ترجمة معاني سورة إبراهيم باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية
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عادل صلاحي
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آية رقم 1
अलिफ़, लाम, रा। ये (क़ुर्आन) एक पुस्तक है, जिसे हमने आपकी ओर अवतरित किया है, ताकि आप लोगों को अंधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर लायें, उनके पालनहार की अनुमति से, उसकी राह की ओर, जो बड़ा प्रबल सराहा हुआ है।
آية رقم 2
अल्लाह की ओर। जिसके अधिकार में आकाश और धरती का सब कुछ है तथा काफ़िरों के लिए कड़ी यातना के कारण विनाश है।
آية رقم 3
जो सांसारिक जीवन को परलोक पर प्रधानता देते हैं, अल्लाह की डगर ( इस्लाम) से रोकते हैं और उसे कुटिल बनाना चाहते हैं, वही कुपथ में दूर निकल गये हैं।
آية رقم 4
और हमने किसी (भी) रसूल को उसकी जाति की भाषा ही में भेजा, ताकि वह उनके लिए बात उजागर कर दे। फिर अल्लाह जिसे चाहता है, कुपथ करता है और जिसे चाहता है, सुपथ दर्शा देता है और वही प्रभुत्वशाली और ह़िक्मत वाला है।
آية رقم 5
और हमने मूसा को अपनी आयतों (चमत्कारों) के साथ भेजा, ताकि अपनी जाति को अन्धेरों से निकालकर प्रकाश की ओर लायें और उन्हें अल्लाह के दिनों (पुरस्कार और यातना) का स्मरण करायें। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ हैं, प्रत्येक अति सहनशील, कृतज्ञ के लिए।
آية رقم 6
तथा (याद करो) जब मूसा ने अपनी जाति से कहाः अपने ऊपर अल्लाह के पुरस्कार को याद करो, जब उसने तुम्हें फ़िरऔनियों से मुक्त किया, जो तुम्हें घोर यातना दे रहे थे, तुम्हारे पुत्रों को वध कर रहे थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते[1] थे और इसमें तुम्हारे परलनहार की ओर से एक महान परीक्षा थी।
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1. ताकि उन के पुरुषों की अधिक संख्या से अपने राज्य के लिये भय न हो। और उन की स्त्रियों का अपमान करें।
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1. ताकि उन के पुरुषों की अधिक संख्या से अपने राज्य के लिये भय न हो। और उन की स्त्रियों का अपमान करें।
آية رقم 7
तथा (याद करो) जब तुम्हारे पालनहार ने घोषणा कर दी कि यदि तुम कृतज्ञ बनोगे, तो तुम्हें और अधिक दूँगा तथा यदि अकृतज्ञ रहोगे, तो वास्तव में मेरी यातना बहुत कड़ी है।
آية رقم 8
और मूसा ने कहाः यदि तुम और सभी लोग जो धरती में हैं, कुफ़्र करें, तो भी अल्लाह निरीह तथा[1] सराहा हुआ है।
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1. ह़दीस में आया है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है। हे मेरे बंदो! यदि तुम्हारे अगले पिछले तथा सब मनुष्य और जिन्न संसार के सब से बुरे मनुष्य के बराबर हो जायें तो भी मेरे राज्य में कोई कमी नहीं आयेगी। (सह़ीह़ मुस्लिमः2577)
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1. ह़दीस में आया है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है। हे मेरे बंदो! यदि तुम्हारे अगले पिछले तथा सब मनुष्य और जिन्न संसार के सब से बुरे मनुष्य के बराबर हो जायें तो भी मेरे राज्य में कोई कमी नहीं आयेगी। (सह़ीह़ मुस्लिमः2577)
آية رقم 9
