سورة الصافات

الترجمة الهندية

الترجمة الهندية से الهندية में सूरह الصافات का अनुवाद

الترجمة الهندية

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مجمع الملك فهد

Verse 1
शपथ है पंक्तिवध्द (फ़रिश्तों) की!
Verse 2
फिर झिड़कियाँ देने वालों की!
Verse 3
फिर स्मरण करके पढ़ने वालों[1] की!
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1. यह तीनों गुण फ़रिश्तों के हैं जो आकाशों में अल्लाह की इबादत के लिये पंक्तिवध्द रहते तथा बादलों को हाँकते और अल्लाह के स्मरण जैसे क़ुर्आन तथा नमाज़ पढ़ने और उस की पवित्रता का गान करने इत्यादि में लगे रहते हैं।
Verse 4
निश्चय तुम्हारा पूज्य, एक ही है।
आकाशों तथा धरती का पालनहार तथा जो कुछ उनके मध्य है और सुर्योदय होने के स्थानों का रब।
हमने अलंकृत किया है संसार (समीप) के आकाश को, तारों की शोभा से।
तथा रक्षा करने के लिए प्रत्येक उध्दत शैतान से।
वह नहीं सुन सकते (जाकर) उच्च सभा तक फ़रिश्तों की बात तथा मारे जाते हैं, प्रत्येक दिशा से।
राँदने के लिए तथा उनके लिए स्थायी यातना है।
परन्तु, जो ले उड़े कुछ, तो पीछा करती है उसका दहकती ज्वाला।[1]
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1. फिर यदि उस से बचा रह जाये तो आकाश की बात अपने नीचे के शैतानों तक पहूँचाता है और वह उसे काहिनों तथा ज्योतिषियों को बताते हैं। फिर वह उस में सौ झूठ मिला कर लोगों को बताते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6213, सह़ीह़ मुस्लिमः2228)
तो आप इन (काफ़िरों) से प्रश्न करें कि क्या उन्हें पैदा करना अधिक कठिन है या जिन्हें[1] हमने पैदा किया है? हमने उन्हें[2] पैदा किया है, लेसदार मिट्टी से।
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1. अर्थात फ़रिश्तों तथा आकाशों को। 2. उन के पिता आदम (अलैहिस्सलाम) को।
Verse 12
बल्कि आपने आश्चर्य किया (उनके अस्वीकार पर) तथा वे उपहास करते हैं।
Verse 13
और जब शिक्षा दी जाये, तो वे शिक्षा ग्रहण नहीं करते।
Verse 14
और जब देखते हैं कोई निशानी, तो उपहास करने लगते हैं।
तथा कहते हें कि ये तो मात्र खुला जादू है।
(कहते हैं कि) क्या, जब हम मर जायेंगे तथा मिट्टी और हड्डियाँ हो जायेंगे, तो हम निश्चय पुनः जीवित किये जायेंगे?
Verse 17
और क्या, हमारे पहले पूर्वज भी (जीवित किये जायेंगे)?
Verse 18
आप कह दें कि हाँ तथा तुम अपमानित (भी) होगे!
वो तो बस एक झिड़की होगी, फिर सहसा वे देख रहे होंगे।
तथा कहेंगेः हाय हमारा विनाश! ये तो बदले (प्रलय) का दिन है।
यही निर्णय का दिन है, जिसे तुम झुठला रहे थे।
(आदेश होगा कि) घेर लाओ सब अत्याचारियों को तथा उनके साथियों को और जिसकी वे इबादत (वंदना) कर रहे थे।
अल्लाह के सिवा। फिर दिखा दो उन्हें नरक की राह।
Verse 24
और उन्हें रोक[1] लो। उनसे प्रश्न किया जाये।
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1. नरक में झोंकने से पहले।
Verse 25
क्या हो गया है तुम्हें कि एक-दूसरे की सहायता नहीं करते?
