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ترجمة معاني القرآن الكريم - عادل صلاحي
عادل صلاحي
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آية رقم 1
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१. अलिफ. लाम.रॉ या हिकमत आणि बुद्धिमत्तापूर्ण ग्रंथाच्या आयती आहेत.
آية رقم 2
२. काय त्या लोकांना या गोष्टीचे आश्चर्य वाटले की आम्ही त्यांच्यातल्या एका माणसाजवळ वहयी (अवतरित संदेश) पाठविली की समस्त मानवांना (अल्लाहचे) भय दाखवावे आणि जे ईमान राखतील त्यांना ही खूशखबर द्या की त्यांच्या पालनकर्त्याजवळ त्यांना पुरेपूर मोबदला आणि मान-सन्मान लाभेल. इन्कारी लोक म्हणाले की हा माणूस खात्रीने स्पष्ट जादूगार (तांत्रिक) आहे.
آية رقم 3
३. निःसंशय, तुमचा पालनकर्ता अल्लाहच आहे, ज्याने सहा दिवसांत आकाशांना व जमिनीला निर्माण केले, मग अर्श (सिंहासना) वर स्थिर (कायम) झाला. तो प्रत्येक कामाची व्यवस्था राखतो. त्याच्या अनुमतीविना त्याच्याजवळ कोणी शिफारस करणारा नाही. असा अल्लाह तुमचा रब (पालनकर्ता) आहे. तेव्हा तुम्ही त्याचीच उपासना करा. मग काय तरीही तुम्ही बोध प्राप्त करीत नाही?
آية رقم 4
४. तुम्हा सर्वांना अल्लाहच्याच जवळ जायचे आहे. अल्लाहने सच्चा वायदा केलेला आहे. निःसंशय तोच पहिल्यांदा निर्माण करतो, मग तोच दुसऱ्यांदा निर्माण करील, यासाठी की अशा लोकांना, ज्यांनी ईमान राखले आणि सत्कर्मे केलीत, त्यांना न्यायपूर्वक मोबदला द्यावा आणि ज्यांनी इन्कार केला, त्यांना पिण्यासाठी उकळते पाणी मिळेल आणि दुःखदायक शिक्षा-यातना लाभेल त्यांच्या इन्कार करण्यापायी.
آية رقم 5
५. तो (अल्लाह) असा आहे, ज्याने सूर्याला तेजस्वी बनविले आणि चंद्राला प्रकाशमान बनविले आणि त्याच्यासाठी स्थान (गंतव्य) निर्धारीत केले, यासाठी की तुम्ही वर्षांची गणना व हिशोब लावू शकावे व हिशोबाला जाणून घ्यावे. अल्लाहने या सर्व वस्तू व्यर्थ निर्माण केल्या नाहीत, तो हा पुरावा त्यांना स्पष्ट सांगत आहे जे अक्कल राखतात.
آية رقم 6
६. निःसंशय रात्र आणि दिवसाच्या एका पाठोपाठ येण्यात, आणि अल्लाहने आकाशात व धरतीत जे काही निर्माण केले आहे, त्या सर्वांत अशा लोकांकरिता पुरावा (प्रमाण) आहे जे अल्लाहचे भय बाळगतात.
آية رقم 7
७. ज्या लोकांना आमच्याजवळ येण्यावर विश्वास नाही आणि ते ऐहिक जीवनावर राजी झाले आहेत आणि त्यातच जीव गुंतवून बसले आहेत आणि जे आमच्या आयतींपासून गाफील आहेत.
آية رقم 8
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८. अशा लोकांचे ठिकाण त्यांच्या कर्मांमुळे नरक (जहन्नम) आहे.
آية رقم 9
९. निःसंशय, ज्या लोकांनी ईमान राखले आणि त्यांनी सत्कर्मे केलीत, तर त्यांचा पालनकर्ता ते ईमानधारक असण्याच्या सबबीवर त्यांना (त्यांच्या ध्येय उद्दिष्टाप्रत) पोहचविल, सुखाच्या अशा बागांमध्ये, ज्यांच्या खाली प्रवाह वाहत असतील.
آية رقم 10
१०. तिथे त्यांच्या तोंडून उद्गार निघेल सुबहानल्लाह१ (अल्लाह पवित्र आहे) आणि त्यांचे एकमेकांशी अभिवादन असेल अस्सलामु अलैकुम (सलामती असो तुमच्यावर) आणि शेवटी ते हे म्हणतील की समस्त स्तुती प्रशंसा अल्लाहकरिताच आहे, जो समस्त विश्वांचा पालनकर्ता आहे.
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(१) अर्थात जन्नतमध्ये जाणारे प्रत्येक क्षणी अल्लाहची महानता आणि त्याची प्रशंसा करण्यात मग्न असतील, ज्याप्रमाणे हदीसमध्ये उल्लेख आहे.... जन्नतवाल्यांच्या मुखातून अल्लाहची महानता आणि प्रशंसा अशा प्रकारे निघेल, ज्याप्रमाणे श्वास निघतो.
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(१) अर्थात जन्नतमध्ये जाणारे प्रत्येक क्षणी अल्लाहची महानता आणि त्याची प्रशंसा करण्यात मग्न असतील, ज्याप्रमाणे हदीसमध्ये उल्लेख आहे.... जन्नतवाल्यांच्या मुखातून अल्लाहची महानता आणि प्रशंसा अशा प्रकारे निघेल, ज्याप्रमाणे श्वास निघतो.
آية رقم 11
११. आणि जर अल्लाहने लोकांना त्वरित हानी पोहचविली असती, जसे लोक त्वरित लाभ इच्छितात, तेव्हा त्यांच्या वायदा केव्हाच पूर्ण झाला असता यास्तव आम्ही त्या लोकांना त्यांच्या दशेवर सोडतो, ज्यांना आमच्याजवळ घेण्यावर विश्वास नाही, यासाठी की त्यांनी आपल्या विद्रोहात भटकत राहावे.
آية رقم 12
१२. आणि जेव्हा माणसाला एखादी दुःख-यातना पोहोचते, तेव्हा आम्हाला पुकारतो, पहुडलेल्या स्थितीतही, बसलेल्या स्थितीतही, उभा असतानाही. मग जेव्हा आम्ही त्याची दुःख-यातना दूर करतो, तेव्हा तो असा होतो की जणू त्याने आपल्याला पोहोचलेल्या दुःख-यातनेकरिता आम्हाला कधी पुकारलेच नव्हते१ या मर्यादा ओलांडणाऱ्यांची कर्मे त्याच्याकरिता त्याचप्रमाणे मनपसंत बनविली गेली आहेत.
