालक, जो सदा (बालक) रहेंगे।
प्याले तथा सुराह़ियाँ लेकर तथा मदिरा के छलकते प्याले।
न तो सिर चकरायेगा उनसे, न वे निर्बोध होंगे।
Verse 20
तथा जो फल वे चाहेंगे।
Verse 21
तथा पक्षी का जो मांस वे चाहेंगे।
Verse 22
और गोरियाँ बड़े नैनों वाली।
Verse 23
छुपाकर रखी हुईं मोतियों के समान।
Verse 24
उसके बदले, जो वे (संसार में) करते रहे।
नहीं सुनेंगे उनमें व्यर्थ बात और न पाप की बात।
Verse 26
केवल सलाम ही सलाम की ध्वनि होगी।
और दायें वाले, क्या (ही भाग्यशाली) हैं दायें वाले!
Verse 28
बिन काँटे की बैरी में होंगे।
Verse 29
तथा तह पर तह केलों में।
Verse 30
फैली हुई छाया[1] में।
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1. ह़दीस में है कि स्वर्ग में एक वृक्ष है जिस की छाया में सवार सौ वर्ष चलेगा फिर भी वह समाप्त नहीं होगा। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4881)
Verse 31
और प्रवाहित जल में।
Verse 32
तथा बहुत-से फलों में।
Verse 33
जो न समाप्त होंगे, न रोके जायेंगे।
Verse 34
और ऊँचे बिस्तर पर।
Verse 35
हमने बनाया है (उनकी) पत्नियों को एक विशेष रूप से।
Verse 36
हमने बनाय है उन्हें कुमारियाँ।
Verse 37
प्रेमिकायें समायु।
Verse 38
दाहिने वालों के लिए।
Verse 39
बहुत-से अगलों में से होंगे।
Verse 40
तथा बहुत-से पिछलों में से।
और बायें वाले, तो क्या हैं बायें वाले!
Verse 42
वे गर्म वायु तथा खौलते जल में (होंगे)।
Verse 43
तथा काले धुवें की छाया में।
Verse 44
जो न शीतल होगा और न सुखद।
वास्तव में, वे इससे पहले (संसार में) सम्पन्न (सुखी) थे।
तथा दुराग्रह करते थे महा पापों पर।
तथा कहा करते थे कि क्या जब हम मर जायेंगे तथा हो जायेंगे धूल और अस्थियाँ, तो क्या हम अवश्य पुनः जीवित होंगे?
Verse 48
और क्या हमारे पूर्वज (भी)?
Verse 49
आप कह दें कि निःसंदेह सब अगले तथा पिछले।
अवश्य एकत्र किये जायेंगे एक निर्धारित दिन के समय।
फिर तुम, हे कुपथो! झुठलाने वालो!
अवश्य खाने वाले हो ज़क़्क़ूम (थोहड़) के वृक्ष से।[1]
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1. (देखियेः सूरह साफ़्फ़ात, आयतः62)
Verse 53
तथा भरने वाले हो उससे (अपने) उदर।
Verse 54
तथा पीने वाले हो उसपर से खौलता जल।
Verse 55
फिर पीने वाले हो प्यासे[1] ऊँट के समान।
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1. आयत में प्यासे ऊँटों के लिये 'ह़ीम' शब्द प्रयुक्त हुआ है। यह ऊँट में एक विशेष रोग होता है जिस से उस की प्यास नहीं जाती।
Verse 56
यही उनका अतिथि सत्कार है, प्रतिकार (प्रलय) के दिन।
Verse 57
हमने ही उत्पन्न किया है तुम्हें, फिर तुम विश्वास क्यों नहीं करते?
Verse 58
क्या तुमने ये विचार किया कि जो वीर्य तुम (गर्भाशयों में) गिराते हो।
क्या तुम उसे शिशु बनाते हो या हम बनाने वाले हैं?