Verse 26
बल्कि वे उस दिन, सिर झुकाये खड़े होंगे।
और एक-दूसरे के सम्मुख होकर परस्पर प्रश्न करेंगेः[1]
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1. अर्थात एक-दूसरे को धिक्कारेंगे।
कहेंगे कि तुम हमारे पास आया करते थे दायें[1] से।
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1. इस से अभिप्राय यह है कि धर्म तथा सत्य के नाम से आते थे अर्थात यह विश्वास दिलाते थे कि यही मिश्रणवाद मूल तथा सत्धर्म है।
वे[1] कहेंगेः बल्कि तुम स्वयं ईमान वाले न थे।
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1. इस से अभिप्राय उन के प्रमुख लोग हैं।
तथा नहीं था हमारा तुमपर कोई अधिकार,[1] बल्कि तुम सवंय अवज्ञाकारी थे।
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1. देखियेः सूरह इब्राहीम, आयतः22
तो सिध्द हो गया हमपर हमारे पालनहार का कथन कि हम (यातना) चखने वाले हैं।
Verse 32
तो हमने तुम्हें कुपथ कर दिया। हम तो स्वयं कुपथ थे।
फिर वे सभी, उस दिन यातना में साझी होंगे।
Verse 34
हम, इसी प्रकार, किया करते हैं अपराधियों के साथ।
ये वो हैं कि जब कहा जाता था उनसे कि कोई पूज्य (वंदनीय) नहीं अल्लाह के अतिरिक्त, तो वे अभिमान करते थे।
तथा कह रहे थेः क्या हम त्याग देने वाले हैं अपने पूज्यों को, एक उन्मत कवि के कारण?
बल्कि वह (नबी) सच लाये हैं तथा पुष्टि की है, सब रसूलों की।
Verse 38
निश्चय तुम दुःखदायी यातना चखने वाले हो।
तथा तुम उसका प्रतिकार (बदला) दिये जाओगे, जो तुम कर रहे थे।
Verse 40
परन्तु अल्लाह के शुध्द भक्त।
Verse 41
यही हैं, जिनके लिए विदित जीविका है।
Verse 42
प्रत्येक प्रकार के फल तथा यही आदरणीय होंगे।
Verse 43
सुख के स्वर्गों में।
Verse 44
आसनों पर एक-दूसरे के सम्मुख असीन होंगे।
फिराये जायेंगे इनपर प्याले, प्रवाहित पेय के।
Verse 46
श्वेत आस्वात पीने वालों के लिए।
नहीं होगी उसमें शारिरिक पीड़ा, न वे उसमें बहकेंगे।
Verse 48
तथा उनके पास आँखे झुकाये, (सति) बड़ी आँखों वाली (नारियाँ) होंगी।
Verse 49
वह छुपाये हुए अन्डों के मानिन्द होंगी।[1]
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1. अर्थात जिस प्रकार पक्षी के पंखों के नीचे छुपे हुये अन्डे सुरक्षित होते हैं वैसे ही वह नारियाँ सुरक्षित, सुन्दर रंग और रूप की होंगी।
वह एक-दूसरे से सम्मुख होकर प्रश्न करेंगे।
तो कहेगा एक कहने वाला उनमें सेः मेरा एक साथी था।
Verse 52
जो कहता था कि क्या तुम (प्रलय का) विश्वास करने वालों में से हो?
क्या जब हम, मर जायेंगे तथा मिट्टी और अस्थियाँ हो जायेंगे, तो क्या हमें (कर्मों) का प्रतिफल दिया जायेगा?
Verse 54
वह कहेगाः क्या तुम झाँककर देखने वाले हो?
फिर झाँकते ही उसे देख लेगा, नरक के बीच।
उससे कहेगाः अल्लाह की शपथ! तुम तो मेरा विनाश कर देने के समीप थे।
और यदि मेरे पालनहार का अनुग्रह न होता, तो मैं (नरक के) उपस्थितों में होता।
Verse 58
फिर वह कहेगाः क्या (ये सही नहीं है कि) हम मरने वाले नहीं हैं?
