الترجمة الهندية से الهندية में सूरह الرّوم का अनुवाद
Verse 1
ﮫ
ﮬ
अलिफ, लाम, मीम।
Verse 2
ﮭﮮ
ﮯ
पराजित हो गये रूमी।
Verse 3
समीप की धरती में और वे अपने पराजित होने के पश्चात् जल्द ही विजयी हो जायेंगे!
Verse 4
कुछ वर्षों में, अल्लाह ही का अधिकार है पहले (भी) और बाद में (भी) और उस दिन प्रसन्न होंगे ईमान वाले।
Verse 5
अल्लाह की सहायता से तथा वही अति प्रभुत्वशाली, दयावान् है।
Verse 6
ये अल्लाह का वचन है, नहीं विरुध्द करेगा अल्लाह अपने वचन[1] के और परन्तु अधिक्तर लोग ज्ञान नहीं रखते।
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1. इन आयतों के अन्दर दो भविष्वाणियाँ की गई हैं। जो क़ुर्आन शरीफ़ तथा स्वयं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सत्य होने का ऐतिहासिक प्रमाण है। यह वह यूग था जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और मक्का के क़ुरैश के बीच युध्द आरंभ हो गया था। रूम के राजा क़ैसर को उस समय, ईरान के राजा किस्रा ने पराजित कर दिया था। जिस से मक्का वासी प्रसन्न थे। क्यों कि वह अग्नि के पुजारी थे। और रूमी ईसाई अकाशीय धर्म के अनुयायी थे। और कह रहे थे कि हम मिश्रणवादी भी इसी प्रकार मुसलमानों को पराजित कर देंगे जिस प्रकार रूमियों को ईरानियों ने पराजय किया। इसी पर यह दो भविष्यवाणी की गई की रूमी कुछ वर्षों में फिर विजयी हो जायेंगे और यह भविष्यवाणी इस के साथ पूरी होगी कि मुसलमान भी उसी समय विजय हो कर प्रसन्न हो रहे होंगे। और ऐसा ही हुआ कि 9 वर्ष के भीतर रूमियों ने ईरानियों को पराजित कर दिया।
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1. इन आयतों के अन्दर दो भविष्वाणियाँ की गई हैं। जो क़ुर्आन शरीफ़ तथा स्वयं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सत्य होने का ऐतिहासिक प्रमाण है। यह वह यूग था जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और मक्का के क़ुरैश के बीच युध्द आरंभ हो गया था। रूम के राजा क़ैसर को उस समय, ईरान के राजा किस्रा ने पराजित कर दिया था। जिस से मक्का वासी प्रसन्न थे। क्यों कि वह अग्नि के पुजारी थे। और रूमी ईसाई अकाशीय धर्म के अनुयायी थे। और कह रहे थे कि हम मिश्रणवादी भी इसी प्रकार मुसलमानों को पराजित कर देंगे जिस प्रकार रूमियों को ईरानियों ने पराजय किया। इसी पर यह दो भविष्यवाणी की गई की रूमी कुछ वर्षों में फिर विजयी हो जायेंगे और यह भविष्यवाणी इस के साथ पूरी होगी कि मुसलमान भी उसी समय विजय हो कर प्रसन्न हो रहे होंगे। और ऐसा ही हुआ कि 9 वर्ष के भीतर रूमियों ने ईरानियों को पराजित कर दिया।
Verse 7
वे तो जानते हैं बस ऊपरी सांसारिक जीवन को तथा[1] वे परलोक से अचेत हैं।
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1. अर्थात सुख-सुविधा और आन्नद को। और वह इस से अचेत हैं कि एक और जीवन भी है जिस में कर्मों के परिणाम सामने आयेंगे। बल्कि यही देखा जाता है कि कभी एक जाति उन्नति कर लेने के पश्चात् असफल हो जाती है।
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1. अर्थात सुख-सुविधा और आन्नद को। और वह इस से अचेत हैं कि एक और जीवन भी है जिस में कर्मों के परिणाम सामने आयेंगे। बल्कि यही देखा जाता है कि कभी एक जाति उन्नति कर लेने के पश्चात् असफल हो जाती है।
Verse 8
क्या और उन्होंने अपने में सोच-विचार नहीं किया कि नहीं उत्पन्न किया है अल्लाह ने आकाशों तथा धरती को और जो कुछ उन[1] दोनों के बीच है, परन्तु सत्यानुसार और एक निश्चित अवधि के लिए? और बहुत-से लोग अपने पालनहार से मिलने का इन्कार करने वाले हैं।
