سورة عبس

الترجمة الهندية

الترجمة الهندية से الهندية में सूरह عبس का अनुवाद

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مجمع الملك فهد

Verse 1
(नबी ने) त्योरी चढ़ाई तथा मुँह फेर लिया।
Verse 2
इस कारण कि उसके पास एक अँधा आया।
Verse 3
और तुम क्या जानो शायद वह पवित्रता प्राप्त करे।
Verse 4
या नसीह़त ग्रहण करे, जो उसे लाभ देती।
Verse 5
परन्तु, जो विमुख (निश्चिन्त) है।
Verse 6
तुम उनकी ओर ध्यान दे रहे हो।
Verse 7
जबकि तुमपर कोई दोष नहीं, यदि वह पवित्रता ग्रहण न करे।
Verse 8
तथा जो तुम्हारे पास दौड़ता आया।
Verse 9
और वह डर भी रहा है।
Verse 10
तुम उसकी ओर ध्यान नहीं देते।[1]
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1. (1-10) भावार्थ यह है कि सत्य के प्रचारक का यह कर्तव्य है कि जो सत्य की खोज में हो भले ही वह दरिद्र हो उसी के सुधार पर ध्यान दे। और जो अभिमान के कारण सत्य की परवाह नहीं करते उन के पीछे समय न गवायें। आप का यह दायित्व भी नहीं है कि उन्हें अपनी बात मनवा दें।
Verse 11
कदापि ये न करो, ये (अर्थात क़ुर्आन) एक स्मृति (याद दहानी) है।
Verse 12
अतः, जो चाहे स्मरण (याद) करे।
Verse 13
माननीय शास्त्रों में है।
Verse 14
जो ऊँचे तथा पवित्र हैं।
Verse 15
ऐसे लेखकों (फ़रिश्तों) के हाथों में है।
Verse 16
जो सम्मानित और आदरणीय हैं।[1]
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1. (11-16) इन में क़ुर्आन की महानता को बताया गया है कि यह एक स्मृति (याद दहानी) है। किसी पर थोपने के लिये नहीं आया है। बल्कि वह तो फ़रिश्तों के हाथों में स्वर्ग में एक पवित्र शास्त्र के अन्दर सूरक्षित है। और वहीं से वह (क़ुर्आन) इस संसार में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा जा रहा है।
Verse 17
इन्सान मारा जाये, वह कितना कृतघ्न (नाशुक्रा) है।
Verse 18
उसे किस वस्तु से (अल्लाह) ने पैदा किया?
Verse 19
उसे वीर्य से पैदा किया, फिर उसका भाग्य बनाया।
Verse 20
फिर उसके लिए मार्ग सरल किया।
Verse 21
फिर मौत दी, फिर समाधि में डाल दिया।
Verse 22
फिर जब चाहेगा, उसे जीवित कर लेगा।
वस्तुतः, उसने उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया।[1]
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1. (17-23) तक विश्वासहीनों पर धिक्कार है कि यदि वह अपने अस्तित्व पर विचार करें कि हम ने कितनी तुच्छ वीर्य की बूँद से उस की रचना की तथा अपनी दया से उसे चेतना और समझ दी। परन्तु इन सब उपकारों को भूल कर कृतघ्न बना हुआ है, और पूजा उपासना अन्य की करता है।
Verse 24
इन्सान अपने भोजन की ओर ध्यान दे।
Verse 25
हमने मूसलाधार वर्षा की।
Verse 26
फिर धरती को चीरा फाड़ा।
Verse 27
फिर उससे अन्न उगाया।
Verse 28
तथा अंगूर और तरकारियाँ।
Verse 29
तथा ज़ैतून एवं खजूर।
Verse 30
तथा घने बाग़।
Verse 31
एवं फल तथा वनस्पतियाँ।
Verse 32
तुम्हारे तथा तुम्हारे पशुओं के लिए।[1]
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1. (24-32) इन आयतों में इन्सान के जीवन साधनों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अल्लाह की अपार दया की परिचायक हैं। अतः जब सारी व्यवस्था वही करता है तो फिर उस के इन उपकारों पर इन्सान के लिये उचित था कि उसी की बात माने और उसी के आदेशों का पालन करे जो क़ुर्आन के माध्यम से अन्तिम नबी मूह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म) द्वारा परस्तुत किया जा रहा है। (दावतुल क़ुर्आन)
Verse 33
तो जब कान फाड़ देने वाली (प्रलय) आ जायेगी।
उस दिन इन्सान अपने भाई से भागेगा।
Verse 35
तथा अपने माता और पिता से।
Verse 36
एवं अपनी पत्नी तथा अपने पुत्रों से।
प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन अपनी पड़ी होगी।
Verse 38
उस दिन बहुत से चेहरे उज्ज्वल होंगे।
Verse 39
हंसते एवं प्रसन्न होंगे।
Verse 40
तथा बहुत-से चेहरों पर धूल पड़ी होगी।
Verse 41
उनपर कालिमा छाई होगी।
Verse 42
वही काफ़िर और कुकर्मी लोग हैं।[1]
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1. (33-42) इन आयतों का भावार्थ यह है कि संसार में किसी पर कोई आपदा आती है तो उस के अपने लोग उस की सहायता और रक्षा करते हैं। परन्तु प्रलय के दिन सब को अपनी अपनी पड़ी होगी और उस के कर्म ही उस की रक्षा करेंगे।
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