क्या तुम्हारे पास उनका समाचार नहीं आया, जो तुमसे पहले थे; नूह़, आद और समूद की जाति का और जो उनके पश्चात् हुए, जिन्हें अल्लाह ही जानता है? उनके पास उनके रसूल प्रत्यक्ष प्रमाण लाये, तो उन्होंने अपने हाथ अपने मुखों में दे[1] लिए और कह दिया कि हम उस संदेश को नहीं मानते, जिसके साथ तुम भेजे गये हो और वास्तव में, उसके बारे में संदेह में हैं, जिसकी ओर हमें बुला रहे हो, (तथा) द्विधा में हैं।
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1. यह ऐसी ही भाषा शैली है, जिसे हम अपनी भाषा में बालते हैं कि कानों पर हाथ रख लिया, और दाँतो से उँगली दबा ली।
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1. यह ऐसी ही भाषा शैली है, जिसे हम अपनी भाषा में बालते हैं कि कानों पर हाथ रख लिया, और दाँतो से उँगली दबा ली।
آية رقم 10
उनके रसूलों ने कहाः क्या उस अल्लाह के बारे में संदेह है, जो आकाशों तथा धरती का रचयिता है। वह तुम्हें बुला[1] रहा है, ताकि तुम्हारे पाप क्षमा कर दे और तुम्हें एक निर्धारित[2] अवधि तक अवसर दे। उन्होंने कहाः तो तुम हमारे ही जैसे एक मानव पुरुष हो, तुम चाहते हो कि हमें उससे रोक दो, जिसकी पूजा हमारे बाप-दादा कर रहे थे। तुम हमारे पास कोई प्रत्यक्ष प्रमान लाओ।
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1. अपनी आज्ञा पालन की ओर। 2. अर्थात मरण तथा संसारिक यातना से सुरक्षित रखे। (क़ुर्तुबी)
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1. अपनी आज्ञा पालन की ओर। 2. अर्थात मरण तथा संसारिक यातना से सुरक्षित रखे। (क़ुर्तुबी)
آية رقم 11
उनसे उनके रसूलों ने कहाः हम तुम्हारे जैसे मानव पुरुष ही हैं, परन्तु अल्लाह अपने भक्तों में से जिसपर चाहे, उपकार करता है और हमारे बस में नहीं कि अल्लाह की अनुमति के बिना कोई प्रमाण ले आयें और अल्लाह हीपर ईमान वालों को भरोसा करना चाहिए।
آية رقم 12
और क्या कारण है कि हम अल्लाह पर भरोसा न करें, जबकि उसने हमें हमारी राहें दर्शा दी हैं? और हम अवश्य उस दुःख को सहन करेंगे, जो तुम हमें दोगे और अल्लाह हीपर भरोसा करने वालों को निर्भर रहना चाहिए।
آية رقم 13
और काफ़िरों ने अपने रसूलों से कहाः हम अवश्य तुम्हें अपने देश से निकाल देंगे अथवा तुम्हें हमारे पंथ में आना होगा। तो उनके पालनहार ने उनकी ओर वह़्यी की कि हम अवश्य अत्याचारियों को विनाश कर देंगे।
آية رقم 14
और तुम्हें उनके पश्चात् धरती में बसा देंगे, ये उसके लिए है, जो मेरे महिमा से खड़े[1] होने से डरा तथा मेरी चेतावनी से डरा।
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1. अर्थात संसार में मेरी महिमा का विचार कर के सदाचार किया।
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1. अर्थात संसार में मेरी महिमा का विचार कर के सदाचार किया।
آية رقم 15
ﮣﮤﮥﮦﮧ
ﮨ
और उन (रसूलों) ने विजय की प्रार्थना की, तो सभी उद्दंड विरोधी असफल हो गये।
آية رقم 16
उसके आगे नरक है और उसे पीप का पानी पिलाया जायेगा।
آية رقم 17
वह उसे थोड़ा-थोड़ा गले से उतारेगा, मगर उतार नहीं पायेगा और उसके पास प्रत्येक स्थान से मौत आयेगी जबकि वह मरेगा नहीं और उसके आगे भीषण यातना होगी।
آية رقم 18
जिन लोगों ने अपने पालनहार के साथ कुफ़्र किया, उनके कर्म उस राख के समान हैं, जिसे आँधी के दिन की प्रचण्ड वायु ने उड़ा दिया हो। ये लोग अपने किये में से कुछ नहीं पा सकेंगे, यही (सत्य से) दूर का कुपथ है।
آية رقم 19
क्या तूने नहीं देखा कि अल्लाह ही ने आकाशों तथा धरती की रचना सत्य के साथ की है, यदि वह चाहे, तो तुम्हें ले जाये और नई उत्पत्ति ले आये?