آية رقم 13
१३. आणि आम्ही तुमच्यापूर्वी कित्येक अशा जनसमूहांचा सर्वनाश केला जेव्हा त्यांनी अत्याचार केला, वास्तविक त्यांच्याजवळ त्यांचे पैगंबरही निशाण्या घेऊन आले होते आणि ते केव्हा असे होते की ईमान राखले असते? अपराधी लोकांना आम्ही अशाच प्रकारे दंड देतो.
آية رقم 14
१४. मग त्यांच्यानंतर आम्ही या जगात त्यांच्याजागी तुम्हाला आबाद केले यासाठी की आम्ही हे बघावे की तुम्ही कशा प्रकारची कामे करतात.
آية رقم 15
१५. आणि जेव्हा त्यांच्यासमोर आमच्या आयती वाचल्या जातात, ज्या अगदी स्पष्ट आहेत, तेव्हा हे लोक, ज्यांना आमच्याजवळ येण्यावर विश्वास नाही, असे म्हणतात की याच्याखेरीज दुसरा कुरआन आणि किंवा यात काही फेरबदल करून टाका. तुम्ही (स.) त्यांना सांगा की मला याचा अधिकार नाही की आपल्यातर्फे त्यात काही बदल करावा. मी तर त्याचेच अनुसरण करेन जे माझ्याजवळ वहयीद्वारे आले आहे. जर मी आपल्या पालनकर्त्याची अवज्ञा करेन तर मी एका मोठ्या दिवसाच्या शिक्षा-यातनेचे भय राखतो.
آية رقم 16
१६. तुम्ही सांगा की जर अल्लाहने इच्छिले असते, तर ना मी तुम्हाला ते वाचून ऐकविले असते आणि ना अल्लाहने तुम्हाला त्याची खबर दिली असती, कारण यापूर्वी तर मी आयुष्याच्या दीर्घ अवधीपर्यंत तुमच्यात राहिलो आहे. मग काय तुम्ही समज बाळगत नाही?
آية رقم 17
१७. तेव्हा, त्याहून जास्त अत्याचारी कोण असेल जो अल्लाहविषयी खोटे रचेल किंवा त्याच्या आयतींना खोटे म्हणेल. निःसंशय असे अपराधी लोक कधीही सफल होणार नाहीत.
آية رقم 18
१८. आणि हे लोक अल्लाहला सोडून अशा वस्तूंची उपासना करतात, जे ना त्यांना हानी पोहचवू शकतील आणि ना त्यांना लाभ पोहचवू शकतील आणि म्हणतात की हे अल्लाहच्या समोर आमची शिफारस करणारे आहेत. तुम्ही सांगा, काय तुम्ही अल्लाहला अशा गोष्टींची खबर देता, ज्या तो जाणत नाही आकाशमध्ये व धरतीत. तो पवित्र आणि श्रेष्ठ आहे त्या लोकांच्या शिर्क (सहभागी करण्या) पासून.
آية رقم 19
१९. आणि समस्त लोक एकाच उम्मत (धर्मसमुदाया) चे होते, मग त्यांनी मतभेद निर्माण केले१ आणि जर एक गोष्ट नसती जी तुमच्या पालनकर्त्यातर्फे निर्धारीत केली गेली आहे तर ज्या गोष्टीत हे लोक मतभेद करीत आहेत त्यांचा पूर्णपणे निकाल लावला गेला असता.
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(१) अर्थात हा शिर्क (अनेकेश्वरवाद) लोकांनी स्वतः निर्माण केला आहे आणि सुरुवातीला याचे अस्तित्वही नव्हते, समस्त लोक एकाच दीन (धर्मा) च्या मार्गावर अर्थात इस्लामवर होते, ज्यात तौहीद (एकेश्वरवादा) ला विशेष स्थान आहे. पैगंबर हजरत नूह पर्यंत लोक याच तौहीदच्या मार्गावर चालत राहिले, पुढे त्यांच्यात मतभेद झाले परिणामी काही लोकांनी अल्लाहच्या सोबत इतरांनाही उपास्य आराध्य देवता आणि कष्टिनिवारक (मुश्किल कुशा) मानायला सुरुवात केली.
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(१) अर्थात हा शिर्क (अनेकेश्वरवाद) लोकांनी स्वतः निर्माण केला आहे आणि सुरुवातीला याचे अस्तित्वही नव्हते, समस्त लोक एकाच दीन (धर्मा) च्या मार्गावर अर्थात इस्लामवर होते, ज्यात तौहीद (एकेश्वरवादा) ला विशेष स्थान आहे. पैगंबर हजरत नूह पर्यंत लोक याच तौहीदच्या मार्गावर चालत राहिले, पुढे त्यांच्यात मतभेद झाले परिणामी काही लोकांनी अल्लाहच्या सोबत इतरांनाही उपास्य आराध्य देवता आणि कष्टिनिवारक (मुश्किल कुशा) मानायला सुरुवात केली.
آية رقم 20
२०. आणि हे लोक असे म्हणतात की त्यांच्यावर अल्लाहचा एखादा चमत्कार (मोजिजा) का नाही अवतरित झाला? (तेव्हा तुम्ही) सांगा की अपरोक्षाचे (गैबचे) ज्ञान केवळ अल्लाहला आहे, तेव्हा तुम्हीही प्रतिक्षा करा, मीदेखील तुमच्यासोबत प्रतिक्षेत आहे.
آية رقم 21
२१. आणि जेव्हा आम्ही लोकांना दुःख पोहचल्यानंतर सुखाचा स्वाद चाखवतो तेव्हा ते त्वरित आमच्या आयतींविषयी चालबाजी करू लागतात. तुम्ही सांगा की अल्लाह योजना आखण्यात तुमच्यापेक्षा अधिक चपळ आहे. निःसंशय, आमचे फरिश्ते तुमची कपट कारस्थाने लिहित आहेत.
آية رقم 22
२२. तो (अल्लाह) असा आहे, जो तुम्हाला समुद्रात आणि खुष्कीत प्रवासाचे सामर्थ्य देतो, येथपर्यंत की जेव्हा तुम्ही नौकेत असता आणि त्या नावा, लोकांना अनुकूल वाऱ्याद्वारे नेत असतात, आणि ते लोक त्यांच्यापासून आनंदित होतात. त्यांच्यावर वादळी वाऱ्याचा झोका येतो आणि सर्व बाजूंनी लाटा उठतात आणि ते समजतात की (वाईटरित्या) येऊन घेरले गेलो (त्या वेळी) सर्वच, सचोटीच्या ईमान आणि श्रद्धेसह अल्लाहलाच पुकारतात की जर तू या (संकटा) पासून वाचवशील तर आम्ही अवश्य (तुझे) कृतज्ञशील बनू.
