ترجمة معاني سورة المطفّفين باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية
مولانا عزيز الحق العمري
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آية رقم 1
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विनाश है डंडी मारने वालों का।
آية رقم 2
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जो लोगों से नाप कर लें,, तो पूरा लेते हैं।
آية رقم 3
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ﯥ
और जब उन्हें नाप या तोल कर देते हैं, तो कम देते हैं।
آية رقم 4
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ﯫ
क्या वे नहीं सोचते कि फिर जीवित किये जायेंगे?
آية رقم 5
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एक भीषण दिन के लिए।
آية رقم 6
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जिस दिन सभी, विश्व के पालनहार के सामने खड़े होंगे।[1]
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1. (1-6) इस सूरह की प्रथम छः आयतों में इसी व्यवसायिक विश्वास घात पर पकड़ की गई है कि न्याय तो यह है कि अपने लिये अन्याय नहीं चाहते तो दूसरों के साथ न्याय करो। और इस रोग का निवारण अल्लाह के भय तथा परलोक पर विश्वास ही से हो सकता है। क्योंकि इस स्थिति में निक्षेप (अमानतदारी) एक नीति ही नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य होगा औ इस पर स्थित रहना लाभ तथा हानि पर निर्भर नहीं रहेगा।
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1. (1-6) इस सूरह की प्रथम छः आयतों में इसी व्यवसायिक विश्वास घात पर पकड़ की गई है कि न्याय तो यह है कि अपने लिये अन्याय नहीं चाहते तो दूसरों के साथ न्याय करो। और इस रोग का निवारण अल्लाह के भय तथा परलोक पर विश्वास ही से हो सकता है। क्योंकि इस स्थिति में निक्षेप (अमानतदारी) एक नीति ही नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य होगा औ इस पर स्थित रहना लाभ तथा हानि पर निर्भर नहीं रहेगा।
آية رقم 7
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कदापि ऐसा न करो, निश्चय बुरों का कर्म पत्र "सिज्जीन" में है।
آية رقم 8
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और तुम क्या जानो कि "सिज्जीन" क्या है?
آية رقم 9
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वह लिखित महान पुस्तक है।
آية رقم 10
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उस दिन झुठलाने वालों के लिए विनाश है।
آية رقم 11
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जो प्रतिकार (बदले) के दिन को झुठलाते हैं।
آية رقم 12
तथा उसे वही झुठलाता है, जो महा अत्याचारी और पापी है।
آية رقم 13
जब उनके सामने हमारी आयतों का अध्ययन किया जाता है, तो कहते हैं: पूर्वजों की कल्पित कथायें हैं।
آية رقم 14
सुनो! उनके दिलों पर कुकर्मों के कारण लोहमल लग गया है।
آية رقم 15
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निश्चय वे उस दिन अपने पालनहार (के दर्शन) से रोक दिये जायेंगे।
آية رقم 16
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फिर वे नरक में जायेंगे।
آية رقم 17
फिर कहा जायेगा कि यही है, जिसे तुम मिथ्या मानते थे।[1]
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1. (7-17) इन आयतों में कुकर्मियों के दुषपरिणाम का विवरण दिया गया है। तथा यह बताया गया है कि उन के कुकर्म पहले ही से अपराध पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं। तथा वे परलोक में कड़ी यातना का सामना करेंगे। और नरक में झोंक दिये जायेंगे। "सिज्जीन" से अभिप्राय, एक जगह है जहाँ पर काफ़िरों, अत्याचारियों और मुश्रिकों के कुकर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। दिलों का लोहमल, पापों की कालिमा को कहा गया है। पाप अन्तरात्मा को अन्धकार बना देते हैं तो सत्य को स्वीकार करने की स्वभाविक योग्यता खो देते हैं।
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1. (7-17) इन आयतों में कुकर्मियों के दुषपरिणाम का विवरण दिया गया है। तथा यह बताया गया है कि उन के कुकर्म पहले ही से अपराध पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं। तथा वे परलोक में कड़ी यातना का सामना करेंगे। और नरक में झोंक दिये जायेंगे। "सिज्जीन" से अभिप्राय, एक जगह है जहाँ पर काफ़िरों, अत्याचारियों और मुश्रिकों के कुकर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। दिलों का लोहमल, पापों की कालिमा को कहा गया है। पाप अन्तरात्मा को अन्धकार बना देते हैं तो सत्य को स्वीकार करने की स्वभाविक योग्यता खो देते हैं।
آية رقم 18
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सच ये है कि सदाचारियों के कर्म पत्र "इल्लिय्यीन" में हैं।
آية رقم 19
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और तुम क्या जानो कि "इल्लिय्यीन" क्या है?