آية رقم 20
ﭡﭢﭣﭤﭥ
ﭦ
और वह अल्लाह पर कठिन नहीं है।
آية رقم 21
और सब अल्लाह के सामने खुलकर[1] आ जायेंगे, तो निर्बल लोग उनसे कहेंगे, जो बड़े बन रहे थे कि हम तुम्हारे अनुयायी थे, तो क्या तुम अल्लाह की यातना से बचाने के लिए हमारे कुछ काम आ सकोगे? वे कहेंगेः यदि अल्लाह ने हमें मार्गदर्शन दिया होता, तो हम अवश्य तुम्हें मार्गदर्शन दिखा देते। अब तो समान है, चाहे हम अधीर हों या धैर्य से काम लें, हमारे बचने का कोई उपाय नहीं है।
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1. अर्थात प्रलय के दिन अपनी समाधियों से निकल कर।
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1. अर्थात प्रलय के दिन अपनी समाधियों से निकल कर।
آية رقم 22
और शैतान कहेगा, जब निर्णय कर दिया[1] जायेगाः वास्तव में, अल्लाह ने तुम्हें सत्य वचन दिया था और मैंने तुम्हें वचन दिया, तो अपना वचन भंग कर दिया और मेरा तुमपर कोई दबाव नहीं था, परन्तु ये कि मैंने तुम्हें (अपनी ओर) बुलाया और तुमने मेरी बात स्वीकार कर ली। अतः मेरी निन्दा न करो, स्वयं अपनी निंदा करो, न मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ और न तुम मेरी सहायता कर सकते हो। वास्तव में, मैंने उसे स्वीकार कर लिया, जो इससे पहले[2] तुमने मुझे अल्लाह का साझी बनाया था। निःसंदेह अत्याचारियों के लिए दुःखदायी यातना है।
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1. स्वर्ग और नरक के योग्य का निर्णय कर दिया जायेगा। 2. संसार में।
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1. स्वर्ग और नरक के योग्य का निर्णय कर दिया जायेगा। 2. संसार में।
آية رقم 23
और जो ईमान लाये और सदाचार करते रहे, उन्हें ऐसे स्वर्गों में प्रवेश दिया जायेगा, जिनमें नहरें बहती होंगी। वे अपने पालनहार की अनुमति से उसमें सदा रहने वाले होंगे और उसमें उनका स्वागत ये होगाः तुमपर शान्ति हो।
آية رقم 24
(हे नबी!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह ने कलिमा तय्येबा[1]( पवित्र शब्द) का उदाहरण एक पवित्र वृक्ष से दिया है, जिसकी जड़ (भूमि में) सुदृढ़ स्थित है और उसकी शाखा आकाश में है?