آية رقم 23
२३. मग जेव्हा सवश्रेष्ठ अल्लाह त्यांना वाचवतो तेव्हा त्वरित ते धरतीत नाहक उत्पात (फसाद) माजवू लागतात. हे लोकांनो! तुमचा हा विद्रोह तुमच्यासाठी दुःखदायक ठरणार आहे, ऐहिक जीवनाचे काही लाभ आहेत, मग (नंतर) तुम्हाला आमच्याकडे यायचे आहे. तेव्हा आम्ही तुम्हाला तुमच्या सर्व हरकती दाखवू.
آية رقم 24
२४. ऐहिक जीवनाची स्थिती अशी आहे, जणू आकाशातून आम्ही पाऊस पाडला, मग त्याद्वआरे जमिनीची वनस्पती (झाडे-झुडपे) ज्यांना मानव आणि जानवरे खातात, खूप हिरवी टवटवीत होऊन निघाली, येथपर्यंत की जेव्हा त्या जमिनीने आपल्या शोभा- सजावटीचा पूर्ण हिस्सा घेतला आणि ती खूप सुंदर झाली आणि तिच्या मालकांना वाटले की आता आम्ही हिच्यावर पूर्णपणे हक्कदार झालो तेव्हा दिवसा किंवा रात्री, तिच्यावर आमच्यातर्फे एखादा (आपत्तीचा) आदेश आला, तर आम्ही तिला असे साफ करून टाकले की जणू काल (परवा) येथे नव्हतीच. अशा प्रकारे आम्ही निशाण्यांना सविस्तरपणे सांगतो त्या लोकांसाठी ते विचार चिंतन करतात.
آية رقم 25
२५. आणि सर्वश्रेष्ठ अल्लाह, तुम्हाला सलामतीच्या घराकडे बोलावितो आणि ज्याला इच्छितो, सरळ मार्ग दाखवितो.
آية رقم 26
२६. ज्या लोकांनी सत्कर्म केले आहे, त्यांच्यासाठी भलाई आहे आणि काही जास्तही आणि त्यांच्या मुखावर काळोखी नसेल आणि ना अपमान हे लोक जन्नतमध्ये राहणारे आहेत. ते नेहमी त्यात राहतील.
آية رقم 27
२७. आणि ज्या लोकांनी वाईट कर्म केले, त्यांना त्यांच्या दुष्कर्मांची शिक्षा समान१ मिळेल आणि त्यांच्यावर अपमान आच्छादित होईल, त्यांना अल्लाहपासून कोणीही वाचवू शकणार नाही, त्यांच्या तोंडावर जणू काही अंधाऱ्या रात्रीचे थर गुंडाळले गेले असतील. हे लोक नरकात राहणारे आहेत, ते सदैव तेथे राहतील.
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(१) पहिल्या आयतीत जन्नतमध्ये राहणाऱ्या लोकांचे वर्णन होते. त्यात असे सांगितले गेले की त्यांना आपल्या सत्कर्मांचा मोबदला अनेक पटींनी मिळेल आणि याहून जास्त अल्लाहच्या दर्शनाने सन्मानित होतील. नंतरच्या आयतीत हे सांगितले जात आहे की वाईट कर्माचे फळ त्या कर्माच्या प्रमाणातच मिळेल. अरबीत ‘सिकत’चा अर्थ (अधर्म) आणि शिर्क व इतर दुराचार होय.
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(१) पहिल्या आयतीत जन्नतमध्ये राहणाऱ्या लोकांचे वर्णन होते. त्यात असे सांगितले गेले की त्यांना आपल्या सत्कर्मांचा मोबदला अनेक पटींनी मिळेल आणि याहून जास्त अल्लाहच्या दर्शनाने सन्मानित होतील. नंतरच्या आयतीत हे सांगितले जात आहे की वाईट कर्माचे फळ त्या कर्माच्या प्रमाणातच मिळेल. अरबीत ‘सिकत’चा अर्थ (अधर्म) आणि शिर्क व इतर दुराचार होय.
آية رقم 28
२८. आणि तो दिवसदेखील आठवण करण्यायोग्य आहे, ज्या दिवशी आम्ही त्या सर्वांना एकत्र करू; मग अनेक ईश्वरांची भक्ती- आराधना करणाऱ्यांना सांगू की तुम्ही आणि तुमचे सहभागी ईश्वर आपल्या जागी थांबा, मग आम्ही त्यांच्यात आपसात फूट पाडू आणि त्यांचे ते सहभागी म्हणतील की तुम्ही आमची उपासना (पूजा) करीत नव्हता.
آية رقم 29
२९. तेव्हा आमच्या आणि तुमच्या दरम्यान अल्लाह पुरेसा आहे, साक्षीच्या स्वरूपात की आम्हाला तुमच्या उपासनेची खबरदेखील नव्हते.
آية رقم 30
३०. त्या ठिकाणी, प्रत्येक मनुष्य आपण पूर्वी केलेल्या कर्मांची जाच-पडताळ करेल आणि हे लोक अल्लाहकडे, जो त्यांचा खराखुरा स्वामी आहे, परतविले जातील आणि जी असत्य (आराध्य दैवते) त्यांनी बनविली होती ती सर्व त्यांच्यापासून गायब होतील.
آية رقم 31
३१. तुम्ही सांगा की तो कोण आहे, जो तुम्हाला आकाश व जमिनीतून रोजी (अन्नसामुग्री) पोहचवितो किंवा तो कोण आहे जो कानांवर आणि डोळ्यांवर पूर्ण अधिकार राखतो आणि तो कोण आहे जो निर्जीवातून सजीव बाहेर काढतो, आणि निर्जीवाला सजीवातून बाहेर काढतो आणि तो कोण आहे जो समस्त कार्यांचे व्यवस्थापन राखतो. निःसंशय ते हेच म्हणतील की अल्लाह! तेव्हा त्यांना सांगा की, मग तुम्ही भय का राखत नाही?
آية رقم 32
३२. तर हा आहे अल्लाह, जो तुमचा सच्चा स्वामी व पालनकर्ता आहे, मग सत्यानंतर आणखी काय बाकी राहिले भटकण्याशिवाय, मग कोठे भटकत जात आहात?
آية رقم 33
३३. अशाच प्रकारे तुमच्या पालनकर्त्याचे हे फर्मान की हे ईमान राखणार नाहीत, सर्व दुराचारी लोकांबाबत सिद्ध ठरले आहे.
آية رقم 34
३४. तुम्ही (अशा प्रकारे) सांगा की, काय तुमच्या सहभागी ईश्वरांपैकी कोणी असा आहे जो पहिल्यांदाही निर्माण करील, मग दुसऱ्यांदा निर्माण करील तुम्ही सांगा, अल्लाहच पहिल्या खेपेस निर्माण करतो, मग तोच दुसऱ्या खेपेसही निर्माण करील, मग तुम्ही उलटपावली कोठे जात आहात?
