ترجمة معاني سورة الصافات باللغة الهندية من كتاب الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

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الترجمة الهندية

مولانا عزيز الحق العمري

الناشر

مجمع الملك فهد

آية رقم 1
शपथ है पंक्तिवध्द (फ़रिश्तों) की!
آية رقم 2
फिर झिड़कियाँ देने वालों की!
آية رقم 3
फिर स्मरण करके पढ़ने वालों[1] की!
____________________
1. यह तीनों गुण फ़रिश्तों के हैं जो आकाशों में अल्लाह की इबादत के लिये पंक्तिवध्द रहते तथा बादलों को हाँकते और अल्लाह के स्मरण जैसे क़ुर्आन तथा नमाज़ पढ़ने और उस की पवित्रता का गान करने इत्यादि में लगे रहते हैं।
آية رقم 4
निश्चय तुम्हारा पूज्य, एक ही है।
آية رقم 5
आकाशों तथा धरती का पालनहार तथा जो कुछ उनके मध्य है और सुर्योदय होने के स्थानों का रब।
آية رقم 6
हमने अलंकृत किया है संसार (समीप) के आकाश को, तारों की शोभा से।
آية رقم 7
तथा रक्षा करने के लिए प्रत्येक उध्दत शैतान से।
वह नहीं सुन सकते (जाकर) उच्च सभा तक फ़रिश्तों की बात तथा मारे जाते हैं, प्रत्येक दिशा से।
آية رقم 9
राँदने के लिए तथा उनके लिए स्थायी यातना है।
آية رقم 10
परन्तु, जो ले उड़े कुछ, तो पीछा करती है उसका दहकती ज्वाला।[1]
____________________
1. फिर यदि उस से बचा रह जाये तो आकाश की बात अपने नीचे के शैतानों तक पहूँचाता है और वह उसे काहिनों तथा ज्योतिषियों को बताते हैं। फिर वह उस में सौ झूठ मिला कर लोगों को बताते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारीः 6213, सह़ीह़ मुस्लिमः2228)
तो आप इन (काफ़िरों) से प्रश्न करें कि क्या उन्हें पैदा करना अधिक कठिन है या जिन्हें[1] हमने पैदा किया है? हमने उन्हें[2] पैदा किया है, लेसदार मिट्टी से।
____________________
1. अर्थात फ़रिश्तों तथा आकाशों को। 2. उन के पिता आदम (अलैहिस्सलाम) को।
آية رقم 12
बल्कि आपने आश्चर्य किया (उनके अस्वीकार पर) तथा वे उपहास करते हैं।
آية رقم 13
और जब शिक्षा दी जाये, तो वे शिक्षा ग्रहण नहीं करते।
آية رقم 14
और जब देखते हैं कोई निशानी, तो उपहास करने लगते हैं।
آية رقم 15
तथा कहते हें कि ये तो मात्र खुला जादू है।
آية رقم 16
(कहते हैं कि) क्या, जब हम मर जायेंगे तथा मिट्टी और हड्डियाँ हो जायेंगे, तो हम निश्चय पुनः जीवित किये जायेंगे?
آية رقم 17
और क्या, हमारे पहले पूर्वज भी (जीवित किये जायेंगे)?
آية رقم 18
आप कह दें कि हाँ तथा तुम अपमानित (भी) होगे!
آية رقم 19
वो तो बस एक झिड़की होगी, फिर सहसा वे देख रहे होंगे।
آية رقم 20
तथा कहेंगेः हाय हमारा विनाश! ये तो बदले (प्रलय) का दिन है।
آية رقم 21
यही निर्णय का दिन है, जिसे तुम झुठला रहे थे।
آية رقم 22
(आदेश होगा कि) घेर लाओ सब अत्याचारियों को तथा उनके साथियों को और जिसकी वे इबादत (वंदना) कर रहे थे।
آية رقم 23
अल्लाह के सिवा। फिर दिखा दो उन्हें नरक की राह।
آية رقم 24
और उन्हें रोक[1] लो। उनसे प्रश्न किया जाये।
____________________
1. नरक में झोंकने से पहले।
آية رقم 25
क्या हो गया है तुम्हें कि एक-दूसरे की सहायता नहीं करते?