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1. (कलिमा तय्यिबा) से अभिप्राय "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। जो इस्लाम का धर्म सूत्र है। इस का अर्थ यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। और यही एकेश्वरवाद का मूलाधार है। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा कहते हैं कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के पास थे कि आप ने कहाः मुझे ऐसा वृक्ष बताओ जो मुसलमान के समान होता है। जिस का पत्ता नहीं गिरता, तथा प्रत्येक समय अपना फल दिया करता है? इब्ने उमर ने कहाः मेरे मन में यह बात आयी कि वह खजूर का वृक्ष है। और अबू बक्र तथा उमर को देखा कि बोल नहीं रहे हैं, इस लिये मैं ने भी बोलना अच्छा नहीं समझा। जब वे कुछ नहीं बोले तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः वह खजूर का वृक्ष है। (संक्षिप्त अनुवाद के साथ, सह़ीह़ बुख़ारीः4698, सह़ीह़ मुस्लिमः2811)
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1. (कलिमा तय्यिबा) से अभिप्राय "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। जो इस्लाम का धर्म सूत्र है। इस का अर्थ यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। और यही एकेश्वरवाद का मूलाधार है। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा कहते हैं कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के पास थे कि आप ने कहाः मुझे ऐसा वृक्ष बताओ जो मुसलमान के समान होता है। जिस का पत्ता नहीं गिरता, तथा प्रत्येक समय अपना फल दिया करता है? इब्ने उमर ने कहाः मेरे मन में यह बात आयी कि वह खजूर का वृक्ष है। और अबू बक्र तथा उमर को देखा कि बोल नहीं रहे हैं, इस लिये मैं ने भी बोलना अच्छा नहीं समझा। जब वे कुछ नहीं बोले तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः वह खजूर का वृक्ष है। (संक्षिप्त अनुवाद के साथ, सह़ीह़ बुख़ारीः4698, सह़ीह़ मुस्लिमः2811)
آية رقم 25
वह अपने पालनहार की अनुमति से प्रत्येक समय फल दे रहा है और अल्लाह लोगों को उदाहरण दे रहा है, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।
آية رقم 26
और बुरी[1] बात का उदाहरण एक बुरे वृक्ष जैसा है, जिसे धरती के ऊपर से उखाड़ दिया गया हो, जिसके लिए कोई स्थिरता नहीं है।
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1. अर्थात शिर्क तथा मिश्रणवाद की बात।
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1. अर्थात शिर्क तथा मिश्रणवाद की बात।
آية رقم 27
अल्लाह ईमान वालों को स्थिर[1] कथन के सहारे लोक तथा परलोक में स्थिरता प्रदान करता है तथा अत्याचारियों को कुपथ कर देता है और अल्लाह जो चाहता है, करता है।
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1. स्थिर तथा दृढ़ कथन से अभिप्रेत "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। (क़ुर्तुबी) बराअ बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि आप ने कहाः मुसलमान से जब क़ब्र में प्रश्न किया जाता है, तो वह "ला इलाहा इल्लल्लाह मुह़म्मदुर् रसूलुल्लाह" की गवाही देता है। अर्थात अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। इसी के बारे में यह आयत है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4699)
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1. स्थिर तथा दृढ़ कथन से अभिप्रेत "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। (क़ुर्तुबी) बराअ बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि आप ने कहाः मुसलमान से जब क़ब्र में प्रश्न किया जाता है, तो वह "ला इलाहा इल्लल्लाह मुह़म्मदुर् रसूलुल्लाह" की गवाही देता है। अर्थात अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। इसी के बारे में यह आयत है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 4699)