सिवाय अपनी प्रथम मौत के और न हमें यातना दी जायेगी।
वास्तव में, यही बड़ी सफलता है।
Verse 61
इसी (जैसी सफलता) के लिए चाहिये कि कर्म करें, कर्म करने वाले।
क्या ये आतिथ्य उत्तम है अथवा थोहड़ का वृक्ष?
Verse 63
हमने उसे अत्याचारियों के लिए एक परीक्षा बनाया है।
वह एक वृक्ष है, जो नरक की जड़ (तह) से निकलता है।
Verse 65
उसके गुच्छे शैतानों के सिरों के समान हैं।
तो वे (नरक वासी) खाने वाले हैं, उससे। फिर भरने वाले हैं, उससे अपने पेट।
फिर उनके लिए उसके ऊपर से खौलता गरम पानी है।
फिर उन्हें प्रत्यागत होना है, नरक की ओर।
Verse 69
वास्तव में, उन्होंने पाया अपने पूर्वजों को कुपथ।
Verse 70
फिर वे उन्हीं के पद्चिन्हों पर[1] दौड़े चले जा रहे हैं।
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1. इस में नरक में जाने का जो सब से बड़ा कारण बताया गया है वह है नबी को न मानना, और अपने पूर्वजों के पंथ पर ही चलते रहना।
और कुपथ हो चुके हैं, इनसे पूर्व अगले लोगों में से अधिक्तर।
Verse 72
तथा हम भेज चुके हैं उनमें, सचेत (सावधान) करने वाले।
तो देखो कि कैसा रहा सावधान किये हुए लोगों का परिणाम?[1]
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1. अतः उन के दुष्परिणाम से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
Verse 74
हमारे शुध्द भक्तों के सिवा।
तथा हमें पुकारा नूह़ नेः तो हम क्या ही अच्छे प्रार्थना स्वीकार करने वाले हैं।
और हमने बचा लिया उसे और उसके परिजनों को, घोर आपदा से।
Verse 77
तथा कर दिया हमने उसकी संतति को, शेष[1] रह जाने वालों में से।
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1. उस की जाति के जलमग्न हो जाने के पश्चात्।
Verse 78
तथा शेष रखा हमने उसकी सराहना तथा प्रशंसा को पिछलों में।
सलाम (सुरक्षा)[1] है नूह़ के लिए समस्त विश्ववासियों में।
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1. अर्थात उस की बुरी चर्चा से।
Verse 80
इसी प्रकार, हम प्रतिफल प्रदान करते हैं सदाचारियों को।
Verse 81
वास्तव में, वह हमारे ईमान वाले भक्तों में से था।
Verse 82
फिर हमने जलमगन कर दिया दूसरों को।
और उसके अनुयायियों में निश्चय इब्राहीम है।
जब लाया वह अपने पालनहार के पास स्वच्छ दिल।
जब कहा उसने अपने पिता तथा अपनी जाति सेः तुम किसकी इबादत (वंदना) कर रहे हो?
क्या अपने बनाये हुए पूज्यों को अल्लाह के सिवा चाहते हो?
Verse 87
तो तुम्हारा क्या विचार है, विश्व के पालनहार के विषय में?
Verse 88
फिर उसने देखा तोरों की[1] ओर।
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1. यह सोचते हुये कि इन के उत्सव में न जाने के लिये क्या बहाना करूँ।
Verse 89
तथा उनसे कहाः मैं रोगी हूँ।
Verse 90
तो उसे छोड़कर चले गये।
फिर वह जा पहुँचा, उनके उपास्यों (पूज्यों) की ओर। कहा कि (वे प्रसाद) क्यों नहीं खाते?
Verse 92
तुम्हें क्या हुआ है कि बोलते नहीं?
Verse 93
फिर पिल पड़ा उनपर मारते हुए, दायें हाथ से।
Verse 94
तो वे आये उसकी ओर दौड़ते हुए।
Verse 95
इब्राहीम ने कहाः क्या तुम इबादत (वंदना) करते हो उसकी जिसे, पत्थरों से तराश्ते हो?