آية رقم 35
३५. तुम्ही सांगा, की तुमच्या त्या सहभागी ईश्वरांमध्ये कोणी असा आहे जो सत्य मार्ग दाखवित असेल? तुम्ही सांगा की अल्लाहच सत्याचा मार्ग दाखवितो, तेव्हा मग जे सामर्थ्य सत्याचा मार्ग दाखवित असेल ते जास्त अनुसरण करण्यास पात्र आहे की तो मनुष्य, ज्याला सांगितल्याविना स्वतःच मार्ग दिसून न यावा, तेव्हा तुम्हाला झाले तरी काय, तुम्ही कशा प्रकारे निर्णय घेता?
آية رقم 36
३६. आणि त्यांच्यापैकी बहुतेक लोक निराधार विचारांच्या मागे चालत आहेत. निःसंशय, अनुमान अटकळी, सत्य (ओळखण्या) संदर्भात काहीच उपयोगी पडू शकत नाही. हे लोक जे काही करीत आहेत, निश्चितच अल्लाह ते सर्व काही जाणतो.
آية رقم 37
३७. आणि हा कुरआन असा नाही की अल्लाह (च्या वहयी) शिवाय (स्वतःच) रचून घेतला गेला असेल. किंबहुना हा तर (त्या ग्रंथांच्या) सत्यतेचे समर्थन करणारा आहे, जे यापूर्वी अवतरित केले गेले आहेत. आणि ग्रंथा (आवश्यक आदेशां) चे सविस्तर वर्णन आहे. यात मुळीच शंका नाही की (हा ग्रंथ) समस्त विश्वांच्या पालनकर्त्यातर्फे आहे.
آية رقم 38
३८. काय हे लोक असे म्हणतात की तुम्ही या ग्रंथाला (आपल्या मनाने) रचले आहे? तुम्ही सांगा, तर मग तुम्ही यासारखी एक तरी सूरह (अध्याय) बनवून आणा, आणि अल्लाहखेरीज ज्यांना ज्यांना बोलावू शकाल त्यांना बोलावून घ्या जर तुम्ही सच्चे असाल.
آية رقم 39
३९. किंबहुना ते अशा गोष्टीला खोटे ठरवू लागले, जिला त्यांनी आपल्या ज्ञान-कक्षेत आणले नाही आणि अजून त्यांना याचा अंतिम परिणाम लाभला नाही. जे लोक यांच्यापूर्वी होऊन गेलेत, त्यांनीही असेच खोटे ठरविले होते, तर पाहा त्या अत्याचारींचा शेवट कसा झाला?
آية رقم 40
४०. आणि त्यांच्यापैकी काही असे आहेत, जे यावर ईमान राखतील, आणि काही असे आहेत की त्यावर ईमान राखणार नाहीत, आणि तुमचा पालनकर्ता उपद्रवी लोकांना चांगल्या प्रकारे जाणतो.
آية رقم 41
४१. आणि जर ते तुम्हाला खोटे ठरवित राहिले तर त्यांना हे सांगा की मी केलेले मला लाभेल आणि तुम्ही केलेले तुम्हाला लाभेल. तुम्ही मी केलेल्या (कर्मां) साठी जबाबदार नाहीत आणि मी, तुम्ही केलेल्या (कर्मां) साठी जबाबदार नाही.
آية رقم 42
४२. आणि त्यांच्यात काही असे आहेत, जे तुमच्याकडे कान लावून ऐकतात, काय तुम्ही बहिऱ्या लोकांना ऐकवता, त्यांना अक्कल नसली तरीही?
آية رقم 43
४३. आणि त्यांच्यात काही असे आहेत की तुम्हाला पाहात आहेत. मग काय तुम्ही आंधळ्यांना मार्ग दाखवू इच्छिता, ते डोळे राखत नसले तरीही?
آية رقم 44
४४. निःसंशय, अल्लाह लोकांवर किंचितही अत्याचार करीत नाही, परंतु लोक स्वतःच आपल्यावर अत्याचार करतात.
آية رقم 45
४५. आणि त्यांना त्या दिवसाची आठवण करून द्या, ज्या दिवशी अल्लाह त्यांना (आपल्या समोर) अशा स्थितीत एकत्र करील की (त्यांना वाटेल) की (जगात) दिवसाचा एक अर्धा क्षण राहिले असावेत आणि आपसात एकमेकांना ओळखण्यासाठी उभे असतील. वास्तविक हानीग्रस्त झाले ते लोक, ज्यांनी अल्लाहजवळ जाण्याला खोटे ठरविले आणि ते मार्गदर्शन प्राप्त करणारे नव्हते.
آية رقم 46
४६. आणि आम्ही ज्या गोष्टीचा त्यांच्याशी वायदा करीत आहोत, तिचा काही भाग तुम्हाला दाखवून द्यावा किंवा (तो जाहीर होण्यापूर्वी) आम्ही तुम्हाला मृत्यु द्यावा, तेव्हा त्यांना आमच्याजवळ तर यायचेच आहे, मग अल्लाह साक्षी आहे यांच्या सर्व कामांवर.
آية رقم 47
४७. आणि प्रत्येक समुदाया (उम्मत) साठी एक रसूल (सन्देष्टा) आहे. मग जेव्हा त्यांचा पैगंबर येऊन पोहचतो तेव्हा त्यांचा निर्णय न्यायपूर्वक केला जातो आणि त्यांच्यावर जुलूम केला जात नाही.
آية رقم 48
४८. आणि हे लोक म्हणतात, हा कायदा केव्हा पूर्ण होईल जर तुम्ही सच्चे असाल?
آية رقم 49
४९. तुम्ही सांगा, मी स्वतः आपल्याकरिता तर कसल्याही लाभ आणि हानीचा अधिकार राखत नाही, परंतु तेवढाच जशी अल्लाहची मर्जी असेल, प्रत्येक समुदाया (उम्मत) करिता एक ठरलेली वेळ आहे, जेव्हा त्यांच्या तो निर्धारीत समय येऊन पोहोचतो तेव्हा ना एक क्षण मागे सरकू शकतात आणि ना पुढे जाऊ शकतात.
آية رقم 50
५०. तुम्ही सांगा की हे तर सांगा की जर तुमच्यावर अल्लाहचा अज़ाब (प्रकोप) रात्री येऊन कोसळेल किंवा दिवसा, तेव्हा शिक्षा यातनेत अशी कोणती गोष्ट आहे की अपराधी लोक ती लवकर मागत आहेत.
آية رقم 51
५१. मग काय तो (अज़ाब) येऊन कोसळल्यावरच ईमान राखाल, आता (ईमान) स्वीकारले, वास्तविक तुम्ही त्याची (अज़ाब) ची घाई माजवित होते.
آية رقم 52
५२. मग अत्याचारी लोकांना फर्माविले जाईल आता निरंतर प्रकोपाची गोडी चाखा, तुम्हाला तर तुम्ही केलेल्या कर्मांचाच मोबदला लाभला आहे.
