سورة المطففين

الترجمة الهندية

الترجمة الهندية से الهندية में सूरह المطفّفين का अनुवाद

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مجمع الملك فهد

Verse 1
विनाश है डंडी मारने वालों का।
जो लोगों से नाप कर लें,, तो पूरा लेते हैं।
और जब उन्हें नाप या तोल कर देते हैं, तो कम देते हैं।
क्या वे नहीं सोचते कि फिर जीवित किये जायेंगे?
Verse 5
एक भीषण दिन के लिए।
जिस दिन सभी, विश्व के पालनहार के सामने खड़े होंगे।[1]
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1. (1-6) इस सूरह की प्रथम छः आयतों में इसी व्यवसायिक विश्वास घात पर पकड़ की गई है कि न्याय तो यह है कि अपने लिये अन्याय नहीं चाहते तो दूसरों के साथ न्याय करो। और इस रोग का निवारण अल्लाह के भय तथा परलोक पर विश्वास ही से हो सकता है। क्योंकि इस स्थिति में निक्षेप (अमानतदारी) एक नीति ही नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य होगा औ इस पर स्थित रहना लाभ तथा हानि पर निर्भर नहीं रहेगा।
कदापि ऐसा न करो, निश्चय बुरों का कर्म पत्र "सिज्जीन" में है।
Verse 8
और तुम क्या जानो कि "सिज्जीन" क्या है?
Verse 9
वह लिखित महान पुस्तक है।
Verse 10
उस दिन झुठलाने वालों के लिए विनाश है।
Verse 11
जो प्रतिकार (बदले) के दिन को झुठलाते हैं।
तथा उसे वही झुठलाता है, जो महा अत्याचारी और पापी है।
जब उनके सामने हमारी आयतों का अध्ययन किया जाता है, तो कहते हैं: पूर्वजों की कल्पित कथायें हैं।
सुनो! उनके दिलों पर कुकर्मों के कारण लोहमल लग गया है।
निश्चय वे उस दिन अपने पालनहार (के दर्शन) से रोक दिये जायेंगे।
Verse 16
फिर वे नरक में जायेंगे।
फिर कहा जायेगा कि यही है, जिसे तुम मिथ्या मानते थे।[1]
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1. (7-17) इन आयतों में कुकर्मियों के दुषपरिणाम का विवरण दिया गया है। तथा यह बताया गया है कि उन के कुकर्म पहले ही से अपराध पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं। तथा वे परलोक में कड़ी यातना का सामना करेंगे। और नरक में झोंक दिये जायेंगे। "सिज्जीन" से अभिप्राय, एक जगह है जहाँ पर काफ़िरों, अत्याचारियों और मुश्रिकों के कुकर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। दिलों का लोहमल, पापों की कालिमा को कहा गया है। पाप अन्तरात्मा को अन्धकार बना देते हैं तो सत्य को स्वीकार करने की स्वभाविक योग्यता खो देते हैं।
सच ये है कि सदाचारियों के कर्म पत्र "इल्लिय्यीन" में हैं।
Verse 19
और तुम क्या जानो कि "इल्लिय्यीन" क्या है?
Verse 20
एक अंकित पुस्तक है।
Verse 21
जिसके पास समीपवर्ती (फरिश्ते) उपस्थित रहते हैं।
Verse 22
निशचय, सदाचारी आनन्द में होंगे।
Verse 23
सिंहासनों के ऊपर बैठकर सब कुछ देख रहे होंगे।
तुम उनके मुखों से आनंद के चिन्ह अनुभव करोगे।
Verse 25
उन्हें मुहर लगी शुध्द मदिरा पिलाई जायेगी।
ये मुहर कस्तूरी की होगी। तो इसकी अभिलाषा करने वालों को इसकी अभिलाषा करनी चाहिये।
Verse 27
उसमें तसनीम मिली होगी।
Verse 28
वह एक स्रोत है, जिससे अल्लाह के समीपवर्ती पियेंगे।[1]
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1. (18-28) इन आयतों में बताया गया है कि सदाचारियों के कर्म ऊँचे पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं जो फ़रिश्तों के पास सुरक्षित हैं। और वे स्वर्ग में सुख के साथ रहेंगे। "इल्लिय्यीन" से अभिप्राय, जन्नत में एक जगह है। जहाँ पर नेक लोगों के कर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। वहाँ पर समीपवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।
पापी (संसार में) ईमान लाने वालों पर हंसते थे।
Verse 30
और जब उनके पास से गुज़रते, तो आँखें मिचकाते थे।
और जब अपने परिवार में वापस जाते, तो आनंद लेते हुए वापस होते थे।
और जब उन्हें (मोमिनों को) देखते, तो कहते थेः यही भटके हुए लोग हैं।
Verse 33
जबकि वे उनके निरीक्षक बनाकर नहीं भेजे गये थे।
तो जो ईमान लाये, आज काफ़िरों पर हंस रहे हैं।
Verse 35
सिंहासनों के ऊपर से उन्हें देख रहे हैं।
क्या काफ़िरों (विश्वास हीनों) को उनका बदला दे दिया गया?[1]
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1. (29-36) इन आयतों में बताया गया है कि परलोक में कर्मों का फल दिया जायेगा तो संसारिक परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। संसार में तो सब के लिये अल्लाह की दया है, परन्तु न्याय के दिन जो अपने सुख सुविधा पर गर्व करते थे और जिन निर्धन मुसलमानों को देख कर आँखें मारते थे, वहाँ पर वही उन के दुष्परिणाम को देख कर प्रसन्न होंगे। अंतिम आयत में विश्वास हीनों के दुष्परिणाम को उन का कर्म कहा गया है। जिस में यह संकेत है कि सुफल और कुफल स्वयं इन्सान के अपने कर्मों का स्वभाविक प्रभाव होगा।
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