آية رقم 26
बल्कि वे उस दिन, सिर झुकाये खड़े होंगे।
آية رقم 27
और एक-दूसरे के सम्मुख होकर परस्पर प्रश्न करेंगेः[1]
____________________
1. अर्थात एक-दूसरे को धिक्कारेंगे।
آية رقم 28
कहेंगे कि तुम हमारे पास आया करते थे दायें[1] से।
____________________
1. इस से अभिप्राय यह है कि धर्म तथा सत्य के नाम से आते थे अर्थात यह विश्वास दिलाते थे कि यही मिश्रणवाद मूल तथा सत्धर्म है।
آية رقم 29
वे[1] कहेंगेः बल्कि तुम स्वयं ईमान वाले न थे।
____________________
1. इस से अभिप्राय उन के प्रमुख लोग हैं।
तथा नहीं था हमारा तुमपर कोई अधिकार,[1] बल्कि तुम सवंय अवज्ञाकारी थे।
____________________
1. देखियेः सूरह इब्राहीम, आयतः22
آية رقم 31
तो सिध्द हो गया हमपर हमारे पालनहार का कथन कि हम (यातना) चखने वाले हैं।
آية رقم 32
तो हमने तुम्हें कुपथ कर दिया। हम तो स्वयं कुपथ थे।
آية رقم 33
फिर वे सभी, उस दिन यातना में साझी होंगे।
آية رقم 34
हम, इसी प्रकार, किया करते हैं अपराधियों के साथ।
ये वो हैं कि जब कहा जाता था उनसे कि कोई पूज्य (वंदनीय) नहीं अल्लाह के अतिरिक्त, तो वे अभिमान करते थे।
آية رقم 36
तथा कह रहे थेः क्या हम त्याग देने वाले हैं अपने पूज्यों को, एक उन्मत कवि के कारण?
آية رقم 37
बल्कि वह (नबी) सच लाये हैं तथा पुष्टि की है, सब रसूलों की।
آية رقم 38
निश्चय तुम दुःखदायी यातना चखने वाले हो।
آية رقم 39
तथा तुम उसका प्रतिकार (बदला) दिये जाओगे, जो तुम कर रहे थे।
آية رقم 40
परन्तु अल्लाह के शुध्द भक्त।
آية رقم 41
यही हैं, जिनके लिए विदित जीविका है।
آية رقم 42
प्रत्येक प्रकार के फल तथा यही आदरणीय होंगे।
آية رقم 43
सुख के स्वर्गों में।
آية رقم 44
आसनों पर एक-दूसरे के सम्मुख असीन होंगे।
آية رقم 45
फिराये जायेंगे इनपर प्याले, प्रवाहित पेय के।
آية رقم 46
श्वेत आस्वात पीने वालों के लिए।
آية رقم 47
नहीं होगी उसमें शारिरिक पीड़ा, न वे उसमें बहकेंगे।
آية رقم 48
तथा उनके पास आँखे झुकाये, (सति) बड़ी आँखों वाली (नारियाँ) होंगी।
آية رقم 49
वह छुपाये हुए अन्डों के मानिन्द होंगी।[1]
____________________
1. अर्थात जिस प्रकार पक्षी के पंखों के नीचे छुपे हुये अन्डे सुरक्षित होते हैं वैसे ही वह नारियाँ सुरक्षित, सुन्दर रंग और रूप की होंगी।
آية رقم 50
वह एक-दूसरे से सम्मुख होकर प्रश्न करेंगे।
آية رقم 51
तो कहेगा एक कहने वाला उनमें सेः मेरा एक साथी था।
آية رقم 52
जो कहता था कि क्या तुम (प्रलय का) विश्वास करने वालों में से हो?
آية رقم 53
क्या जब हम, मर जायेंगे तथा मिट्टी और अस्थियाँ हो जायेंगे, तो क्या हमें (कर्मों) का प्रतिफल दिया जायेगा?
آية رقم 54
वह कहेगाः क्या तुम झाँककर देखने वाले हो?
آية رقم 55
फिर झाँकते ही उसे देख लेगा, नरक के बीच।
آية رقم 56
उससे कहेगाः अल्लाह की शपथ! तुम तो मेरा विनाश कर देने के समीप थे।
آية رقم 57
और यदि मेरे पालनहार का अनुग्रह न होता, तो मैं (नरक के) उपस्थितों में होता।
آية رقم 58
फिर वह कहेगाः क्या (ये सही नहीं है कि) हम मरने वाले नहीं हैं?