آية رقم 53
५३. आणि ते तुम्हाला विचारतात की काय तो (अज़ाब) खरी गोष्ट आहे? तुम्ही सांगा, माझ्या पालनकर्त्याची शपथ, ती अगदी खरी गोष्ट आहे आणि तुम्ही अल्लाहला कशाही प्रकारे विवश करू शकत नाही.
آية رقم 54
५४. आणि जर प्रत्येक जीव, ज्याने अत्याचार (शिर्क) केला आहे, त्याच्याजवळ एवढे असावे की संपूर्ण जमीन भरून जावी, तरीही ते देऊन आपला प्राण वाचवू लागेल आणि तेव्हा अज़ाब पाहून घेतील, तेव्हा लज्जा लपवून ठेवतील आणि त्यांचा फैसला न्यायपूर्वक होईल आणि त्यांच्यावर अत्याचार केला जाणार नाही.
آية رقم 55
५५. लक्षात ठेवा, जेवढ्या वस्तू आकाशांमध्ये व जमिनीत आहे, त्या सर्व अल्लाहच्याच आहेत. लक्षात ठेवा, अल्लाहचा वायदा अगदी सच्चा आहे, परंतु अधिकांश लोक हे जाणत नाहीत.
آية رقم 56
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५६. तोच जीव टाकतो आणि तोच जीव बाहेर काढतो आणि तुम्ही सर्व त्याच्याचकडे आणले जाल.
آية رقم 57
५७. हे लोकांनो! तुमच्याजवळ तुमच्या पालनकर्त्यातर्फे एक अशी गोष्ट आली आहे, जी बोध- उपदेश आहे आणि हृदयात जे (विकार) आहेत, त्यांच्याकरिता रोगमुक्ती आहे आणि मार्गदर्शन करणारी आहे आणि (अल्लाहची) दया- कृपा आहे ईमान राखणाऱ्यांसाठी.
آية رقم 58
५८. तुम्ही सांगा की लोकांनी अल्लाहच्या दया- कृपेवर आनंदित झाले पाहिजे ते तर त्याहून कित्येक पटींनी अधिक चांगले आहे, जे हे जमा करीत आहेत.
آية رقم 59
५९. तुम्ही सांगा, जरा हे सांगा की अल्लाहने तुमच्यासाठी जी रोजी (अन्नसामुग्री) पाठविली होती, मग तुम्ही तिच्यातला काही हिस्सा हराम आणि काही हल्ला करून घेतला. तुम्ही त्यांना विचारा की काय तुम्हाला अल्लाहने तसा आदेश दिला होता किंवा अल्लाहबाबत उगाच खोटे रचून घेता?
آية رقم 60
६०. आणि जे लोक अल्लाहच्या संबंधाने खोटे रचतात, त्यांचा कयामतविषयी काय विचार आहे? वास्तविक लोकांवर, सर्वश्रेष्ठ अल्लाहचा फार मोठा उपकार आहे. परंतु अधिकांश लोक कृतज्ञता व्यक्त करीत नाही.
آية رقم 61
६१. आणि तुम्ही कोणत्याही स्थितीत असा आणि या स्थितींमध्ये तुम्ही कोठूनही कुरआन पठण करा आणि तुम्ही लोक जे कामदेखील करता आम्हाला सर्वांचीच खबर असते. जेव्हा तुम्ही त्या कामात व्यस्त असता आणि तुमच्या पालनकर्त्यापासून तिळमात्र वस्तू लपलेली नाही, ना धरतीत, ना आकाशात आणि ना एखादी वस्तू त्याहून लहान आणि ना एखादी मोठी, तथापि हे सर्व खुल्या- स्पष्ट ग्रंथात आहे.
آية رقم 62
६२. लक्षात ठेवा, अल्लाहच्या मित्रांना१ ना कसले भय आहे, ना ते दुःखी होतील.
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(१) अवज्ञाकारी लोकांनंतर अल्लाह आपल्या आज्ञाधारकांबद्दल सांगत आहे अर्थात औलिया अल्लाहबद्दल. औलिया वली (मित्र) चे अनेकवचन आहे. वलीचा मूल अर्थ निकटचा, तेव्हा औलिया अल्लाहचा अर्थ होईल. अल्लाहचे ते सच्चे आणि निःस्वार्थ ईमानधारक ज्यांनी अल्लाहचे आज्ञापालन करून, दुष्कर्मांचा त्याग करून अल्लाहचे जवळीक प्राप्त केले. यास्तव अल्लाहने पुढच्या आयतीत फर्माविले, ज्यांनी ईमान राखले व ज्यांनी अल्लाहचे भय मनात राखले आणि याच दोन्ही गोष्टी अल्लाहचे जवळीक प्राप्त करण्याचा आधार व महत्त्वपूर्ण माध्यम आहेत. या कारणाने अल्लाहचे भय राखणारा प्रत्येक ईमानधारक अल्लाहचा वली आहे. वली असण्यासाठी लोकांना चमत्कार दाखविणे आवश्यक वाटते. मग ते आपल्या वलीच्या खऱ्या खोट्या चमत्कारांचा प्रचार करतात, हा विचार अगदी चुकीचा आहे. चमत्कार आणि वली यांचा काडीमात्र संबंध नाही. अल्लाहच्या मर्जीने एखाद्याकडून काही चमत्कार जाहीर झाला तर ती गोष्ट वेगळी. यात वलीची मर्जी सामील नाही. तथापि अल्लाहचे भय राखणाऱ्या एखाद्या ईमानधारक आणि सुन्नतचे अनुसरण करणाऱ्याकडून चमत्कार दिसून येवो किंवा न येवो तो अल्लाहचा वली असण्यात काहीच शंका नाही.
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(१) अवज्ञाकारी लोकांनंतर अल्लाह आपल्या आज्ञाधारकांबद्दल सांगत आहे अर्थात औलिया अल्लाहबद्दल. औलिया वली (मित्र) चे अनेकवचन आहे. वलीचा मूल अर्थ निकटचा, तेव्हा औलिया अल्लाहचा अर्थ होईल. अल्लाहचे ते सच्चे आणि निःस्वार्थ ईमानधारक ज्यांनी अल्लाहचे आज्ञापालन करून, दुष्कर्मांचा त्याग करून अल्लाहचे जवळीक प्राप्त केले. यास्तव अल्लाहने पुढच्या आयतीत फर्माविले, ज्यांनी ईमान राखले व ज्यांनी अल्लाहचे भय मनात राखले आणि याच दोन्ही गोष्टी अल्लाहचे जवळीक प्राप्त करण्याचा आधार व महत्त्वपूर्ण माध्यम आहेत. या कारणाने अल्लाहचे भय राखणारा प्रत्येक ईमानधारक अल्लाहचा वली आहे. वली असण्यासाठी लोकांना चमत्कार दाखविणे आवश्यक वाटते. मग ते आपल्या वलीच्या खऱ्या खोट्या चमत्कारांचा प्रचार करतात, हा विचार अगदी चुकीचा आहे. चमत्कार आणि वली यांचा काडीमात्र संबंध नाही. अल्लाहच्या मर्जीने एखाद्याकडून काही चमत्कार जाहीर झाला तर ती गोष्ट वेगळी. यात वलीची मर्जी सामील नाही. तथापि अल्लाहचे भय राखणाऱ्या एखाद्या ईमानधारक आणि सुन्नतचे अनुसरण करणाऱ्याकडून चमत्कार दिसून येवो किंवा न येवो तो अल्लाहचा वली असण्यात काहीच शंका नाही.