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1. विश्व की व्यवस्था बता रही है कि यह अकारण नहीं, बल्कि इस का कुछ अभिप्राय है।
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1. विश्व की व्यवस्था बता रही है कि यह अकारण नहीं, बल्कि इस का कुछ अभिप्राय है।
Verse 9
क्या वे चले-फिरे नहीं धरती में, फिर देखते कि कैसा रहा उनका परिणाम, जो इनसे पहले थे? वे इनसे अधिक थे शक्ति में। उन्होंने जोता-बोया धरती को और उसे आबाद किया, उससे अधिक, जितना इन्होंने आबाद किया और आये उनके पास उनके रसूल खुली निशानियाँ (प्रमाण) लेकर। तो नहीं था अल्लाह कि उनपर अत्याचार करता और परन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
Verse 10
फिर हो गया उनका बुरा अन्त, जिन्होंने बुराई की, इसलिए कि उन्होंने झूठ कहा अल्लाह की आयतों को और वे उनका उपहास कर रहे थे।
Verse 11
अल्लाह ही उत्पत्ति का आरंभ करता है, फिर उसे दुहरायेगा तथा उसी की ओर, तुम फेरे[1] जाओगे।
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1. अर्थात प्रलय के दिन अपने संसारिक अच्छे-बुरे कामों का प्रतिकार पाने के लिये।
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1. अर्थात प्रलय के दिन अपने संसारिक अच्छे-बुरे कामों का प्रतिकार पाने के लिये।
Verse 12
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ﯢ
और जब स्थापित होगी प्रलय, तो निराश[1] हो जायेंगे अपराधी।
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1. अर्थात अपनी मुक्ति से और चकित हो कर रह जोयेंगे।
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1. अर्थात अपनी मुक्ति से और चकित हो कर रह जोयेंगे।
Verse 13
और नहीं होगा उनके साझियों में उनका अभिस्तावक (सिफ़ारिशी) और वे अपने साझियों का इन्कार करने वाले[1] होंगे।
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1. क्यों कि वह देख लेंगे कि उन्हें सिफ़ारिश करने का कोई अधिकार नहीं होगा। (देखियेः सूरह अन्आम, आयतः23)
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1. क्यों कि वह देख लेंगे कि उन्हें सिफ़ारिश करने का कोई अधिकार नहीं होगा। (देखियेः सूरह अन्आम, आयतः23)
Verse 14
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ﯲ
और जिस दिन स्थापित होगी प्रलय, तो उस दिन सब अलग अलग हो जायेंगे।
Verse 15
तो जो ईमान लाये तथा सदाचार किये, वही स्वर्ग में प्रसन्न किये जायेंगे।
Verse 16
और जिन्होंने क्फ़्र किया और झुठलाया हमारी आयतों को और परलोक के मिलन को, तो वही यातना में उपस्थित किये हुए होंगे।
Verse 17
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ﭣ
अतः, तुम अल्लाह की पवित्रता का वर्णन संध्या तथा सवेरे किया करो।
Verse 18
तथा उसी की प्रशंसा है आकाशों तथा धरती में तीसरे पहर तथा जब दो पहर हो।
Verse 19
वह निकालता है[1] जीवित से निर्जीव को तथा निकालता है निर्जीव से जीव को और जीवित कर देता है धरती को, उसके मरण (सूखने) के पश्चात् और इसी प्रकार, तुम (भी) निकाले जाओगे।
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1. यहाँ से यह बताया जा रहा है कि प्रलय हो कर परलोक में सब को पुनः जीवित किया जाना संभव है और उस का प्रमाण दिया जा रहा है। इसी के साथ यह भी बताया जा रहा है कि इस विश्व का स्वामी और व्यवस्थापक अल्लाह ही है, अतः पूज्य भी केवल वही है।