آية رقم 28
क्या आपने उन्हें[1] नहीं देखा, जिन्होंने अल्लाह के अनुग्रह को कुफ़्र से बदल दिया और अपनी जाति को विनाश के घर में उतार दिया।
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1. अर्थात मक्का के मुश्रिक जिन्हों ने आप का विरोध किया। (देखियेः सह़ीह़ बुख़ारीः4700)
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1. अर्थात मक्का के मुश्रिक जिन्हों ने आप का विरोध किया। (देखियेः सह़ीह़ बुख़ारीः4700)
آية رقم 29
ﮐﮑﮒﮓﮔ
ﮕ
(अर्थात) नरक में, जिसमें वे झोंके जायेंगे और वह रहने का बुरा स्थान है।
آية رقم 30
और उन्होंने अल्लाह के साझी बना लिए, ताकि उसकी राह (सत्धर्म) से कुपथ कर दें। आप कह दें कि तनिक आनन्द ले लो, फिर तुम्हें नरक की ओर ही जाना है।
آية رقم 31
(हे नबी!) मेरे उन भक्तों से कह दो, जो ईमान लाये हैं कि नमाज़ की स्थापना करें और उसमें से, जो हमने प्रदान किया है, छुपे और खुले तरीक़े से दान करें, उस दिन के आने से पहले, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न कोई मैत्री।
آية رقم 32
और अल्लाह वही है, जिसने तुम्हारे लिए आकाशों तथा धरती की उत्पत्ति की और आकाश से जल बरसाया, फिर उससे तुम्हारी जीविका के लिए अनेक प्रकार के फल निकाले और नौका को तुम्हारे वश में किया, ताकि सागर में उसके आदेश से चले और नदियों को तुम्हारे लिए वशवर्ती किया।
آية رقم 33
तथा तुम्हारे लिए सूर्य और चाँद को काम में लगाया, जो दोनों निरन्तर चल रहे हैं और तुम्हार लिए रात्री और दिवस को वश में[1] कर दिया।
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1. वश में करने का अर्थ यह है कि अल्लाह ने इन के ऐसे नियम बना दिये हैं, जिन के कारण यह मानव के लिये लाभदायक हो सकें।
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1. वश में करने का अर्थ यह है कि अल्लाह ने इन के ऐसे नियम बना दिये हैं, जिन के कारण यह मानव के लिये लाभदायक हो सकें।
آية رقم 34
और तुम्हें उससब में से कुछ दिया, जो तुमने माँगा[1] और यदि तुम अल्लाह के पुरस्कारों की गणना करना चाहो, तो भी नहीं कर सकते। वास्तव में, मनुष्य बड़ा अत्याचारी कृतघ्न (ना शुकरा) है।
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1. अर्थात तुम्हारी प्रत्येक प्राकृतिक माँग पूरी की, और तुम्हारे जीवन की आवश्यक्ता के सभी संसाधनों की व्यवस्था कर दी।
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1. अर्थात तुम्हारी प्रत्येक प्राकृतिक माँग पूरी की, और तुम्हारे जीवन की आवश्यक्ता के सभी संसाधनों की व्यवस्था कर दी।
آية رقم 35
तथा (याद करो) जब इब्राहीम ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! इस नगर (मक्का) को शान्ति का नगार बना दे और मुझे तथा मेरे पुत्रों को मूर्ति-पूजा से बचा ले।
آية رقم 36
मेरे पालनहार! इन मूर्तियों ने बहुत-से लोगों को कुपथ किया है, अतः जो मेरा अनुयायी हो, वही मेरा है और जो मेरी अवज्ञा करे, तो वास्तव में, तू अति क्षमाशील, दयावान् है।
آية رقم 37
हमारे पालनहार! मैंने अपनी कुछ संतान मरुस्थल की एक वादी (उपत्यका) में तेरे सम्मानित घर (काबा) के पास बसा दी है, ताकि वे नमाज़ की स्थापना करें। अतः लोगों के दिलों को उनकी ओर आकर्षित कर दे और उन्हें जीविका प्रदान कर, ताकि वे कृतज्ञ हों।
آية رقم 38