آية رقم 63
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६३. हे असे लोक आहेत, ईमान राखतात आणि (दुराचारापासून) तकवा (अल्लाहचे भय) बाळगतात.
آية رقم 64
६४. त्यांच्याकरिता या जगाच्या जीवनातही १ आणि आखिरतमध्येही खूशखबर आहे. सर्वश्रेष्ठ अल्लाहच्या फर्मानात काहीच बदल होत नसतो. ही फार मोठी सफलता आहे.
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(१) जगात खूशखबर म्हणजे पुण्यकर्म होय, अथवा ती खूशखबर होय जी मृत्युसमयी फरिश्ते एका ईमानधारकाला देतात, जसे की कुरआन व हदीसद्वारे सिद्ध आहे.
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(१) जगात खूशखबर म्हणजे पुण्यकर्म होय, अथवा ती खूशखबर होय जी मृत्युसमयी फरिश्ते एका ईमानधारकाला देतात, जसे की कुरआन व हदीसद्वारे सिद्ध आहे.
آية رقم 65
६५. आणि तुम्ही त्यांच्या बोलण्याने दुःखी-कष्टी होऊ नका. परिपूर्ण वर्चस्व अल्लाहकरिताच आहे. तो ऐकणारा, जाणणारा आहे.
آية رقم 66
६६. लक्षात ठेवा, जे काही आकाशांमध्ये आहे आणि जे काही धरतीत आहे ते सर्व अल्लाहचेच आहे, आणि जे लोक अल्लाहला सोडून इतर सहभागींना पुकारतात, ते कोणत्या गोष्टीचे अनुसरण करीत आहेत. केवळ काल्पनिक विचारांचेच अनुसरण करीत आहेत आणि फक्त अटकळीच्याच गोष्टी करीत आहेत.१
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(१) अर्थात अल्लाहसोबत एखाद्याला सहभागी ठरविणे, कसल्याही पुराव्यावर आधारित नाही, किंबहुना एक अटकळ अनुमानाची देणगी आहे. आज जर मनुष्य आपल्या अकलेचा उचितरित्या उपयोग करील तर निःसंशय त्याला हे स्पष्टपणे उमजू शकते की अल्लाहचा कोणीही सहभागी नाही आणि ज्याप्रमाणे तो आकाशांना व धरतीला निर्माण करण्यात एकटा आहे, कोणी त्यात भागीदार नाही तर मग भक्ती- आराधनेत त्याचे अन्य इतर सहभागी कशा प्रकारे असू शकतात?
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(१) अर्थात अल्लाहसोबत एखाद्याला सहभागी ठरविणे, कसल्याही पुराव्यावर आधारित नाही, किंबहुना एक अटकळ अनुमानाची देणगी आहे. आज जर मनुष्य आपल्या अकलेचा उचितरित्या उपयोग करील तर निःसंशय त्याला हे स्पष्टपणे उमजू शकते की अल्लाहचा कोणीही सहभागी नाही आणि ज्याप्रमाणे तो आकाशांना व धरतीला निर्माण करण्यात एकटा आहे, कोणी त्यात भागीदार नाही तर मग भक्ती- आराधनेत त्याचे अन्य इतर सहभागी कशा प्रकारे असू शकतात?
آية رقم 67
६७. तो (अल्लाह) असा आहे, ज्याने तुमच्यासाठी रात्र बनविली, यासाठी की तुम्ही रात्री आराम करावा आणि दिवसही अशा प्रकारे बनविला की तो पाहण्याचे साधन आहे. निःसंशय यात निशाण्या आहेत, त्या लोकांकरिता जे ऐकतात.
آية رقم 68
६८. ते म्हणतात की अल्लाह संतती बाळगतो, तो या गोष्टीपासून पवित्र आहे. तो तर कोणाचाही गरजवंत नाही जे काही आकाशांमध्ये आहे आणि जे काही धरतीत आहे सर्व त्याचेच आहे. तुमच्याजवळ (तुमच्या कथनाचा) कोणताही पुरावा नाही. काय अल्लाहशी अशा गोष्टीचा संबंध जोडता जिचे तुम्ही ज्ञान बाळगत नाही.
آية رقم 69
६९. तुम्ही सांगा की जे लोक अल्लाहविषयी खोटे रचतात, ते सफल होणार नाहीत.
آية رقم 70
७०. (हे) या जगात थोडेसे सुख आहे, मग त्यांना आमच्याकडे यायचे आहे. मग आम्ही त्यांना त्यांच्या कुप्र (अविश्वासा) च्या मोबदल्यात सक्त सजा चाखवू.
آية رقم 71
७१. आणि तुम्ही त्यांना नूहचा वृत्तान्त वाचून ऐकवा, जेव्हा ते आपल्या जनसमूहाच्या लोकांना म्हणाले, हे माझ्या जातीबांधवांनो! जर तुम्हाला माझे राहणे आणि अल्लाहच्या आदेशांची शिकवण देणे जड जाते (असह्य होते) तेव्हा माझा तर अल्लाहवरच भरोसा आहे. तुम्ही आपली योजना आपल्या साथीदारांशी मिळून मजबूत करून घ्या, मात्र तुमची योजना, तुमच्यासाठी मन गुदमरण्याचे कारण ठरू नये. मग माझे (काय करायचे ते) करून टाका आणि मला संधीही देऊ नका.
آية رقم 72
७२. तरीही जर तुम्ही तोंड फिरवित राहाल तर मी तुमच्याकडून काही मोबदला तर मागितला नाही, माझा मोबदला तर फक्त अल्लाहच देईल आणि मला आदेश दिला गेला आहे की मी इस्लाम स्वीकारणाऱ्यांपैकी राहावे.
آية رقم 73
७३. तर ते लोक त्यांना खोटे ठरवित राहिले, मग आम्ही त्यांना, आणि जे त्यांच्यासोबत नौकेत स्वार होते, त्या सर्वांना सुटका प्रदान केली आणि त्यांना वारस बनविले आणि ज्यांनी आमच्या आयतींना खोटे ठरविले होते त्यांना बुडवून टाकले, तेव्हा विचार केल्या पाहिजे की कसा शेवट झाला त्या लोकांचा, ज्यांना पहिल्यापासून भय दाखविले गेले होते.
