سورة القيامة

الترجمة الهندية

الترجمة الهندية से الهندية में सूरह القيامة का अनुवाद

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مجمع الملك فهد

Verse 1
मैं शपथ लेता हूँ क़्यामत (प्रलय) के दिन[1] की!
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1. किसी चीज़ की शपथ लेने का अर्थ होता है उस का निश्चित् होना। अर्थात प्रलय का होना निश्चित् है।
Verse 2
तथा शपथ लेता हूँ निन्दा[1] करने वाली अन्तरात्मा की।
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1. मनुष्य के अन्तरात्मा की यह विशेषता है कि वह बुराई करने पर उस की निन्दा करती है।
क्या मनुष्य समझता है कि हम एकत्र नहीं कर सकेंगे दोबारा उसकी अस्थियों को?
क्यों नहीं? हम सामर्थ्वान हैं इस बात पर कि सीधी कर दें, उसकी उंगलियों की पोर-पोर।
बल्कि मनुष्य चाहता है कि वह कुकर्म करता रहे अपने आगे[1] भी।
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1. अर्थात वह प्रलय तथा ह़िसाब का इन्कार इस लिये करता है ताकि वह पूरी आयु कुकर्म करता रहे।
Verse 6
वह प्रश्न करता है कि कब आना है प्रलय का दिन?
Verse 7
तो जब चुंधिया जायेगी आँख।
Verse 8
और गहना जायेगा चाँद।
Verse 9
और एकत्र कर दिये[1] जायेंगे सूर्य और चाँद।
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1. अर्थात दोनों पश्चिम से अन्धेरे हो कर निकलेंगे।
कहेगा मनुष्य उस दिन कि कहाँ है भागने का स्थान?
Verse 11
कदापि नहीं, कोई शरणागार नहीं।
Verse 12
तेरे पालनहार की ओर ही उस दिन जाकर रुकना है।
सूचित कर दिया जायेगा मनुष्य को उस दिन उससे, जो उसने आगे भेजा तथा जो पीछे[1] छोड़ा।
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1. अर्थात संसार में जो कर्म किया। और जो करना चाहिये था फिर भी नहीं किया।
बल्कि मनुष्य स्वयं अपने विरुध्द एक खुला[1] प्रमाण है।
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1. अर्थात वह अपने अपराधों को स्वयं भी जानता है क्योंकि पापी का मन स्वयं अपने पाप की गवाही देता है।
Verse 15
चाहे वह कितने ही बहाने बनाये।
हे नबी! आप न हिलायें[1] अपनी ज़ुबान, ताकि शीघ्र याद कर लें इस क़ुर्आन को।
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1. ह़दीस में है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फ़रिश्ते जिब्रील से वह़्यी पूरी होने से पहले इस भय से उसे दुहराने लगते कि कुछ भूल न जायें। उसी पर यह आयत उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4928, 4929) इसी विषय को सूरह ताहा तथा सूरह आला में भी दुहराया गया है।
Verse 17
निश्चय हमपर है उसे याद कराना और उसे पढ़ाना।
Verse 18
अतः, जब हम उसे पढ़ लें, तो आप उसके पीछे पढ़ें।
Verse 19
फिर हमारे ही ऊपर है, उसका अर्थ बताना।
Verse 20
कदापि नहीं[1], बल्कि तुम प्रेम करते हो शीघ्र प्राप्त होने वाली चीज़ (संसार) से।
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1. यहाँ से बात फिर काफ़िरों की ओर फिर रही है।
Verse 21
और छोड़ देते हो परलोक को।
Verse 22
बहुत-से मुख उस दिन प्रफुल्ल होंगे।
Verse 23
अपने पालनहार की ओर देख रहे होंगे।
Verse 24
और बहुत-से मुख उदास होंगे।
वह समझ रहे होंगे कि उनके साथ कड़ा व्यवहार किया जायेगा।
Verse 26
कदापि नहीं[1], जब पहुँचेगी प्राण हंसलियों (गलों) तक।
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1. अर्थात यह विचार सह़ीह़ नहीं कि मौत के पश्चात् सड़-गल जायेंगे और दोबारा जीवित नहीं किये जायेंगे। क्योंकि आत्मा रह जाती है जो मौत के साथ ही अपने पालनहार की ओर चली जाती है।
Verse 27
और कहा जायेगाः कौन झाड़-फूँक करने वाला है?
Verse 28
और विश्वास हो जायेगा कि ये (संसार से) जुदाई का समय है।
Verse 29
और मिल जायेगी पिंडली, पिंडली[1] से।
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1. अर्थात मौत का समय आ जायेगा जो निरन्तर दुःख का समय होगा। (इब्ने कसीर)
Verse 30
तेरे पालनहार की ओर उसी दिन जाना है।
Verse 31
तो न उसने सत्य को माना और न नमाज़ पढ़ी।
Verse 32
किन्तु झुठलाया और मुँह फेर लिया।
फिर, गया अपने परिजनों की ओर अकड़ता हआ।
Verse 34
शोक है तेरे लिए, फिर शोक है।
Verse 35
फिर शोक है तेरे लिए, फिर शोक है।
क्या मनुष्य समझता है कि वह छोड़ दिया जायेगा व्यर्थ?[1]
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1. अर्थात न उसे किसी बात का आदेश दिया जायेगा और न रोका जायेगा और न उस से कर्मों का ह़िसाब लिया जायेगा।
क्या वह नहीं था वीर्य की बूंद, जो (गर्भाशय में) बूँद-बूँद गिराई जाती है।?
फिर वह बंधा रक्त हुआ, फिर अल्लाह ने उसे पैदा किया और उसे बराबर बनाया।
फिर उसका जोड़ाः नर और नारी बनाया।
तो क्या वह सामर्थ्यवान नहीं कि मुर्दों को जीवित कर दे?
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