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1. यहाँ से यह बताया जा रहा है कि प्रलय हो कर परलोक में सब को पुनः जीवित किया जाना संभव है और उस का प्रमाण दिया जा रहा है। इसी के साथ यह भी बताया जा रहा है कि इस विश्व का स्वामी और व्यवस्थापक अल्लाह ही है, अतः पूज्य भी केवल वही है।
Verse 20
और उसकी (शक्ति) के लक्षणों में से ये भी है कि तुम्हें उत्पन्न किया मिट्टी से, फिर अब तुम मनुष्य हो (कि धरती में) फैलते जा रहे हो।
Verse 21
तथा उसकी निशानियों (लक्षणें) में से ये (भी) है कि उत्पन्न किये, तुम्हारे लिए, तुम्हीं में से जोड़े, ताकि तुम शान्ति प्राप्त करो उनके पास तथा उत्पन्न कर दिया तुम्हारे बीच प्रेम तथा दया, वास्तव में, इसमें कई निशाननियाँ हैं उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।
Verse 22
तथा उसकी निशानियों में से है, आकाशों तथा धरती को पैदा करना तथा तुम्हारी बोलियों और रंगों का विभिन्न होना। निश्चय इसमें कई निशानियाँ हैं, ज्ञानियों[1] के लिए।
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1. क़ुर्आन ने यह कह कर कि भाषाओं और वर्ग-वर्ण का भेद अल्लाह की रचना की निशानियाँ हैं, उस भेद-भाव को सदा के लिये समाप्त कर दिया जो पक्षपात, आपसी बैर और वर्ग का आधार बनते हैं। और संसार की शान्ति का भेद करने का कारण होते हैं। (देखियेः सूरह ह़ुजुरात, आयतः13) यदि आज भी इस्लाम की इस शिक्षा को अपना लिया जाये तो संसार शान्ति का गहवारा बन सकता है।
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1. क़ुर्आन ने यह कह कर कि भाषाओं और वर्ग-वर्ण का भेद अल्लाह की रचना की निशानियाँ हैं, उस भेद-भाव को सदा के लिये समाप्त कर दिया जो पक्षपात, आपसी बैर और वर्ग का आधार बनते हैं। और संसार की शान्ति का भेद करने का कारण होते हैं। (देखियेः सूरह ह़ुजुरात, आयतः13) यदि आज भी इस्लाम की इस शिक्षा को अपना लिया जाये तो संसार शान्ति का गहवारा बन सकता है।
Verse 23
तथा उसकी निशानियों में से है, तुम्हारा सोना रात्रि में तथा दिन में और तुम्हारा खोज करना उसकी अनुग्रह (जीविका) का। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो सुनते हैं।
Verse 24
और उसकी निशानियों में से (ये भी) है कि वह दिखाता है तुम्हें बिजली को, भय तथा आशा बनाकर और उतारता है आकाश से जल, फिर जीवित करता है उसके द्वारा धरती को, उसके मरण के पश्चात्, वस्तुतः, इसमें कई निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो सोचते हैं।
Verse 25
और उसकी निशानियों में से है कि स्थापित हैं आकाश तथा धरती उसके आदेश से। फिर जब तुम्हें पुकारेगा एक बार धरती से, तो सहसा तुम निकल पड़ोगे।
Verse 26
और उसी का है, जो आकाशों तथा धरती में है। सब उसी के अधीन हैं।
Verse 27
तथा वही है, जो आरंभ करता है उत्पत्ति का, फिर वह उसे दुहरायेगा और वह अति सरल है उसपर और उसी का सर्वोच्च गुण है आकाशों तथा धरती में और वही प्रभुत्वशाली, तत्वज्ञ है।
Verse 28
उसने एक उदाहरण दिया है स्वयं तुम्हाराः क्या तुम्हारे[1] दासों में से तुम्हारा कोई साझी है उसमें, जो जीविका प्रदान की है हमने तुम्हें, तो तुम उसमें उसके बराबर हो, उनसे डरते हो जैसे अपनों से डरते हो? इसी प्रकार, हम वर्णन करते हैं आयतों का, उन लोगों के लिए, जो समझ रखते हैं।
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1. परलोक और एकेश्वरवाद के तर्कों का वर्णन करने के पश्चात् इस आयत में शुध्द एकेश्वरवाद के प्रमाण प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि जब तुम स्वयं अपने दासों को अपनी जीविका में साझी नहीं बना सकते तो जिस अल्लाह ने सब को बनाया है उस की वंदना उपासना में दूसरों को कैसे साझी बनाते हो?