آية رقم 74
७४. मग नूहनंतर आम्ही दुसऱ्या पैगंबरांना त्यांच्या जनसमूहाकडे पाठविले तेव्हा ते त्यांच्याजवळ स्पष्ट प्रमाण घेऊन आले, परंतु ज्या गोष्टीला त्यांनी पहिल्या खेपेस खोटे ठरविले, नंतर तिच्यावर ईमान राखले असते असे झाले नाही. अशा प्रकारे आम्ही मर्यादा पार करणाऱ्यांच्या हृदयांव मोहर लावतो.
آية رقم 75
७५. मग आम्ही त्या (पैगंबरां) च्या नंतर मूसा आणि हारुनला फिरऔन व त्याच्या सरदारांकडे चमत्कार घेऊन पाठविले, तेव्हा त्या लोकांनी घमेंड दाखविली आणि ते अपराधी जनसमूहाचे लोक होते.
آية رقم 76
७६. मग जेव्हा त्यांच्याजवळ आमच्याकडून सत्य (प्रमाण) पोहोचले तेव्हा ते लोक म्हणू लागले की निःसंशय, ही तर उघड जादू आहे.
آية رقم 77
७७. मूसा म्हणाले, काय तुम्ही या सत्याविषयी, जेव्हा ते तुमच्याजवळ येऊन पोहोचले आहे, अशा गोष्टी बोलता? काय ही जादू आहे, वस्तुतः जादूगार सफल होत नाही?
آية رقم 78
७८. ते लोक म्हणाले, काय तुम्ही आमच्याजवळ अशासाठी आला आहात की आम्हाला त्या मार्गापासून हटवून द्यावे, ज्या मार्गावर आम्ही आपल्या पूर्वजांना पाहिले आहे, आणि तुम्हा दोघांना जगात मोठेपणा मिळावा आणि आम्ही तर तुम्हा दोघांना कधीही माानणार नाही.
آية رقم 79
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७९. आणि फिरऔन म्हणाला, माझ्याजवळ समस्त निष्णात जादूगारांना घेऊन या.
آية رقم 80
८०. मग जेव्हा जादूगार आले तेव्हा मूसा त्यांना म्हणाले की टाका जे काही तुम्ही टाकू इच्छिता.
آية رقم 81
८१. तर जेव्हा त्यांनी टाकले तेव्हा मूसा म्हणाले की हे जे काही तुम्ही आणले आहे, जादू आहे. निश्चितच अल्लाह याला आताच नष्ट करून टाकील, निःसंशय अल्लाह अशा उपद्रवी लोकांचे काम बनू देत नाही.
آية رقم 82
८२. आणि अल्लाह खऱ्या पुराव्याला आपल्या कथनाने स्पष्ट करतो, मग अपराध्याला कितीही वाईट वाटो.
آية رقم 83
८३. मग मूसावर त्यांच्या जनसमूहाच्या लोकांपैकी केवळ थोड्याच लोकांनी ईमान राखले, तेही फिरऔन आणि आपल्या सरदारांशी भय राखत की कदाचित त्यांना दुःख न पोहचावे आणि खरोखर फिरऔन त्या देशात उच्च (शक्तिशाली) होता आणि ही गोष्टदेखील होती की तो मर्यादेच्या बाहेर गेला होता.
آية رقم 84
८४. आणि मूसा म्हणाले, हे माझ्या जाती-समूहाच्या लोकांनो! जर तुम्ही अल्लाहवर ईमान राखत असाल तर त्याच्यावरच भरवसा करा जर तुम्ही मुसलमान (अल्लाहचे आज्ञाधारक) असाल.
آية رقم 85
८५. तेव्हा ते म्हणाले, आम्ही तर अल्लाहवरच भरोसा केला आहे. हे आमच्या पालनकर्त्या! आम्हाला या अत्याचारी लोकांसाठी उपद्रवा (चे लक्ष्य) बनवू नका.
آية رقم 86
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८६. आणि आम्हाला आपल्या दया- कृपेने या काफिरांपासून सुटका प्रदान कर.
آية رقم 87
८७. आणि आम्ही मूसा व त्याच्या भावाकडे वहयी (अवतरित संदेश) पाठविला की तुम्ही दोघे आपल्या या लोकांकरिता मिस्र देशात घर कायम राखा आणि तुम्ही सर्व त्याच घरांना नमाज पढण्याचे स्थान निश्चित करा आणि नित्य नेमाने नमाज अदा करा आणि तुम्ही ईमान राखणाऱ्यांना खूशखबर द्या.
آية رقم 88
८८. आणि मूसा यांनी दुआ- प्रार्थना केली, हे माझ्या पालनहार! तू, फिरऔन आणि त्याच्या सरदारांना शोभा सजावट आणि सर्व प्रकारची धन-दौलत या जगाच्या जीवनात प्रदान केली. हे आमच्या पालनकर्त्या! (अशासाठी प्रदान केली) की त्यांनी तुझ्या मार्गापासून आम्हाला दूर करावे. हे आमच्या पालनकर्त्या! त्यांच्या धन-दौलतीला उद्ध्वस्त करून टाक आणि त्यांच्या हृदयांना सक्त (कठोर) बनव, यासाठी की त्यांना ईमान राखणे अशक्य व्हावे, येथपर्यंत की त्यांनी दुःखदायक अज़ाब (शिक्षा-यातना) पाहून घ्यावी.
آية رقم 89
८९. (सर्वश्रेष्ठ अल्लाहने) फर्माविले, तुम्हा दोघांची दुआ- प्रार्थना कबूल केली गेली. तुम्ही सरळ मार्गावर राहा आणि अशा लोकांच्या मार्गावर चालू नका, जे नादान आहेत.
آية رقم 90
९०. आणि आम्ही इस्राईलच्या संततीला समुद्रापार केले, मग त्यांच्या पाठोपाठ फिरऔन आपल्या सैन्यासह जुलूम आणि अतिरेक करण्याच्या हेतुने निघाला. येथेपर्यंत की जेव्हा तो बुडायला लागला तेव्हा म्हणाला, मी ईमान राखतो की ज्यावर इस्राईलच्या संततीने ईमान राखले आहे. त्याच्याखेरीज कोणीही उपासनेस पात्र नाही आणि मी इस्लाम स्वीकारणाऱ्यांपैकी आहे.
آية رقم 91
९१. (उत्तरादाखल फर्माविले गेले) आता ईमान राखतो, आणि पूर्वी तर अवज्ञा करीत राहिला आणि उपद्रवी लोकांत सामील राहिला.