हमने निर्धारित किया है तुम्हारे बीच मरण को तथा हम विवश होने वाले नहीं हैं।
कि बदल दें तुम्हारे रूप और तुम्हें बना दें उस रूप में, जिसे तुम नहीं जानते।
तथा तुमने तो जान लिया है प्रथम उत्पत्ति को फिर तुम शिक्षा ग्रहण क्यों नहीं करते?
Verse 63
फिर क्या तुमने विचार किया कि उसमें जो तुम बोते हो?
क्या तुम उसे उगाते हो या हम उसे उगाने वाले हैं?
यदि हम चाहें, तो उसे भुस बना दें, फिर तुम बातें बनाते रह जाओ।
Verse 66
वस्तुतः, हम दण्डित कर दिये गये।
Verse 67
बल्कि हम (जीविका से) वंचित कर दिये गये।
Verse 68
फिर तुमने विचार किया उस पानी में, जो तुम पीते हो?
क्या तुमने उसे बरसाया है बादल से अथवा हम उसे बरसाने वाले हैं।?
यदि हम चाहें, तो उसे खारी कर दें, फिर तुम आभारी (कृतज्ञ) क्यों नहीं होते?
Verse 71
क्या तुमने उस अग्नि को देखा, जिसे तुम सुलगाते हो।
क्या तुमने उत्पन्न किया है उसके वृक्ष को या हम उत्पन्न करने वाले हैं?
हमने ही बनाया उसे शिक्षाप्रद तथा यात्रियों के लाभदायक।
Verse 74
अतः, (हे नबी!) आप पवित्रता का वर्णन करें अपने महा पालनहार के नाम की।
मैं शपथ लेता हूँ सितारों के स्थानों की!
और ये निश्चय एक बड़ी शपथ है, यदि तुम समझो।
Verse 77
वास्तव में, ये आदरणीय[1] क़ुर्आन है।
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1. तारों की शपथ का अर्थ यह है कि जिस प्रकार आकाश के तारों की एक दृढ़ व्यवस्था है उसी प्रकार यह क़ुर्आन भी अति ऊँचा तथा सुदृढ़ है।
Verse 78
सुरक्षित[1] पुस्तक में।
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1. इस से अभिप्राय 'लौह़े मह़फ़ूज़' है।
Verse 79
इसे पवित्र लोग ही छूते हैं।[1]
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1. पवित्र लोगों से अभिप्राय फ़रिश्तें हैं। (देखियेः सूरह अबस, आयतः15-16)
Verse 80
अवतरित किया गया है सर्वलोक के पालनहार की ओर से।
Verse 81
फिर क्या तुम इस वाणि (क़ुर्आन) की अपेक्षा करते हो?
Verse 82
तथा बनाते हो अपना भाग कि इसे तुम झुठलाते हो?
Verse 83
फिर क्यों नहीं जब प्राण गले को पहुँचते हैं।
Verse 84
और तुम उस समय देखते रहते हो।
तथा हम अधिक समीप होते हैं उसके तुमसे, परन्तु तुम नहीं देख सकते।
तो यदि तुम किसी के आधीन न हो।
Verse 87
तो उस (प्राण) को फेर क्यों नहीं लाते, यदि तुम सच्चे हो?
फिर यदि वह (प्राणी) समीपवर्तियों में है।
Verse 89
तो उसके लिए सुख तथा उत्तम जीविका तथा सुख भरा स्वर्ग है।
और यदि वह दायें वालों में से है।
तो सलाम है तेरे लिए दायें वालों में होने के कारण।[1]
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1. अर्थात उस का स्वागत सलाम से होगा।
और यदि वह है झुठलाने वाले कुपथों में से।
Verse 93
तो अतिथि सत्कार है खौलते पानी से।
Verse 94
तथा नरक में प्रवेश।
वास्तव में, यही निश्चय सत्य है।
Verse 96
अतः, (हे नबी!) आप पवित्रता का वर्णन करें अपने महा पालनहार के नाम की।
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