آية رقم 59
सिवाय अपनी प्रथम मौत के और न हमें यातना दी जायेगी।
آية رقم 60
वास्तव में, यही बड़ी सफलता है।
آية رقم 61
इसी (जैसी सफलता) के लिए चाहिये कि कर्म करें, कर्म करने वाले।
آية رقم 62
क्या ये आतिथ्य उत्तम है अथवा थोहड़ का वृक्ष?
آية رقم 63
हमने उसे अत्याचारियों के लिए एक परीक्षा बनाया है।
آية رقم 64
वह एक वृक्ष है, जो नरक की जड़ (तह) से निकलता है।
آية رقم 65
उसके गुच्छे शैतानों के सिरों के समान हैं।
آية رقم 66
तो वे (नरक वासी) खाने वाले हैं, उससे। फिर भरने वाले हैं, उससे अपने पेट।
آية رقم 67
फिर उनके लिए उसके ऊपर से खौलता गरम पानी है।
آية رقم 68
फिर उन्हें प्रत्यागत होना है, नरक की ओर।
آية رقم 69
वास्तव में, उन्होंने पाया अपने पूर्वजों को कुपथ।
آية رقم 70
फिर वे उन्हीं के पद्चिन्हों पर[1] दौड़े चले जा रहे हैं।
____________________
1. इस में नरक में जाने का जो सब से बड़ा कारण बताया गया है वह है नबी को न मानना, और अपने पूर्वजों के पंथ पर ही चलते रहना।
آية رقم 71
और कुपथ हो चुके हैं, इनसे पूर्व अगले लोगों में से अधिक्तर।
آية رقم 72
तथा हम भेज चुके हैं उनमें, सचेत (सावधान) करने वाले।
آية رقم 73
तो देखो कि कैसा रहा सावधान किये हुए लोगों का परिणाम?[1]
____________________
1. अतः उन के दुष्परिणाम से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
آية رقم 74
हमारे शुध्द भक्तों के सिवा।
آية رقم 75
तथा हमें पुकारा नूह़ नेः तो हम क्या ही अच्छे प्रार्थना स्वीकार करने वाले हैं।
آية رقم 76
और हमने बचा लिया उसे और उसके परिजनों को, घोर आपदा से।
آية رقم 77
तथा कर दिया हमने उसकी संतति को, शेष[1] रह जाने वालों में से।
____________________
1. उस की जाति के जलमग्न हो जाने के पश्चात्।
آية رقم 78
तथा शेष रखा हमने उसकी सराहना तथा प्रशंसा को पिछलों में।
آية رقم 79
सलाम (सुरक्षा)[1] है नूह़ के लिए समस्त विश्ववासियों में।
____________________
1. अर्थात उस की बुरी चर्चा से।
آية رقم 80
इसी प्रकार, हम प्रतिफल प्रदान करते हैं सदाचारियों को।
آية رقم 81
वास्तव में, वह हमारे ईमान वाले भक्तों में से था।
آية رقم 82
फिर हमने जलमगन कर दिया दूसरों को।
آية رقم 83
और उसके अनुयायियों में निश्चय इब्राहीम है।
آية رقم 84
जब लाया वह अपने पालनहार के पास स्वच्छ दिल।
آية رقم 85
जब कहा उसने अपने पिता तथा अपनी जाति सेः तुम किसकी इबादत (वंदना) कर रहे हो?
آية رقم 86
क्या अपने बनाये हुए पूज्यों को अल्लाह के सिवा चाहते हो?
آية رقم 87
तो तुम्हारा क्या विचार है, विश्व के पालनहार के विषय में?
آية رقم 88
फिर उसने देखा तोरों की[1] ओर।
____________________
1. यह सोचते हुये कि इन के उत्सव में न जाने के लिये क्या बहाना करूँ।
آية رقم 89
तथा उनसे कहाः मैं रोगी हूँ।
آية رقم 90
तो उसे छोड़कर चले गये।
آية رقم 91
फिर वह जा पहुँचा, उनके उपास्यों (पूज्यों) की ओर। कहा कि (वे प्रसाद) क्यों नहीं खाते?
آية رقم 92
तुम्हें क्या हुआ है कि बोलते नहीं?
آية رقم 93
फिर पिल पड़ा उनपर मारते हुए, दायें हाथ से।
آية رقم 94
तो वे आये उसकी ओर दौड़ते हुए।
آية رقم 95
इब्राहीम ने कहाः क्या तुम इबादत (वंदना) करते हो उसकी जिसे, पत्थरों से तराश्ते हो?