हमारे पालनहार! तू जानता है, जो हम छुपाते और जो व्यक्त करते हैं और अल्लाह से कुछ छुपा नहीं रहता, धरती में और न आकाशों में।
آية رقم 39
सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने मुझे बुढ़ापे में (दो पुत्र) इस्माईल और इस्ह़ाक़ प्रदान किये। वास्तव में, मेरा पालनहार प्रार्थना अवश्य सुनने वाला है।
آية رقم 40
मेरे पालनहार! मुझे नमाज़ की स्थापना करने वाला बना दे तथा मेरी संतान को। हे मेरे पालनहर! और मेरी प्रार्थना स्वीकार कर।
آية رقم 41
हे मेरे पालनहार! मूझे क्षमा कर दे तथा मेरे माता-पिता और ईमान वालों को, जिस दिन ह़िसाब लिया जायेगा।
آية رقم 42
और तुम कदापि अल्लाह को, उससे अचेत न समझो, जो अत्याचारी कर रहे हैं! वह तो उन्हें उस[1] दिन के लिए टाल रहा है, जिस जिन आँखें खुली रह जायेँगी।
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1. अर्थात प्रलय के दिन के लिये।
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1. अर्थात प्रलय के दिन के लिये।
آية رقم 43
वे दौड़ते हुए अपने सिर ऊपर किये हुए होंगे, उनकी आँखें उनकी ओर नहीं फिरेंगी और उनके दिल गिरे[1] हुए होंगे।
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1. यहाँ अर्बी भाषा का शब्द "हवाअ" प्रयुक्त हुआ है। जिस का एक अर्थ शून्य (ख़ाली), अर्थात भय के कारण उसे अपनी सुध न होगी।
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1. यहाँ अर्बी भाषा का शब्द "हवाअ" प्रयुक्त हुआ है। जिस का एक अर्थ शून्य (ख़ाली), अर्थात भय के कारण उसे अपनी सुध न होगी।
آية رقم 44
(हे नबी!) आप लोगों को उस दिन से डरायें, जब उनपर यातना आ जायेगी। तो अत्याचारी कहेंगेः हमारे पालनहार! हमें कुछ समय तक अवसर दे, हम तेरी बात (आमंत्रण) स्वीकार कर लेंगे और रसूलों का अनुसरण करेंगे, क्या तुम वही नहीं हो, जो इससे पहले शपथ ले रहे थे कि हमारा पतन होना ही नहीं है?
آية رقم 45
जबकि तुम उन्हीं की बस्तियों में बसे हो, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया और तुम्हारे लिए उजागर हो गया है कि हमने उनके साथ क्या किया? और हमने तुम्हें बहुत-से उदाहरण भी दिये हैं।
آية رقم 46
और उन्होंने अपना षड्यंत्र रच लिया तथा उनका षड्यंत्र अल्लाह के पास[1] है और उनका षड्यंत्र ऐसा नहीं था कि उससे पर्वत टल जायें।
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1. अर्थात अल्लाह उस को निष्फल करना जानता है।
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1. अर्थात अल्लाह उस को निष्फल करना जानता है।
آية رقم 47
अतः कदापि ये न समझें कि अल्लाह अपने रसूलों से किया वचन भंग करने वाला है, वास्तव में, अल्लाह प्रभुत्वशाली, बदला लेने वाला है।
آية رقم 48
जिस दिन ये धरती दूसरी धरती से तथा आकाश बदल दिये जायेंगे और सब अल्लाह के समक्ष[1] उपस्थित होंगे, जो अकेला प्रभुत्वशाली है।
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1. अर्थात अपनी क़ब्रों (समाधियों) से निकल कर।
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1. अर्थात अपनी क़ब्रों (समाधियों) से निकल कर।
آية رقم 49
ﮭﮮﮯﮰﮱﯓ
ﯔ
और आप उस दिन अपराधियों को ज़ंजीरों में जकड़े हुए देखेंगे।
آية رقم 50
ﯕﯖﯗﯘﯙﯚ
ﯛ
उनके वस्त्र तारकोल के होंगे और उनके मुखों पर अग्नि छायी होगी।
آية رقم 51
ताकि अल्लाह प्रत्येक प्राणी को, उसके किये का बदला दे। निःसंदेह अल्लाह शीघ्र ह़ीसाब लेने वाला है।
آية رقم 52
ये मनुष्यों के लिए एक संदेश है और ताकि इसके द्वारा उन्हें सावधान किया जाये और ताकि वे जान लें कि वही एक सत्य पूज्य है और ताकि मतिमान लोग शिक्षा ग्रहण करें।
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