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1. परलोक और एकेश्वरवाद के तर्कों का वर्णन करने के पश्चात् इस आयत में शुध्द एकेश्वरवाद के प्रमाण प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि जब तुम स्वयं अपने दासों को अपनी जीविका में साझी नहीं बना सकते तो जिस अल्लाह ने सब को बनाया है उस की वंदना उपासना में दूसरों को कैसे साझी बनाते हो?
Verse 29
बल्कि चले हैं अत्याचारी अपनी मनमानी पर बिना समझे, तो कौन राह दिखाये उसे, जिसे अल्लाह ने कुपथ कर दिया हो? और नहीं है उनका कोई सहायक।
Verse 30
तो (हे नबी!) आप सीधा रखें अपना मुख इस धर्म की दिशा में, एक ओर होकर, उस स्वभाव पर, पैदा किया है अल्लाह ने मनुष्यों को जिस[1] पर। बदलना नहीं है अल्लाह के धर्म को, यही स्वभाविक धर्म है, किन्तु अधिक्तर लोग नहीं[2] जानते।
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1. एक ह़दीस में कुछ इस प्रकार आया है कि प्रत्येक शिशु प्रकृति (नेचर, अर्थात इस्लाम) पर जन्म लेता है। परन्तु उस के माँ-बाप उसे यहूदी या ईसाई या मजूसी बना देते हैं। (देखिये सह़ीह़ मुस्लिमः 2656) और यदि उस के माता पिता हिन्दु अथवा बुध्द या और किछ हैं तो वे अपने सिशु को अपने धर्म के रंग में रंग देते हैं। आयत का भावार्थ यह है कि स्वभाविक धर्म इस्लाम और तौह़ीद को न बदलो बल्कि सह़ीह पालन-पोषण द्वारा अपने शिशु को इसी स्वभाविक धर्म इस्लाम की शिक्षा। 2. इसी लिये वह इस्लाम और तौह़ीद को नहीं पहचानते।
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1. एक ह़दीस में कुछ इस प्रकार आया है कि प्रत्येक शिशु प्रकृति (नेचर, अर्थात इस्लाम) पर जन्म लेता है। परन्तु उस के माँ-बाप उसे यहूदी या ईसाई या मजूसी बना देते हैं। (देखिये सह़ीह़ मुस्लिमः 2656) और यदि उस के माता पिता हिन्दु अथवा बुध्द या और किछ हैं तो वे अपने सिशु को अपने धर्म के रंग में रंग देते हैं। आयत का भावार्थ यह है कि स्वभाविक धर्म इस्लाम और तौह़ीद को न बदलो बल्कि सह़ीह पालन-पोषण द्वारा अपने शिशु को इसी स्वभाविक धर्म इस्लाम की शिक्षा। 2. इसी लिये वह इस्लाम और तौह़ीद को नहीं पहचानते।
Verse 31
ध्यान करके अल्लाह की ओर और डरो उससे तथा स्थापना करो नमाज़ की और न हो जाओ मुश्रिकों में से।
Verse 32
उनमें से जिन्होंने अलग बना लिया अपना धर्म और हो गये कई गिरोह, प्रत्येक गिरोह उसीमें[1] जो उसके पास है, मगन है।
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1. वह समझता है कि मैं ही सत्य पर हूँ और उन्हें तथ्य की कोई चिन्ता नहीं।
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1. वह समझता है कि मैं ही सत्य पर हूँ और उन्हें तथ्य की कोई चिन्ता नहीं।
Verse 33
और जब पहुँचता है मनुष्यों को कोई दुःख, तो वह पुकारते हैं अपने पालनहार को ध्यान लगाकर उसकी ओर। फिर जब वह चखाता है उनको, अपनी ओर से कोई दया, तो सहसा एक गिरोह उनमें से अपने पालनहार के साथ शिर्क करने लगता है।
Verse 34
ताकि वे कृतघ्न हो जायें (उसके), जो हमने प्रदान किया है उन्हें। तो तुम आन्नद ले लो, तुम्हें शीघ्र ही ज्ञान हो जायेगा।