Verse 96
जबकि अल्लाह ने पैदा किया है तुम्हें तथा जो तुम करते हो।
उन्होंने कहाः इसके लिए एक (अग्निशाला का) निर्माण करो और उसे झोंक दो दहकती अग्नि में।
तो उन्होंने उसके साथ षड्यंत्र रचा, तो हमने उन्हीं को नीचा कर दिया।
तथा उसने कहाः मैं जाने वाला हूँ अपने पालनहार की[1] ओर। वह मुझे सुपथ दर्शायेगा।
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1. अर्थात ऐसे स्थान की ओर जहाँ अपने पालनहार की इबादत कर सकूँ।
Verse 100
हे मेरे पालनहार! प्रदान कर मुझे, एक सदाचारी (पुनीत) पुत्र।
Verse 101
तो हमने शुभ सूचना दी उसे, एक सहनशील पुत्र की।
फिर जब वह पहुँचा उसके साथ चलने-फिरने की आयु को, तो इब्राहीम ने कहाः हे मेरे प्रिय पुत्र! मैं देख रहा हूँ स्वप्न में कि मैं तुझे वध कर रहा हूँ। अब, तू बता कि तेरा क्या विचार है? उसने कहाः हे पिता! पालन करें, जिसका आदेश आपको दिया जा रहा है। आप पायेंगे मुझे सहनशीलों में से, यदि अल्लाह की इच्छा हूई।
Verse 103
अन्ततः, जब दोनों ने स्वयं को अर्पित कर दिया और उस (पिता) ने उसे गिरा दिया माथे के बल।
Verse 104
तब हमने उसे आवाज़ दी कि हे इब्राहीम!
तूने सच कर दिया अपना स्वप्न। इसी प्रकार, हम प्रतिफल प्रदान करते हैं सदाचारियों को।
Verse 106
वास्तव में, ये खुली परीक्षा थी।
Verse 107
और हमने उसके मुक्ति-प्रतिदान के रूप में, प्रदान कर दी एक महान[1] बली।
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1. यह महान बलि एक मेंढा था। जिसे जिब्रील (अलाहिस्सलाम) द्वारा स्वर्ग से भेजा गया। जो आप के प्रिय पुत्र इस्माईल (अलैहिस्सलाम) के स्थान पर बलि दिया गया। फिर इस विधि को प्रलय तक के लिये अल्लाह के सामिप्य का एक साधन तथा ईदुल अज़्ह़ा (बक़रईद) का प्रियवर कर्म बना दिया गया। जिसे संसार के सभी मुसलमान ईदुल अज़्ह़ा में करते हैं।
Verse 108
तथा हमने शेष रखी उसकी शुभ चर्चा पिछलों में।
Verse 109
सलाम है इब्रीम पर।
Verse 110
इसी प्रकार, हम प्रतिफल प्रदान करते हैं सदाचारियों को।
Verse 111
निश्चय ही वह हमारे ईमान वाले भक्तों में से था।
Verse 112
तथा हमने उसे शुभसूचना दी इस्ह़ाक़ नबी की, जो सदाचारियों में[1] होगा।
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1. इस आयत से विद्वत होता है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को इस बलि के पश्चात् दूसरे पुत्र आदरणीय इस्ह़ाक़ की शुभ सूचना दी गई। इस से ज्ञान हुआ की बलि इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की दी गई थी। और दोनों की आयु में लग-लग चौदह वर्ष का अन्तर है।
तथा हमने बरकत (विभूति) अवतरिक की उसपर तथा इस्ह़ाक़ पर और उन दोनों की संतति में से कोई सदाचारी है और कोई अपने लिए खुला अत्याचारी।
Verse 114
तथा हमने उपकार किया मूसा और हारून पर।
Verse 115
तथा मुक्त किया दोनों को और उनकी जाति को, घोर व्यग्रता से।
Verse 116
तथा हमने सहायता की उनकी, तो वही प्रभावशाली हो गये।
Verse 117
तथा हमने प्रदान की दोनों को प्रकाशमय पुस्तक (तौरात)।
Verse 118
और हमने दर्शाई दोनों को सीधी डगर।
Verse 119
तथा शेष रखी दोनों की शुभ चर्चा, पिछलों में।
Verse 120
सलाम है मूसा तथा हारून पर।
Verse 121
हम इसी प्रकार प्रतिफल प्रदान करते हैं, सदाचारियों को।
Verse 122
वस्तुतः, वे दोनों हमारे ईमान वाले भक्तों में थे।
Verse 123
तथा निश्चय इल्यास, नबियों में से था।
Verse 124
जब कहा उसने अपनी जाति सेः क्या तुम डरते नहीं हो?