آية رقم 96
जबकि अल्लाह ने पैदा किया है तुम्हें तथा जो तुम करते हो।
آية رقم 97
उन्होंने कहाः इसके लिए एक (अग्निशाला का) निर्माण करो और उसे झोंक दो दहकती अग्नि में।
آية رقم 98
तो उन्होंने उसके साथ षड्यंत्र रचा, तो हमने उन्हीं को नीचा कर दिया।
آية رقم 99
तथा उसने कहाः मैं जाने वाला हूँ अपने पालनहार की[1] ओर। वह मुझे सुपथ दर्शायेगा।
____________________
1. अर्थात ऐसे स्थान की ओर जहाँ अपने पालनहार की इबादत कर सकूँ।
آية رقم 100
हे मेरे पालनहार! प्रदान कर मुझे, एक सदाचारी (पुनीत) पुत्र।
آية رقم 101
तो हमने शुभ सूचना दी उसे, एक सहनशील पुत्र की।
फिर जब वह पहुँचा उसके साथ चलने-फिरने की आयु को, तो इब्राहीम ने कहाः हे मेरे प्रिय पुत्र! मैं देख रहा हूँ स्वप्न में कि मैं तुझे वध कर रहा हूँ। अब, तू बता कि तेरा क्या विचार है? उसने कहाः हे पिता! पालन करें, जिसका आदेश आपको दिया जा रहा है। आप पायेंगे मुझे सहनशीलों में से, यदि अल्लाह की इच्छा हूई।
آية رقم 103
अन्ततः, जब दोनों ने स्वयं को अर्पित कर दिया और उस (पिता) ने उसे गिरा दिया माथे के बल।
آية رقم 104
तब हमने उसे आवाज़ दी कि हे इब्राहीम!
آية رقم 105
तूने सच कर दिया अपना स्वप्न। इसी प्रकार, हम प्रतिफल प्रदान करते हैं सदाचारियों को।
آية رقم 106
वास्तव में, ये खुली परीक्षा थी।
آية رقم 107
और हमने उसके मुक्ति-प्रतिदान के रूप में, प्रदान कर दी एक महान[1] बली।
____________________
1. यह महान बलि एक मेंढा था। जिसे जिब्रील (अलाहिस्सलाम) द्वारा स्वर्ग से भेजा गया। जो आप के प्रिय पुत्र इस्माईल (अलैहिस्सलाम) के स्थान पर बलि दिया गया। फिर इस विधि को प्रलय तक के लिये अल्लाह के सामिप्य का एक साधन तथा ईदुल अज़्ह़ा (बक़रईद) का प्रियवर कर्म बना दिया गया। जिसे संसार के सभी मुसलमान ईदुल अज़्ह़ा में करते हैं।
آية رقم 108
तथा हमने शेष रखी उसकी शुभ चर्चा पिछलों में।
آية رقم 109
सलाम है इब्रीम पर।
آية رقم 110
इसी प्रकार, हम प्रतिफल प्रदान करते हैं सदाचारियों को।
آية رقم 111
निश्चय ही वह हमारे ईमान वाले भक्तों में से था।
آية رقم 112
तथा हमने उसे शुभसूचना दी इस्ह़ाक़ नबी की, जो सदाचारियों में[1] होगा।
____________________
1. इस आयत से विद्वत होता है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को इस बलि के पश्चात् दूसरे पुत्र आदरणीय इस्ह़ाक़ की शुभ सूचना दी गई। इस से ज्ञान हुआ की बलि इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की दी गई थी। और दोनों की आयु में लग-लग चौदह वर्ष का अन्तर है।
तथा हमने बरकत (विभूति) अवतरिक की उसपर तथा इस्ह़ाक़ पर और उन दोनों की संतति में से कोई सदाचारी है और कोई अपने लिए खुला अत्याचारी।
آية رقم 114
तथा हमने उपकार किया मूसा और हारून पर।
آية رقم 115
तथा मुक्त किया दोनों को और उनकी जाति को, घोर व्यग्रता से।
آية رقم 116
तथा हमने सहायता की उनकी, तो वही प्रभावशाली हो गये।
آية رقم 117
तथा हमने प्रदान की दोनों को प्रकाशमय पुस्तक (तौरात)।
آية رقم 118
और हमने दर्शाई दोनों को सीधी डगर।
آية رقم 119
तथा शेष रखी दोनों की शुभ चर्चा, पिछलों में।
آية رقم 120
सलाम है मूसा तथा हारून पर।
آية رقم 121
हम इसी प्रकार प्रतिफल प्रदान करते हैं, सदाचारियों को।
آية رقم 122
वस्तुतः, वे दोनों हमारे ईमान वाले भक्तों में थे।
آية رقم 123
तथा निश्चय इल्यास, नबियों में से था।
آية رقم 124
जब कहा उसने अपनी जाति सेः क्या तुम डरते नहीं हो?