آية رقم 92
९२. तेव्हा आज आम्ही तुझ्या मृत शरीराला सोडून देऊ, यासाठी की तू त्या लोकांसाठी बोधचिन्ह ठरावे, जे तुझ्यानंतर (येणार आहेत. आणि निःसंशय अधिकांश लोक आमच्या निशाण्यांपासून गाफील आहेत.
آية رقم 93
९३. आणि आम्ही इस्राईलच्या संततीला फार उत्तम राहण्याचे ठिकाण दिले आणि आम्ही त्यांना स्वच्छ- शुद्ध वस्तू खाण्यासाठी प्रदान केल्या, तेव्हा त्यांनी मतभेद केला नाही, येथपर्यंत की त्यांच्याजवळ ज्ञान येऊन पोहोचले. निःसंशय, तुमचा पालनकर्ता त्यांच्या दरम्यान कयामतच्या दिवशी त्या गोष्टींबाबत निर्णय करील, ज्यात ते मतभेद करीत होते.
آية رقم 94
९४. मग जर तुम्ही त्याच्याविषयी संशयग्रस्त असाल, जे आम्ही तुमच्याकडे पाठविले आहे तर तुम्ही त्या लोकांना विचारा जे तुमच्या पूर्वीच्या ग्रंथांचे पठण करतात. निःसंशय तुमच्याजवळ तुमच्या पालनकर्त्यातर्फे सत्यनिष्ठ ग्रंथ आला आहे तेव्हा तुम्ही कधीही शंका करणाऱ्यांपैकी होऊ नका.
آية رقم 95
९५. आणि ना अशा लोकांपैकी व्हा, ज्यांनी सर्वश्रेष्ठ अल्लाहच्या आयतींना खोटे ठरविले अन्यथा तुम्ही तोटा उचलणाऱ्यांपैकी व्हाल.
آية رقم 96
९६. निःसंशय, ज्या लोकांविषयी तुमच्या पालनकर्त्याचे फर्मान खरे ठरले आहे, ते ईमान राखणार नाहीत.
آية رقم 97
९७. मग त्यांच्याजवळ सर्व निशाण्या पोहचल्या असल्या तरी, जोपर्यंत ते दुःखदायक अज़ाब पाहून न घेतील.
آية رقم 98
९८. यास्तव कोणत्याही वस्तीने ईमान राखले नाही की ईमान राखले त्यांच्यासाठी लाभदायक ठरले असते, यूनुसच्या जनसमूहाखेरीज. जेव्हा त्यांनी ईमान राखले तेव्हा आम्ही अपमानाचा अज़ाब (प्रकोप) या जगाच्या जीवनात त्यांच्या वरून हटविला आणि त्यांना एका (निश्चित) वेळेपर्यंत सुख भोगण्याचा अवसर दिला.
آية رقم 99
९९. आणि जर तुमच्या पालनकर्त्याने इच्छितले असते तर साऱ्या धरतीच्या समस्त लोकांनी ईमान राखले असते. तर काय तुम्ही लोकांना विवश करू शकता की त्यांनी ईमानधारक व्हावेच.
آية رقم 100
१००. वास्तविक एखाद्याचे ईमान राखणे अल्लाहच्या हुकूमाविना शक्य नाही आणि अल्लाह, अक्कल नसलेल्यांना गलिच्छतेत टाकतो.
آية رقم 101
१०१. तुम्ही सांगा की जरा विचार करा की आकाशांमध्ये व धरतीत कस-कशा वस्तू आहेत आणि जे लोक ईमान राखत नाहीत त्यांना निशाणी आणि चेतावणी कसलाही लाभ पोहचवित नाही.
آية رقم 102
१०२. तेव्हा काय ते लोक केवळ त्या लोकांसारख्या घटनांची वाट बघत आहेत ज्या त्यांच्यापूर्वी होऊन गेल्यात. (तुम्ही) सांगा की ठीक आहे, तर तुम्ही वाट बघत राहा. मीदेखील तुमच्यासोबत वाट बघणाऱ्यांपैकी आहे.
آية رقم 103
१०३. मग आम्ही आपल्या पैगंबरांना आणि ईमान राखणाऱ्यांना वाचवित होतो. अशा प्रकारे आमच्या अधिकारात आहे की आम्ही ईमानधारकांना सुटका देत असतो.
آية رقم 104
१०४. (तुम्ही) सांगा, हे लोकांनो! जर तुम्ही माझ्या दीन- धर्माविषयी संशयग्रस्त असाल तर मी त्या दैवतांची उपासना करीत नाही, ज्यांची तुम्ही अल्लाहला सोडून भक्ती- आराधना करतात, परंतु हो, त्या अल्लाहची उपासना करतो जो तुमचा प्राण बाहेर काढतो आणि मला आदेश दिला गेला आहे की मी ईमान राखणाऱ्यांपैकी राहावे.
آية رقم 105
१०५. आणि हे की एकाग्रचित्त होऊन आपले तोंड या दीन- धर्माकडे करावे आणि कधीही अनेकेश्वरवाद्यांपैकी न बनावे.
آية رقم 106
१०६. आणि अल्लाहला सोडून कधीही अशा वस्तूला पुकारू नका जी तुम्हाला ना काही फायदा पोहचवू शकेल आणि ना काही नुकसान पोहचवू शकेल तरीही जर तुम्ही असे करला तर अशा स्थितीत तुम्ही जुलमी लोकांपैकी ठराल.
آية رقم 107
१०७. आणि जर तुम्हाला अल्लाह एखादे दुःख पोहचविल तर त्याच्याशिवाय ते दुःख दूर करणारा दुसरा कोणीही नाही आणि जर तो तुम्हाला एखादे सुख देऊ इच्छिल तर त्याच्या कृपेला कोणीही हटविणार नाही. तो आपली कृपा आपल्या दासांपैकी ज्यावर इच्छिल प्रदान करील, आणि तो मोठा माफ करणारा आणि अतिशय दया करणारा आहे.
آية رقم 108
१०८. (तुम्ही) सांगा, हे लोकांनो! तुमच्याजवळ, तुमच्या पालनकर्त्यातर्फे सत्य घेऊन पोहचले आहे. यास्तव जो मनुष्य सरळ मार्गावर येईल, तर तो स्वतः (च्या भल्या) साठी सरळ मार्गावर येईल आणि जो मनुष्य सरळ मार्गापासून भटकला तर त्याचे संकट त्याच्यावरच कोसळेल आणि मी तुमच्यावर देखरेख ठेवणारा बनविलो गेलो नाही.
آية رقم 109
१०९. आणि तुम्ही त्याचे अनुसरण करीत राहा, जे काही वहयी (अवतरित आदेश) तुमच्याकडे पाठविले जात आहे आणि धीर-संयम राखा, येथपर्यंत की अल्लाहने निर्णय करावा आणि तो समस्त शासकांपेक्षा उत्तम शासक आहे.
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