Verse 125
क्या तुम बअल ( नामक मूर्ति) को पुकारते हो? तथा त्याग रहे हो सर्वोत्तम उत्पत्तिकर्ता को?
Verse 126
अल्लाह ही तुम्हारा पालनहार है तथा तुम्हारे प्रथम पूर्वजों का पालनहार है।
Verse 127
अन्ततः, उन्होंने झुठला दिया उसे। तो निश्चय वही (नरक में) उपस्थित होंगे।
Verse 128
किन्तु, अल्लाह के शुध्द भक्त।
Verse 129
तथा शेष रखी हमने उसकी शुभ चर्चा पिछलों में।
Verse 130
सलाम है इल्यासीन[1] पर।
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1. इल्यासीन इल्यास ही का एक उच्चारण है। उन्हें अन्य धर्म ग्रन्थों में इलया भी कहा गया है।
Verse 131
वास्तव में, हम इसी प्रकार प्रतिफल प्रदान करते हैं, सदाचारियों को।
Verse 132
वस्तुतः, वह हमारे ईमान वाले भक्तों में से था।
Verse 133
तथा निश्चय लूत नबियों में से था।
Verse 134
जब हमने मुक्त किया उसे तथा उसके सबपरिजनों को।
Verse 135
एक बुढ़िया[1] के सिवा, जो पीछे रह जाने वालों में थी।
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1. यह लूत (अलैहिस्सलाम) की काफ़िर पत्नि थी।
Verse 136
फिर हमने अन्यों को तहस-नहस कर दिया।
Verse 137
तथा तुम[1] ग़ुज़रते हो उन (की निर्जीव बस्तियों) पर, प्रातः के समय।
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1. मक्का वासियों को संबोधित किया गया है।
Verse 138
तथा रात्रि में। तो क्या तुम समझते नहीं हो?
Verse 139
तथा निश्चय यूनुस नबियों में से था।
Verse 140
जब वह भाग[1] गया भरी नाव की ओर।
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1. अल्लाह की अनुमति के बिना अपने नगर से नगर वासियों को यातना के आन की सूचना दे कर निकल गये। और नाव पर सवार हो गये। नाव सागर की लहरों में घिर गई। इस लिये बोझ कम करने के लिये नाम निकाला गया। तो यूनुस अलैहिस्सलाम का नाम निकला और उन्हें समुद्र में फेंक दिया गया।
Verse 141
फिर नाम निकाला गया, तो वह हो गया फेंके हुओं में से।
Verse 142
तो निगल लिया उसे मछली ने और वह निन्दित था।
Verse 143
तो यदि न होता अल्लाह की पवित्रता का वर्णन करने वालों में।
तो वह रह जाता उसके उदर में उस दिन तक, जब सब पुनः जीवित किये[1] जायेंगे।
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1. अर्थात प्रयल के दिन तक। (देखियेः सूरह अम्बिया, आयतः87)
Verse 145
तो हमने फेंक दिया उसे खुले मैदान में और वह रोगी[1] था।
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1. अर्थात निर्बल नवजात शिशु के समान।
Verse 146
और उगा दिया उस[1] पर लताओं का एक वृक्ष।
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1. रक्षा के लिये।
तथा हमने उसे रसूल बनाकर भेजा एक लाख, बल्कि अधिक की ओर।
Verse 148
तो वे ईमान लाये। फिर हमने उन्हें सुख-सुविधा प्रदान की एक समय[1] तक।
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1. देखियेः सूरह यूनुस।
Verse 149
तो (हे नबी!) आप उनसे प्रश्न करें कि क्या आपके पालनहार के लिए तो पुत्रियाँ हों और उनके लिए पुत्र?