آية رقم 125
क्या तुम बअल ( नामक मूर्ति) को पुकारते हो? तथा त्याग रहे हो सर्वोत्तम उत्पत्तिकर्ता को?
آية رقم 126
अल्लाह ही तुम्हारा पालनहार है तथा तुम्हारे प्रथम पूर्वजों का पालनहार है।
آية رقم 127
अन्ततः, उन्होंने झुठला दिया उसे। तो निश्चय वही (नरक में) उपस्थित होंगे।
آية رقم 128
किन्तु, अल्लाह के शुध्द भक्त।
آية رقم 129
तथा शेष रखी हमने उसकी शुभ चर्चा पिछलों में।
آية رقم 130
सलाम है इल्यासीन[1] पर।
____________________
1. इल्यासीन इल्यास ही का एक उच्चारण है। उन्हें अन्य धर्म ग्रन्थों में इलया भी कहा गया है।
آية رقم 131
वास्तव में, हम इसी प्रकार प्रतिफल प्रदान करते हैं, सदाचारियों को।
آية رقم 132
वस्तुतः, वह हमारे ईमान वाले भक्तों में से था।
آية رقم 133
तथा निश्चय लूत नबियों में से था।
آية رقم 134
जब हमने मुक्त किया उसे तथा उसके सबपरिजनों को।
آية رقم 135
एक बुढ़िया[1] के सिवा, जो पीछे रह जाने वालों में थी।
____________________
1. यह लूत (अलैहिस्सलाम) की काफ़िर पत्नि थी।
آية رقم 136
फिर हमने अन्यों को तहस-नहस कर दिया।
آية رقم 137
तथा तुम[1] ग़ुज़रते हो उन (की निर्जीव बस्तियों) पर, प्रातः के समय।
____________________
1. मक्का वासियों को संबोधित किया गया है।
آية رقم 138
तथा रात्रि में। तो क्या तुम समझते नहीं हो?
آية رقم 139
तथा निश्चय यूनुस नबियों में से था।
آية رقم 140
जब वह भाग[1] गया भरी नाव की ओर।
____________________
1. अल्लाह की अनुमति के बिना अपने नगर से नगर वासियों को यातना के आन की सूचना दे कर निकल गये। और नाव पर सवार हो गये। नाव सागर की लहरों में घिर गई। इस लिये बोझ कम करने के लिये नाम निकाला गया। तो यूनुस अलैहिस्सलाम का नाम निकला और उन्हें समुद्र में फेंक दिया गया।
آية رقم 141
फिर नाम निकाला गया, तो वह हो गया फेंके हुओं में से।
آية رقم 142
तो निगल लिया उसे मछली ने और वह निन्दित था।
آية رقم 143
तो यदि न होता अल्लाह की पवित्रता का वर्णन करने वालों में।
آية رقم 144
तो वह रह जाता उसके उदर में उस दिन तक, जब सब पुनः जीवित किये[1] जायेंगे।
____________________
1. अर्थात प्रयल के दिन तक। (देखियेः सूरह अम्बिया, आयतः87)
آية رقم 145
तो हमने फेंक दिया उसे खुले मैदान में और वह रोगी[1] था।
____________________
1. अर्थात निर्बल नवजात शिशु के समान।
آية رقم 146
और उगा दिया उस[1] पर लताओं का एक वृक्ष।
____________________
1. रक्षा के लिये।
آية رقم 147
तथा हमने उसे रसूल बनाकर भेजा एक लाख, बल्कि अधिक की ओर।
آية رقم 148
तो वे ईमान लाये। फिर हमने उन्हें सुख-सुविधा प्रदान की एक समय[1] तक।
____________________
1. देखियेः सूरह यूनुस।
آية رقم 149
तो (हे नबी!) आप उनसे प्रश्न करें कि क्या आपके पालनहार के लिए तो पुत्रियाँ हों और उनके लिए पुत्र?