Verse 35
क्या हमने उतारा है उनपर कोई प्रमाण, जो वर्णन करता है उसका, जिसे वे अल्लाह का साझी बना[1] रहे हैं।
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1. यह प्रश्न नकारात्मक है अर्थात उन के पास इस का कोई प्रमाण नहीं है।
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1. यह प्रश्न नकारात्मक है अर्थात उन के पास इस का कोई प्रमाण नहीं है।
Verse 36
और जब हम चखाते हैं लोगों को कुछ दया, तो वे उसपर इतराने लगते हैं और यदि पहुँचता है उन्हें कोई दुःख उनके करतूतों के कारण, तो वह सहसा निराश हो जाते हैं।
Verse 37
क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह फैला देता है जीविका, जिसके लिए चाहता है और नापकर देता है? निश्चय इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो ईमान लाते हैं।
Verse 38
तो दो समीपवर्तियों को उनका अधिकार तथा निर्धनों और यात्रियों को। ये उत्तम है उन लोगों के लिए, जो चाहते हों अल्लाह की प्रसन्नता और वही सफल होने वाले हैं।
Verse 39
और जो तुम व्याज देते हो, ताकि अधिक हो जाये लोगों के धनों[1] में मिलकर, तो वह अधिक नहीं होता अल्लाह के यहाँ तथा तुम जो ज़कात देते हो, चाहते हुए अल्लाह की प्रसन्नता, तो वही लोग सफल होने वाले हैं।
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1. इस आयत में सामाजिक अधिकारों की ओर ध्यान दिलाया गया है कि जब सब कुछ अल्लाह ही का दिया हुआ है तो तुम्हें अल्लाह की प्रसन्नता के लिये सब का अधिकार देना चाहिये। ह़दीस में है कि जो व्याज खाता-खिलाता है और उसे लिखता तथा उस पर गवाही देता है उस पर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने धिक्कार किया है।
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1. इस आयत में सामाजिक अधिकारों की ओर ध्यान दिलाया गया है कि जब सब कुछ अल्लाह ही का दिया हुआ है तो तुम्हें अल्लाह की प्रसन्नता के लिये सब का अधिकार देना चाहिये। ह़दीस में है कि जो व्याज खाता-खिलाता है और उसे लिखता तथा उस पर गवाही देता है उस पर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने धिक्कार किया है।
Verse 40
अल्लाह ही है, जिसने उत्पन्न किया है तुम्हें, फिर तुम्हें जीविका प्रदान की, फिर तुम्हें मारेगा, फिर जीवित करेगा, तो क्या तुम्हारे साझियों में से कोई है, जो इसमें से कुछ कर सके? वह पवित्र है और उच्च है, उनके साझी बनाने से।
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1. इस में फिर एकेश्वरवाद का वर्णन तथा शिर्क का खण्डन किया है।
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1. इस में फिर एकेश्वरवाद का वर्णन तथा शिर्क का खण्डन किया है।
Verse 41
फैल गया उपद्रव जल तथा[1] थल में लोगों के करतूतों के कारण, ताकि वह चखाये उन्हें उनका कुछ कर्म, संभवतः वे रूक जायें।
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2. आयत में बताया गया है कि इस विश्व में जो उपद्रव तथा अत्याचार हो रहा है यह सब शिर्क के कारण हो रहा है। जब लोगों ने एकेश्वाद को छोड़ कर शिर्क अपना लिया तो अत्याचार और उपद्रव होने लगा। क्यों कि न एक अल्लाह का भय रह गया और न उस के नियमों का पालन।
