ترجمة معاني سورة القيامة باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الناشر

مجمع الملك فهد

آية رقم 1
मैं शपथ लेता हूँ क़्यामत (प्रलय) के दिन[1] की!
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1. किसी चीज़ की शपथ लेने का अर्थ होता है उस का निश्चित् होना। अर्थात प्रलय का होना निश्चित् है।
آية رقم 2
तथा शपथ लेता हूँ निन्दा[1] करने वाली अन्तरात्मा की।
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1. मनुष्य के अन्तरात्मा की यह विशेषता है कि वह बुराई करने पर उस की निन्दा करती है।
آية رقم 3
क्या मनुष्य समझता है कि हम एकत्र नहीं कर सकेंगे दोबारा उसकी अस्थियों को?
آية رقم 4
क्यों नहीं? हम सामर्थ्वान हैं इस बात पर कि सीधी कर दें, उसकी उंगलियों की पोर-पोर।
آية رقم 5
बल्कि मनुष्य चाहता है कि वह कुकर्म करता रहे अपने आगे[1] भी।
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1. अर्थात वह प्रलय तथा ह़िसाब का इन्कार इस लिये करता है ताकि वह पूरी आयु कुकर्म करता रहे।
آية رقم 6
वह प्रश्न करता है कि कब आना है प्रलय का दिन?
آية رقم 7
तो जब चुंधिया जायेगी आँख।
آية رقم 8
और गहना जायेगा चाँद।
آية رقم 9
और एकत्र कर दिये[1] जायेंगे सूर्य और चाँद।
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1. अर्थात दोनों पश्चिम से अन्धेरे हो कर निकलेंगे।
آية رقم 10
कहेगा मनुष्य उस दिन कि कहाँ है भागने का स्थान?
آية رقم 11
कदापि नहीं, कोई शरणागार नहीं।
آية رقم 12
तेरे पालनहार की ओर ही उस दिन जाकर रुकना है।
آية رقم 13
सूचित कर दिया जायेगा मनुष्य को उस दिन उससे, जो उसने आगे भेजा तथा जो पीछे[1] छोड़ा।
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1. अर्थात संसार में जो कर्म किया। और जो करना चाहिये था फिर भी नहीं किया।
آية رقم 14
बल्कि मनुष्य स्वयं अपने विरुध्द एक खुला[1] प्रमाण है।
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1. अर्थात वह अपने अपराधों को स्वयं भी जानता है क्योंकि पापी का मन स्वयं अपने पाप की गवाही देता है।
آية رقم 15
चाहे वह कितने ही बहाने बनाये।
آية رقم 16
हे नबी! आप न हिलायें[1] अपनी ज़ुबान, ताकि शीघ्र याद कर लें इस क़ुर्आन को।
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1. ह़दीस में है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फ़रिश्ते जिब्रील से वह़्यी पूरी होने से पहले इस भय से उसे दुहराने लगते कि कुछ भूल न जायें। उसी पर यह आयत उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4928, 4929) इसी विषय को सूरह ताहा तथा सूरह आला में भी दुहराया गया है।
آية رقم 17
निश्चय हमपर है उसे याद कराना और उसे पढ़ाना।
آية رقم 18
अतः, जब हम उसे पढ़ लें, तो आप उसके पीछे पढ़ें।
آية رقم 19
फिर हमारे ही ऊपर है, उसका अर्थ बताना।
آية رقم 20
कदापि नहीं[1], बल्कि तुम प्रेम करते हो शीघ्र प्राप्त होने वाली चीज़ (संसार) से।
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1. यहाँ से बात फिर काफ़िरों की ओर फिर रही है।
آية رقم 21
और छोड़ देते हो परलोक को।
آية رقم 22
बहुत-से मुख उस दिन प्रफुल्ल होंगे।
آية رقم 23
अपने पालनहार की ओर देख रहे होंगे।
آية رقم 24
और बहुत-से मुख उदास होंगे।
آية رقم 25
वह समझ रहे होंगे कि उनके साथ कड़ा व्यवहार किया जायेगा।
آية رقم 26
कदापि नहीं[1], जब पहुँचेगी प्राण हंसलियों (गलों) तक।
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1. अर्थात यह विचार सह़ीह़ नहीं कि मौत के पश्चात् सड़-गल जायेंगे और दोबारा जीवित नहीं किये जायेंगे। क्योंकि आत्मा रह जाती है जो मौत के साथ ही अपने पालनहार की ओर चली जाती है।
آية رقم 27
और कहा जायेगाः कौन झाड़-फूँक करने वाला है?
آية رقم 28
और विश्वास हो जायेगा कि ये (संसार से) जुदाई का समय है।
آية رقم 29
और मिल जायेगी पिंडली, पिंडली[1] से।
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1. अर्थात मौत का समय आ जायेगा जो निरन्तर दुःख का समय होगा। (इब्ने कसीर)
آية رقم 30
तेरे पालनहार की ओर उसी दिन जाना है।
آية رقم 31
तो न उसने सत्य को माना और न नमाज़ पढ़ी।
آية رقم 32
किन्तु झुठलाया और मुँह फेर लिया।
آية رقم 33
फिर, गया अपने परिजनों की ओर अकड़ता हआ।
آية رقم 34
शोक है तेरे लिए, फिर शोक है।
آية رقم 35
फिर शोक है तेरे लिए, फिर शोक है।
آية رقم 36
क्या मनुष्य समझता है कि वह छोड़ दिया जायेगा व्यर्थ?[1]
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1. अर्थात न उसे किसी बात का आदेश दिया जायेगा और न रोका जायेगा और न उस से कर्मों का ह़िसाब लिया जायेगा।
آية رقم 37
क्या वह नहीं था वीर्य की बूंद, जो (गर्भाशय में) बूँद-बूँद गिराई जाती है।?
آية رقم 38
फिर वह बंधा रक्त हुआ, फिर अल्लाह ने उसे पैदा किया और उसे बराबर बनाया।
آية رقم 39
फिर उसका जोड़ाः नर और नारी बनाया।
آية رقم 40
तो क्या वह सामर्थ्यवान नहीं कि मुर्दों को जीवित कर दे?
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