آية رقم 150
अथवा किया हमने पैदा किया है फ़रिश्तों को नारियाँ और वे उस समय उपस्थित[1] थे?
____________________
1. इस में मक्का के मिश्रणवादियों का खण्डन किया जा रहा है जो फ़रिश्तों को देवियाँ तथा अल्लाह की पुत्रियाँ कहते थे। जब कि वह स्वयं पुत्रियों के जन्म को अप्रिय मानते थे।
آية رقم 151
सावधान! वास्तव में, वे अपने मन से बनाकर ये बात कह रहे हैं।
آية رقم 152
कि अल्लाह ने संतान बनाई है और निश्चय ये मिथ्या भाषी हैं।
آية رقم 153
क्या अल्लाह ने प्राथमिक्ता दी है पुत्रियों को, पुत्रों पर?
آية رقم 154
तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसा निर्णय दे रहे हो?
آية رقم 155
तो क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते?
آية رقم 156
अथवा तुम्हारे पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण है?
آية رقم 157
तो अपनी पुस्तक लाओ, यदि तुम सत्यवादी हो?
और उन्होंने बना दिया अल्लाह तथा जिन्नों के मध्य, वंश-संबंध। जबकि जिन्न स्वयं जानते हैं कि वे अल्लाह के समक्ष निश्चय उपस्थित किये[1] जायेंगे।
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1. अर्थात यातना के लिये। तो यदि वे उस के संबंधी होते तो उन्हें यातना क्यों देता?
آية رقم 159
अल्लाह पवित्र है उन गुणों से, जिनका वे वर्णन कर रहे हैं।
آية رقم 160
परन्तु, अल्लाह के शुध्द भक्त।[1]
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1. वह अल्लाह को ऐसे दुर्गुणों से युक्त नहीं करते।
آية رقم 161
तो निश्चय तुम तथा तुम्हारे पूज्य।
آية رقم 162
तुम सब किसी एक को भी कुपथ नहीं कर सकते।
آية رقم 163
उसके सिवा, जो नरक में झोंका जाने वाला है।
آية رقم 164
और नहीं है हम (फ़रिश्तों) में से कोई, परन्तु उसका एक नियमित स्थान है।
آية رقم 165
तथा हम ही (आज्ञापालन के लिए) पंक्तिवध्द हैं।
آية رقم 166
और हम ही तस्बीह़ (पवित्रता गान) करने वाले हैं।
آية رقم 167
तथा वे (मुश्रिक) तो कहा करते थे किः
آية رقم 168
यदि हमारे पास कोई स्मृति (पुस्तक) होती, जो पहले लोगों में आई......
آية رقم 169
तो हम अवश्य अल्लाह के शुध्द भक्तों में हो जाते।
آية رقم 170
(फिर जब आ गयी) तो उन्होंने क़ुर्आन के साथ कुफ़्र कर दिया, अतः, शीघ्र ही उन्हें ज्ञान हो जायेगा।
آية رقم 171
और पहले ही हमारा वचन हो चुका है अपने भेजे हुए भक्तों के लिए।
آية رقم 172
कि निश्चय उन्हीं की सहायता की जायेगी।
آية رقم 173
तथा वास्तव में हमारी सेना ही प्रभावशाली (विजयी) होने वाली है।
آية رقم 174
तो आप मुँह फेर लें उनसे, कुछ समय तक।
آية رقم 175
तथा उन्हें देखते रहें। वे भी शीघ्र ही देख लेंगे।
آية رقم 176
तो क्या, वे हमारी यातना की शीघ्र माँग कर रहे हैं।
آية رقم 177
तो जब वह उतर आयेगी उनके मैदानों में, तो बुरा हो जायेगा सावधान किये हुओं का सवेरा।
آية رقم 178
और आप मुँह फेर लें उनसे, कुछ समय तक।
آية رقم 179
तथा देखते रहें, अन्ततः वे (भी) देख लेंगे।
آية رقم 180
पवित्र है आपका पालनहार, गौरव का स्वामी, उस बात से, जो वे बना रहे हैं।
آية رقم 181
तथा सलाम है रसूलों पर।
آية رقم 182
तथा सभी प्रशंसा, अल्लाह, सर्वलोक के पालनहार के लिए है।
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