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2. आयत में बताया गया है कि इस विश्व में जो उपद्रव तथा अत्याचार हो रहा है यह सब शिर्क के कारण हो रहा है। जब लोगों ने एकेश्वाद को छोड़ कर शिर्क अपना लिया तो अत्याचार और उपद्रव होने लगा। क्यों कि न एक अल्लाह का भय रह गया और न उस के नियमों का पालन।
Verse 42
आप कह दें कि चलो-फिरो धरती में, फिर देखो कि कैसा रहा उनका अन्त, जो इनसे पहले थे। उनमें अधिक्तर मुश्रिक थे।
Verse 43
अतः, आप सीधा रखें अपना मुख सत्धर्म की दिशा में, इससे पहले कि आ जाये वह दिन, जिसे फिरना नहीं है अल्लाह की ओर से, उस दिन लोग अलग-अलग हो[1] जायेंगे।
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1. अर्थात ईमान वाले और काफ़िर।
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1. अर्थात ईमान वाले और काफ़िर।
Verse 44
जिसने कुफ़्र किया, तो उसीपर उसका कुफ़्र है और जिसने सदाचार किया, तो वे अपने ही लिए (सफलता का मार्ग) बना रहे हैं।
Verse 45
ताकि अल्लाह बदला दे उन्हें, जो ईमान लाये तथा सदाचार किये, अपने अनुग्रह से। निश्चय वह प्रेम नहीं करता काफ़िरों से।
Verse 46
और उसकी निशानियों में से है कि भेजता है वायु को शुभ सूचना देने के लिए और ताकि चखाये तुम्हें अपनी दया (वर्षा) में से और ताकि नाव चले उसके आदेश से और ताकि तुम खोजो उसकी जीविका और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।
Verse 47
और हमने भेजा आपसे पहले रसूलों को, उनकी जातियों की ओर। तो वे लाये उनके पास खुली निशानियाँ, अन्ततः, हमने बदला ले लिया उनसे, जिन्होंने अपराध किया और अनिवार्य था हमपर ईमान वालों की सहायता[1] करना।
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1. आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तथा आप के अनुयायियों को सांत्वना दी जा रही है।
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1. आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तथा आप के अनुयायियों को सांत्वना दी जा रही है।
Verse 48
अल्लाह ही है, जो वायुओं को भेजता है, फिर वह बादल उठाती हैं, फिर वह उसे फैलाता है आकाश में, जैसे चाहता है और उसे घंघोर बना देता है। तो तुम देखते हो बूंदों को निकलते उसके बीच से, फिर जब उसे पहुँचाता है जिसे चाहता है, अपने भक्तों में से, तो सहसा वे प्रफुल्ल हो जाते हें।
Verse 49
यद्यपि वे थे इससे पहले कि उनपर उतारी जाये, अति निराश।
Verse 50
तो देखो अल्लाह की दया के लक्षणों को, वह कैसे जीवित करता है धरती को, उसके मरण के पश्चात्, निश्चय वही जीवित करने वाला है मुर्दों को तथा वह सब कुछ कर सकता है।
Verse 51
और यदि हम भेज दें उग्र वायु, फिर वे देख लें उसे (खेती को) पीली, तो इसके पश्चात् कुफ्र करने लगते हैं।
Verse 52
तो (हे नबी!) आप नहीं सुना सकेंगे मुर्दों[1] को और नहीं सुना सकेंगे बहरों को पुकार, जब वे भाग रहे हों, पीठ फेरकर।