آية رقم 20
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एक अंकित पुस्तक है।
آية رقم 21
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जिसके पास समीपवर्ती (फरिश्ते) उपस्थित रहते हैं।
آية رقم 22
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निशचय, सदाचारी आनन्द में होंगे।
آية رقم 23
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सिंहासनों के ऊपर बैठकर सब कुछ देख रहे होंगे।
آية رقم 24
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तुम उनके मुखों से आनंद के चिन्ह अनुभव करोगे।
آية رقم 25
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ﯧ
उन्हें मुहर लगी शुध्द मदिरा पिलाई जायेगी।
آية رقم 26
ये मुहर कस्तूरी की होगी। तो इसकी अभिलाषा करने वालों को इसकी अभिलाषा करनी चाहिये।
آية رقم 27
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उसमें तसनीम मिली होगी।
آية رقم 28
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वह एक स्रोत है, जिससे अल्लाह के समीपवर्ती पियेंगे।[1]
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1. (18-28) इन आयतों में बताया गया है कि सदाचारियों के कर्म ऊँचे पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं जो फ़रिश्तों के पास सुरक्षित हैं। और वे स्वर्ग में सुख के साथ रहेंगे। "इल्लिय्यीन" से अभिप्राय, जन्नत में एक जगह है। जहाँ पर नेक लोगों के कर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। वहाँ पर समीपवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।
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1. (18-28) इन आयतों में बताया गया है कि सदाचारियों के कर्म ऊँचे पत्रों में अंकित किये जा रहे हैं जो फ़रिश्तों के पास सुरक्षित हैं। और वे स्वर्ग में सुख के साथ रहेंगे। "इल्लिय्यीन" से अभिप्राय, जन्नत में एक जगह है। जहाँ पर नेक लोगों के कर्म पत्र तथा प्राण एकत्र किये जाते हैं। वहाँ पर समीपवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।
آية رقم 29
पापी (संसार में) ईमान लाने वालों पर हंसते थे।
آية رقم 30
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और जब उनके पास से गुज़रते, तो आँखें मिचकाते थे।
آية رقم 31
ﰇﰈﰉﰊﰋﰌ
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और जब अपने परिवार में वापस जाते, तो आनंद लेते हुए वापस होते थे।
آية رقم 32
ﰎﰏﰐﰑﰒﰓ
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और जब उन्हें (मोमिनों को) देखते, तो कहते थेः यही भटके हुए लोग हैं।
آية رقم 33
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जबकि वे उनके निरीक्षक बनाकर नहीं भेजे गये थे।
آية رقم 34
ﭑﭒﭓﭔﭕﭖ
ﭗ
तो जो ईमान लाये, आज काफ़िरों पर हंस रहे हैं।
آية رقم 35
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सिंहासनों के ऊपर से उन्हें देख रहे हैं।
آية رقم 36
ﭜﭝﭞﭟﭠﭡ
ﭢ
क्या काफ़िरों (विश्वास हीनों) को उनका बदला दे दिया गया?[1]
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1. (29-36) इन आयतों में बताया गया है कि परलोक में कर्मों का फल दिया जायेगा तो संसारिक परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। संसार में तो सब के लिये अल्लाह की दया है, परन्तु न्याय के दिन जो अपने सुख सुविधा पर गर्व करते थे और जिन निर्धन मुसलमानों को देख कर आँखें मारते थे, वहाँ पर वही उन के दुष्परिणाम को देख कर प्रसन्न होंगे। अंतिम आयत में विश्वास हीनों के दुष्परिणाम को उन का कर्म कहा गया है। जिस में यह संकेत है कि सुफल और कुफल स्वयं इन्सान के अपने कर्मों का स्वभाविक प्रभाव होगा।
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1. (29-36) इन आयतों में बताया गया है कि परलोक में कर्मों का फल दिया जायेगा तो संसारिक परिस्थितियाँ बदल जायेंगी। संसार में तो सब के लिये अल्लाह की दया है, परन्तु न्याय के दिन जो अपने सुख सुविधा पर गर्व करते थे और जिन निर्धन मुसलमानों को देख कर आँखें मारते थे, वहाँ पर वही उन के दुष्परिणाम को देख कर प्रसन्न होंगे। अंतिम आयत में विश्वास हीनों के दुष्परिणाम को उन का कर्म कहा गया है। जिस में यह संकेत है कि सुफल और कुफल स्वयं इन्सान के अपने कर्मों का स्वभाविक प्रभाव होगा।
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