फिर यदि उसे (तीसरी बार) तलाक़ दे दी, तो वह स्त्री उसके लिए ह़लाल (वैध) नहीं होगी, जब तक दूसरे पति से विवाह न कर ले। अब यदि दूसरा पति (संभोग के पश्चात्) उसे तलाक दे दे, तब प्रथम पति से (निर्धारित अवधि पूरी करके) फिर विवाह कर सकती है, यदि वे दोनों समझते हों कि अल्लाह की सीमाओं को स्थापित रख[1] सकेंगे और ये अल्लाह की सीमायें हैं, जिन्हें उन लोगों के लिए उजागर कर रहा है, जो ज्ञान रखते हैं।
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1. आयत का भावार्थ यह है कि प्रथम पति ने तीन तलाक़ दे दी हों तो निर्धारित अवधि में भी उसे पत्नी को लौटाने का अवसर नहीं दिया जायेगा। तथा पत्नी को यह अधिकार होगा कि निर्धारित अवधि पूरी कर के किसी दूसरे पति से धर्मविधान के अनुसार सह़ीह़ विवाह कर ले, फिर यदि दूसरा पति उसे सम्भोग के पश्चात् तलाक़ दे, या उस का देहांत हो जाये तो प्रथम पति से निर्धारित अवधि पूरी करने के पश्चात नये महर के साथ नया विवाह कर सकती है। लेकिन यह उस समय है जब दोनों यह समझते हों कि वे अल्लाह के आदेशों का पालन कर सकेंगे।
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1. आयत का भावार्थ यह है कि प्रथम पति ने तीन तलाक़ दे दी हों तो निर्धारित अवधि में भी उसे पत्नी को लौटाने का अवसर नहीं दिया जायेगा। तथा पत्नी को यह अधिकार होगा कि निर्धारित अवधि पूरी कर के किसी दूसरे पति से धर्मविधान के अनुसार सह़ीह़ विवाह कर ले, फिर यदि दूसरा पति उसे सम्भोग के पश्चात् तलाक़ दे, या उस का देहांत हो जाये तो प्रथम पति से निर्धारित अवधि पूरी करने के पश्चात नये महर के साथ नया विवाह कर सकती है। लेकिन यह उस समय है जब दोनों यह समझते हों कि वे अल्लाह के आदेशों का पालन कर सकेंगे।
الترجمة الهندية