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1. अर्थात जिन की अन्तरात्मा मर चुकी हो और सत्य सुनने के लिये तैयार न हों।
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1. अर्थात जिन की अन्तरात्मा मर चुकी हो और सत्य सुनने के लिये तैयार न हों।
Verse 53
तथा नहीं हैं आप मार्ग दर्शाने वाले अंधों को उनके कुपथ से, आप सुना सकेंगे उन्हींको, जो ईमान लाते हैं हमारी आयतों पर, फिर वही मुस्लिम हैं।
Verse 54
अल्लाह ही है, जिसने उत्पन्न किया तुम्हें निर्बल दशा से, फिर प्रदान किया निर्बलता के पश्चात् बल, फिर कर दिया बल के पश्चात् निर्बल तथा बूढ़ा,[1] वह उत्पन्न करता है, जो चाहता है और वही सर्वज्ञ, सब सामर्थ्य रखने वाला है।
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1. अर्थात एक व्यक्ति जन्म से मरण तक अल्लाह के सामर्थ्य के अधीन रहता है फिर उस की वंदना में उस के अधीन होने और उस के पुनः पैदा कर देने के सामर्थ्य को अस्वीकार क्यों करते है?
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1. अर्थात एक व्यक्ति जन्म से मरण तक अल्लाह के सामर्थ्य के अधीन रहता है फिर उस की वंदना में उस के अधीन होने और उस के पुनः पैदा कर देने के सामर्थ्य को अस्वीकार क्यों करते है?
Verse 55
और जिस दिन व्याप्त होगी प्रलय, तो शपथ लेंगे अपराधी कि वे नहीं रहे क्षणभर[1] के सिवा और इसी प्रकार, वे बहकते रहे।
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1. अर्थात संसार में।
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1. अर्थात संसार में।
Verse 56
तथा कहेंगे, जो ज्ञान दिये गये तथा ईमान कि तुम रहे हो अल्लाह के लेख में प्रलय के दिन तक, तो अब ये प्रलय का दिन है और परन्तु, तुम विश्वास नहीं रखते थे।
Verse 57
तो उस दिन, नहीं काम देगा अत्याचारियों को उनका तर्क और न उनसे क्षमायाचना करयी जायेगी।
Verse 58
और हमने वर्णन कर दिया है लोगों के लिए इस क़ुर्आन में प्रत्येक उदाहरण का और यदि आप ले आयें उनके पास कोई निशानी, तो भी अवश्य कह देंगे, जो काफ़िर हो गये कि तुम तो केवल झूठ बनाते हो।
Verse 59
इसी प्रकार, मुहर लगा देता है अल्लाह उनके दिलों पर, जो समझ नहीं रखते।
Verse 60
तो आप सहन करें, वास्तव में, अल्लाह का वचन सत्य है और कदापि वो आप[1] को हल्का न समझें, जो विश्वास नहीं रखते।
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1. अन्तिम आयत में आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को धैर्य तथा साहस रखने का आदेश दिया गया है। और अल्लाह ने जो विजय देने तथा सहायता करने का वचन दिया है उस के पूरा होने और निराश न होने के लिये कहा जा रहा है।
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1. अन्तिम आयत में आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को धैर्य तथा साहस रखने का आदेश दिया गया है। और अल्लाह ने जो विजय देने तथा सहायता करने का वचन दिया है उस के पूरा होने और निराश न होने के लिये कहा जा रहा है।
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