अथवा किया हमने पैदा किया है फ़रिश्तों को नारियाँ और वे उस समय उपस्थित[1] थे?
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1. इस में मक्का के मिश्रणवादियों का खण्डन किया जा रहा है जो फ़रिश्तों को देवियाँ तथा अल्लाह की पुत्रियाँ कहते थे। जब कि वह स्वयं पुत्रियों के जन्म को अप्रिय मानते थे।
Verse 151
सावधान! वास्तव में, वे अपने मन से बनाकर ये बात कह रहे हैं।
Verse 152
कि अल्लाह ने संतान बनाई है और निश्चय ये मिथ्या भाषी हैं।
Verse 153
क्या अल्लाह ने प्राथमिक्ता दी है पुत्रियों को, पुत्रों पर?
Verse 154
तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसा निर्णय दे रहे हो?
Verse 155
तो क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते?
Verse 156
अथवा तुम्हारे पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण है?
Verse 157
तो अपनी पुस्तक लाओ, यदि तुम सत्यवादी हो?
और उन्होंने बना दिया अल्लाह तथा जिन्नों के मध्य, वंश-संबंध। जबकि जिन्न स्वयं जानते हैं कि वे अल्लाह के समक्ष निश्चय उपस्थित किये[1] जायेंगे।
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1. अर्थात यातना के लिये। तो यदि वे उस के संबंधी होते तो उन्हें यातना क्यों देता?
Verse 159
अल्लाह पवित्र है उन गुणों से, जिनका वे वर्णन कर रहे हैं।
Verse 160
परन्तु, अल्लाह के शुध्द भक्त।[1]
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1. वह अल्लाह को ऐसे दुर्गुणों से युक्त नहीं करते।
Verse 161
तो निश्चय तुम तथा तुम्हारे पूज्य।
Verse 162
तुम सब किसी एक को भी कुपथ नहीं कर सकते।
Verse 163
उसके सिवा, जो नरक में झोंका जाने वाला है।
और नहीं है हम (फ़रिश्तों) में से कोई, परन्तु उसका एक नियमित स्थान है।
Verse 165
तथा हम ही (आज्ञापालन के लिए) पंक्तिवध्द हैं।
Verse 166
और हम ही तस्बीह़ (पवित्रता गान) करने वाले हैं।
Verse 167
तथा वे (मुश्रिक) तो कहा करते थे किः
यदि हमारे पास कोई स्मृति (पुस्तक) होती, जो पहले लोगों में आई......
Verse 169
तो हम अवश्य अल्लाह के शुध्द भक्तों में हो जाते।
Verse 170
(फिर जब आ गयी) तो उन्होंने क़ुर्आन के साथ कुफ़्र कर दिया, अतः, शीघ्र ही उन्हें ज्ञान हो जायेगा।
Verse 171
और पहले ही हमारा वचन हो चुका है अपने भेजे हुए भक्तों के लिए।
Verse 172
कि निश्चय उन्हीं की सहायता की जायेगी।
Verse 173
तथा वास्तव में हमारी सेना ही प्रभावशाली (विजयी) होने वाली है।
Verse 174
तो आप मुँह फेर लें उनसे, कुछ समय तक।
Verse 175
तथा उन्हें देखते रहें। वे भी शीघ्र ही देख लेंगे।
Verse 176
तो क्या, वे हमारी यातना की शीघ्र माँग कर रहे हैं।
तो जब वह उतर आयेगी उनके मैदानों में, तो बुरा हो जायेगा सावधान किये हुओं का सवेरा।
Verse 178
और आप मुँह फेर लें उनसे, कुछ समय तक।
Verse 179
तथा देखते रहें, अन्ततः वे (भी) देख लेंगे।
पवित्र है आपका पालनहार, गौरव का स्वामी, उस बात से, जो वे बना रहे हैं।
Verse 181
तथा सलाम है रसूलों पर।
Verse 182
तथा सभी प्रशंसा, अल्लाह, सर्वलोक के पालनहार के लिए है।
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